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यजुर्वेद अध्याय - 28

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  • यजुर्वेद - अध्याय 28/ मन्त्र 3
    ऋषिः - बृहदुक्थो वामदेव ऋषिः देवता - इन्द्रो देवता छन्दः - स्वराट्पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः
    141

    होता॑ यक्ष॒दिडा॑भि॒रिन्द्र॑मीडि॒तमा॒जुह्वा॑न॒मम॑र्त्यम्। दे॒वो दे॒वैः सवी॑र्यो॒ वज्र॑हस्तः पुरन्द॒रो वेत्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    होता॑। य॒क्ष॒त्। इडा॑भिः। इन्द्र॑म्। ई॒डि॒तम्। आ॒जुह्वा॑न॒मित्या॒ऽजुह्वा॑नम्। अम॑र्त्यम्। दे॒वः। दे॒वैः। सवी॑र्य॒ इति॒ सऽवी॑र्यः। वज्र॑हस्त॒ इति॒ वज्र॑ऽहस्तः। पु॒र॒न्द॒र इति॑ पुरम्ऽद॒रः। वेतु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥३ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    होता यक्षदिडाभिरिन्द्रमीडितमाजुह्वानममर्त्यम् । देवो देवैः सवीर्या वज्रहस्तः पुरन्दरो वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    होता। यक्षत्। इडाभिः। इन्द्रम्। ईडितम्। आजुह्वानमित्याऽजुह्वानम्। अमर्त्यम्। देवः। देवैः। सवीर्य इति सऽवीर्यः। वज्रहस्त इति वज्रऽहस्तः। पुरन्दर इति पुरम्ऽदरः। वेतु। आज्यस्य। होतः। यज॥३॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 28; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    हे होतस्त्वं यथा होतेडाभिरमर्त्यमाजुह्वानमीडितमिन्द्रं यक्षद् यथाऽयं वज्रहस्तः पुरन्दरः सवीर्यो देवो देवैः सहाज्यस्यावयवान् वेतु तथा यज॥३॥

    पदार्थः

    (होता) (यक्षत्) (इडाभिः) सुशिक्षिताभिर्वाग्भिः (इन्द्रम्) परमविद्यैश्वर्यसम्पन्नम् (ईडितम्) प्रशस्तम् (आजुह्वानम्) स्पर्द्धमानम् (अमर्त्यम्) साधारणैर्मनुष्यैरसदृशम् (देवः) विद्वान् (देवैः) विद्वद्भिः सह (सवीर्यः) बलोपेतः (वज्रहस्तः) वज्राणि शस्त्रास्त्राणि हस्ते यस्य सः (पुरन्दरः) योऽरिपुराणि दृणाति सः (वेतु) प्राप्नोतु (आज्यस्य) विज्ञानेन रक्षितुं योग्यस्य राज्यस्य (होतः) (यज)॥३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा राजराजपुरुषाः पितृवत् प्रजाः पालयेयुस्तथैव प्रजा एतान् पितृवत् सेवेरन्, य आप्तविद्वदनुमत्या सर्वाणि कार्याणि कुर्युस्ते भ्रमं नाप्नुयुः॥३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    हे (होतः) ग्रहीता पुरुष! आप जैसे (होता) सुखदाता जन (इडाभिः) अच्छी शिक्षित वाणियों से (अमर्त्यम्) साधारण मनुष्यों से विलक्षण (आजुह्वानम्) स्पर्द्धा करते हुए (ईडितम्) प्रशंसित (इन्द्रम्) उत्तम विद्या और ऐश्वर्य से युक्त राजपुरुष को (यक्षत्) प्राप्त होवे, जैसे यह (वज्रहस्तः) हाथों में शस्त्र-अस्त्र धारण किये (पुरन्दरः) शत्रुओं के नगरों को तोड़ने वाला (सवीर्यः) बलयुक्त (देवः) विद्वान् जन (देवैः) विद्वानों के साथ (आज्यस्य) विज्ञान से रक्षा करने योग्य राज्य के अवयवों को (वेतु) प्राप्त होवे, वैसे (यज) समागम कीजिये॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे राजा और राजपुरुष पिता के समान प्रजाओं की पालना करें, वैसे ही प्रजा इन को पिता के तुल्य सेवें। जो आप्त विद्वानों की अनुमति से सब काम करें, वे भ्रम को नहीं पावें॥३॥

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    विषय

    होता द्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियों की नियुक्ति और उनके विशेष आवश्यक लक्षण, अधिकार और शक्तियों का वर्णन।

    भावार्थ

    (होता) सर्वाधिकारप्रद विद्वान् (इडाभिः) उत्तम प्राणियों से ( ईडितम् ) स्तुत, प्रशंसा प्राप्त, ( आजुह्वानम् ) शत्रुओं को मैदान में ललकारने वाले, प्रतिस्पर्ध्दी, ( अमर्त्यम् ) साधारण मनुष्यों से विशेष बलशाली, ( इन्द्रम् ) परम ऐश्वर्यवान् पुरुष को ( यक्षत् ) अधिकार प्रदान करे | वह (देवः) विद्वान्, कान्ति और तेज वाला, सबको रुचिकर, (देवैः) विजिगीषा या विजय की इच्छा करने वाले वीर सैनिकों से (सवीर्यः) वीर्यवान् होकर (वज्रहस्तः) शस्त्रास्त्रों और उनसे सम्पन्न सैन्य- बल को अपने हाथ में अर्थात् वश में लेकर (पुरन्दरः) शत्रुओं के गढ़ तोड़ने में समर्थ होकर (आज्यस्य वेतु) युद्ध से प्राप्त राज्य को प्राप्त करे । हे (होत: यज) ! विद्वन् तू अधिकार प्रदान कर । देखो अ० २१ । ३२ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    स्वराट् पंक्तिः । पंचमः ॥

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    विषय

    वज्रहस्त पुरन्दर

    पदार्थ

    १. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (यक्षत्) = अपने साथ संगत करता है, (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली (इडाभिः ईडितम्) = वेदवाणियों से स्तुति किये गये प्रभु को (अजुह्वानम्) = जो सभी से पुकारा जाता है। सज्जन तो प्रातः सायं शक्ति व शान्ति की प्राप्ति के लिए प्रभु का आराधन करते ही हैं, दुर्जन भी कष्ट आने पर प्रभु को ही पुकारते हैं। (अमर्त्यम्) = वे प्रभु अमरