Loading...
यजुर्वेद अध्याय - 28

मन्त्र चुनें

  • यजुर्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • यजुर्वेद - अध्याय 28/ मन्त्र 20
    ऋषिः - अश्विनावृषी देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - निचृदतिशक्वरी स्वरः - पञ्चमः
    73

    दे॒वो दे॒वैर्वन॒स्पति॒र्हिर॑ण्यपर्णो॒ मधु॑शाखः सुपिप्प॒लो दे॒वमिन्द्र॑मवर्धयत्। दिव॒मग्रे॑णास्पृक्ष॒दान्तरि॑क्षं पृथि॒वीम॑दृꣳहीद्वसु॒वने॑ वसु॒धेय॑स्य वेतु॒ यज॑॥२०॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दे॒वः। दे॒वैः। वन॒स्पतिः॑। हिर॑ण्यपर्ण॒ इति॒ हिर॑ण्यऽपर्णः। मधु॑शाख इति॑ मधु॑ऽशाखः। सु॒पि॒प्प॒ल इति॑ सुऽपिप्प॒लः। दे॒वम्। इन्द्र॑म्। अ॒व॒र्ध॒य॒त्। दिव॑म्। अग्रे॑ण। अ॒स्पृ॒क्ष॒त्। आ। अ॒न्तरि॑क्षम्। पृ॒थि॒वीम्। अ॒दृ॒ꣳही॒त्। व॒सु॒वन॒ इति॑ वसु॒ऽवने॑। व॒सु॒ऽधेय॒स्येति॑ वसु॒ऽधेय॑स्य। वे॒तु॒। यज॑ ॥२० ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    देवो देवैर्वनस्पतिर्हिरण्यपर्णा मधुशाखः सुपिप्पलो देवमिन्द्रमवर्धयत् । दिवमग्रेणास्पृक्षदान्तरिक्सम्पृथिवीमदृँद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    देवः। देवैः। वनस्पतिः। हिरण्यपर्ण इति हिरण्यऽपर्णः। मधुशाख इति मधुऽशाखः। सुपिप्पल इति सुऽपिप्पलः। देवम्। इन्द्रम्। अवर्धयत्। दिवम्। अग्रेण। अस्पृक्षत्। आ। अन्तरिक्षम्। पृथिवीम्। अदृꣳहीत्। वसुवन इति वसुऽवने। वसुऽधेयस्येति वसुऽधेयस्य। वेतु। यज॥२०॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 28; मन्त्र » 20
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्विद्वांसः किं कुर्वन्तीत्याह॥

    अन्वयः

    हे विद्वन्! यथा देवैः सह वर्त्तमानो हिरण्यपर्णो मधुशाखः सुपिप्पलो देवो वनस्पतिर्देवमिन्द्रमवर्द्धयदग्रेण दिवमस्पृक्षदन्तरिक्षं तत्स्थांल्लोकान् पृथिवीञ्चादृंहीद् वसुवने वसुधेयस्य वेतु तथा यज॥२०॥

    पदार्थः

    (देवः) दिव्यगुणप्रदः (देवैः) देदीप्यमानैः (वनस्पतिः) किरणानां पालकः (हिरण्यपर्णः) हिरण्यानि तेजांसि पर्णानि यस्य सः (मधुशाखः) मधुराः शाखा यस्य (सुपिप्पलः) सुन्दरफलः (देवम्) दिव्यगुणम् (इन्द्रम्) दारिद्र्यविदारकम् (अवर्धयत्) वर्धयति (दिवम्) प्रकाशम् (अग्रेण) पुरस्सरेण (अस्पृक्षत्) स्पृहेत् (आ) समन्तात् (अन्तरिक्षम्) अवकाशम् (पृथिवीम्) भूमिम् (अदृंहीत्) धरेत् (वसुवने) वसुप्रदाय जीवाय (वसुधेयस्य) जगतः (वेतु) (यज)॥२०॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा वनस्पतयो मेघं वर्द्धयन्ति सूर्यश्च लोकान् धरति तथा विद्वांसो विद्यायाचिनं विद्यार्थिनं वर्धयन्ति॥२०॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर विद्वान् लोग क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे विद्वन्! जैसे (देवैः) दिव्य प्रकाशमान गुणों के साथ वर्त्तमान (हिरण्यपर्णः) सुवर्ण के तुल्य चिलकते हुए पत्तों वाला (मधुशाखः) मीठी डालियों से युक्त (सुपिप्पलः) सुन्दर फलों वाला (देवः) उत्तम गुणों का दाता (वनस्पतिः) सूर्य की किरणों में जल पहुंचा कर उष्णता की शान्ति से किरणों का रक्षक वनस्पति (देवम्) उत्तम गुणों वाले (इन्द्रम्) दरिद्रता के नाशक मेघ को (अवर्धयत्) बढ़ावे, (अग्रेण) अग्रगामी होने से (दिवम्) प्रकाश को (अस्पृक्षत्) चाहे, (अन्तरिक्षम्) अवकाश, उसमें स्थित लोकों और (पृथिवीम्) भूमि को (आ, अदृंहीत्) अच्छे प्रकार धारण करे (वसुधेयस्य) संसार के (वसुवने) धनदाता जीव के लिए (वेतु) उत्पन्न होवे, वैसे आप (यज) यज्ञ कीजिए॥२०॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वनस्पति ऊपर जल चढ़ाकर मेघ को बढ़ाते और सूर्य अन्य लोकों को धारण करता है, वैसे विद्वान् लोग विद्या को चाहने वाले विद्यार्थी को बढ़ाते हैं॥२०॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    होता द्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियों की नियुक्ति और उनके विशेष आवश्यक लक्षण, अधिकार और शक्तियों का वर्णन।

    भावार्थ

    (देव:) ज्ञानद्रष्टा, विजयशील, सुखप्रद विद्वान् (वनस्पतिः) सेवन योग्य पदाधिकारों व ऐश्वर्यों का स्वामी, (हिरण्यपर्णः) सुवर्ण के समान तेजोयुक्त पन्नों वाले महावृक्ष के समान तेज, यश और पराक्रमयुक्त पालन सामर्थ्यो और ज्ञानों से युक्त, (मधुशाख:) मधुर, मनोहर शाखाओं के समान ब्रह्म ज्ञानमय वेद-शाखाओं से युक्त, ( सुपिप्पलः) उत्तम ज्ञानमय फलों से भरा हुआ, विद्वान् पुरुष ( देवम् इन्द्रम् ) सर्वोत्तम ऐश्वर्यवान् राजा के पद की ( अवर्धयत् ) वृद्धि करता है । महावृक्ष जैसे ( अग्रेण ) चोटी से आकाश को छूता है, वैसे ( अग्रेण ) मुख्य पद से, ( दिवम् ) प्रकाशमय सूर्यवत् ज्ञान को ( अस्पृक्षत् ) धारण करता है और मध्य और चरणभाग से ( अन्तरिक्षम् पृथिवीम् ) अन्तरिक्ष और पृथिवी अर्थात् रक्षक शासकों और प्रजाजनों को भी मध्यमवृत्ति और विनयवृत्ति से ( अहंहीत्) बढ़ाता है । वह (वसुवने ) ऐश्वर्य के स्वामी राजा के (वसुधेस्य) राष्ट्रैश्वर्य की (वेतु) रक्षा करे । (यज) हे होत: ! ऐसे विद्वान् पुरुष को अधिकार दे ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    निचृदतिशक्वरी | पंचमः ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    मधुशाखः सुपिप्पलः [ यह संसार - वृक्ष ]

    पदार्थ

    १. (देवः) = सब व्यवहारों का साधक, (हिरण्यपर्ण:) = हितरमणीय पालन व पूरण करनेवाला [सुनहले पत्तोंवाला], (मधुशाख:) = माधुर्यमयी शाखाओंवाला (सुपिप्पलः) = उत्तम फलवाला (वनस्पतिः) = सौन्दर्य, यश व धन [ loveliness, glory, wealth] का रक्षक यह संसार - वृक्ष (देवैः) = अपने 'अग्नि, वायु सूर्य' आदि देवों से (देवम्) = ज्ञान की दीप्ति प्राप्त करनेवाले (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अवर्धयत्) = बढ़ाता है। यह संसार एक वृक्ष है। यह हमें सब आवश्यक वस्तुओं को देकर [देवो दानात्] हमारे सब जीवन व्यवहारों का साधक है [व्यवहार = दिव्], अतः 'देव' है। यह सुन्दरता व हितपूर्वक हमारा पालन करने से 'हिरण्यपर्ण' है। इसकी विविध योनिरूप शाखाओं में हमारे लिए माधुर्य निहित है। गौ हमें दूध देती है। घोड़ा हमारे व्यायाम व आने-जाने का साधन बनता है, भेड़ हमें ऊन प्राप्त कराती है, बकरी सर्वरोगापहारी दूध देती हुई पशम देती है। इस प्रकार ये विविध शाखाएँ हमारे जीवन को मधुर बना रही हैं। मधुर फलोंवाला तो यह वृक्ष है ही। इस संसार - वृक्ष के सूर्यादि सब देव जितेन्द्रिय पुरुष की उन्नति का कारण बनते हैं । २. यह संसार-वृक्ष (अग्रेण) = अग्रभाग से (दिवम्) = द्युलोक को (अस्पृक्षत्) = छूता है, अर्थात् इसका एक प्रान्त [ सिरा] द्युलोक है तो यह (आ अन्तरक्षिम्) = चारों ओर इस अन्तरिक्ष को व्याप्त किये हुए है और (पृथिवीम्) = पृथिवी को (अगृहीत्) = दृढ़ बना रहा है। इसका मध्यभाग अन्तरिक्ष है और इसका [उपरेण] दूसरा सिरा यह दृढ़ पृथिवीलोक है। इस प्रकार त्रिलोकी से बना हुआ यह संसारवृक्ष है । ३. यह संसार वृक्ष वसुवने धन के सेवन में (वसुधेयस्य वेतु) = धन के आधारभूत उस प्रभु का प्रजनन प्रादुर्भाव करनेवाला हो । (यज) हे जीव ! तू उस प्रभु से अपना मेल करनेवाला बन। एतदर्थ तू यज्ञशील हो, दान देनेवाला बन।

    भावार्थ

    भावार्थ - यह 'हिरण्यपर्ण मधुशाख, सुपिप्पल' संसारवृक्ष हमारे लिए वर्धन का कारण बने। धन के सेवन में धन के आधारभूत प्रभु का प्रादुर्भाव करनेवाला हो।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशा वनस्पती जल वर खेचून घेतात व मेघ वर्धित करण्यास कारणीभूत होतात व सूर्य इतर ग्रहगोलांना धारण करतो तसे विद्वान लोक जिज्ञासू विद्यार्थ्यांच्या ज्ञानात भर टाकतात.

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    विद्वान काय करतात, याविषयी -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - (देवैः) दिव्यगुणांनी संयुक्त असलेले (हिरण्यपर्णः) सुवर्णाप्रमाणे चमकणार्‍या पानांनी लादलेले वा सुशोभित (मधुशाखः) मधुर शाखा असलेले (सुपिप्पलः) सुंदर फळे देणारे (देवः) उत्तम गुण देते असे वृक्ष (वनपतिः) सूर्याच्या किरणांत जल पाठवतात आणि त्या जलामुळे वातावरणातील उष्णता कमी होते, (यामुळे वृक्ष हे किरणांचे रक्षक आहेत) हे वृक्ष अशाप्रकारे (देवम्) उत्तम गुणवान (इन्द्रम्) दारिद्यनाशक मेघमंडळाला (अवर्धयत) वाढवतात. (अग्रेण) ते (अग्रगामीना) सर्वांच्या पुढे जाणारे वृक्ष अथवा मेघ (दिवम्) प्रकाशाची (अस्पृक्षत्) कामना करोत (अन्तरिक्षम्) आकाश आणि त्यातील ग्रह-लोकादीनां तसेच (पृथिवीम्) भूमीला (आ अहंहीत्) दृढतेने धारण करोत. तसेच (वसुधेयस्य) या संसारातील (वसुवने) धनदाता प्राणीसाठी (वेतु) (ते वृक्ष फळे आणि मेघ जल) उत्पन्न करोत. हे विद्वान, (सृष्टीत हा जो एक यज्ञ सुरू आहे, तद्वत) आपणही (यज) यज्ञ करा. ॥20॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. ज्याप्रमाणे वृक्ष-वनस्पती जलास वरच्या दिशेकडे पाठवतात आणि त्याद्वारे मेघमंडळास वाढवतात आणि सूर्य अन्य लोकांना धारण करतो, त्याप्रमाणे विद्वज्जनही विद्यार्थी- जनांना विद्या-ज्ञानाने समृद्ध करतात ॥20॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O learned person, just as Vanaspati, . imbued with fine qualities, with leaves shining like gold, sweet boughs, fair fruit, bestower of praiseworthy benefits, heightens the cloud, the remover of poverty, and full of nice attributes ; and being highly important desires light, establishes the Earth and space and grows for the soul, the diffuser of wealth in the world, so shouldst thou perform yajna.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    The lord of sun-beams, the Tree of life, brilliant with its lustrous virtues, of golden leaves, honeyed branches and delicious fruit strengthens and elevates the divine Indra, power of generosity and eliminator of poverty. With its top it reaches the light of heaven, energises and expands the skies, and strengthens and enriches the earth. And thus it brings for the dedicated world of humanity the riches as blessings of the lord of the treasures of the universe. Man of yajna, carry on the yajna in unison with the sun and the Tree, never relent.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    The divine Lord of forests (vanaspati), laden with golden leaves, spreading out sweet branches, bearing dainty fruit, heightens the strength of the divine aspirant. With His top, He touches the high heaven as well as the mid-space, and He stabilizes the earth. At the time of the distribution of wealth, may He procure the store of wealth for us. Offer sacrifice. (1)

    Notes

    Hiranyaparṇaḥ, having golden leaves.

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (1)

    विषय

    পুনর্বিদ্বাংসঃ কিং কুর্বন্তীত্যাহ ॥
    পুনঃ বিদ্বান্গণ কী করেন, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে বিদ্বন্! যেমন (দেবৈঃ) দিব্য প্রকাশমান গুণগুলি সহ বর্ত্তমান (হিরণ্যপর্ণঃ) সুবর্ণ সমান চকমকে পত্র বিশিষ্ট (মধুশাখঃ) মিষ্ট শাখা যুক্ত (সুপিপ্পলঃ) সুন্দর ফল যুক্ত (দেবঃ) উত্তম গুণগুলির দাতা (বনস্পতিঃ) সূর্য্যের কিরণসমূহে জল পৌঁছাইয়া উষ্ণতার শান্তি দ্বারা কিরণগুলির রক্ষক বনস্পতি (দেবম্) উত্তম গুণযুক্ত (ইন্দ্রম্) দরিদ্রতার নাশক মেঘকে (অবর্ধয়ৎ) বৃদ্ধি করিবে । (অগ্রেণ) অগ্রগামী হওয়ায় (দিবম্) প্রকাশের (অস্পৃক্ষৎ) কামনা করে (অন্তরিক্ষম্) অবকাশ, তন্মধ্যে স্থিত লোক-লোকান্তর এবং (পৃথিবীম্) ভূমিকে (আ, অদৃংহীৎ) উত্তম প্রকার ধারণ করিবে (বসুধেয়স্য) সংসারের (বসুবনে) ধনদাতা জীবের জন্য (বেতু) উৎপন্ন হউক, সেইরূপ আপনারা (য়জ) যজ্ঞ করুন ॥ ২০ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন বনস্পতি ঊর্দ্ধে জল উঠাইয়া মেঘ বৃদ্ধি করে এবং সূর্য্য অন্য লোকসমূহকে ধারণ করে তদ্রূপ বিদ্বান্গণ বিদ্যার কামনাকারী বিদ্যার্থীকে বৃদ্ধি করে ॥ ২০ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    দে॒বো দে॒বৈর্বন॒স্পতি॒র্হির॑ণ্যপর্ণো॒ মধু॑শাখঃ সুপিপ্প॒লো দে॒বমিন্দ্র॑মবর্ধয়ৎ । দিব॒মগ্রে॑ণাস্পৃক্ষ॒দাऽऽऽন্তরি॑ক্ষং পৃথি॒বীম॑দৃꣳহীদ্বসু॒বনে॑ বসু॒ধেয়॑স্য বেতু॒ য়জ॑ ॥ ২০ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    দেব ইত্যস্যাশ্বিনাবৃষী । ইন্দ্রো দেবতা । নিচৃদতিশক্বরী ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top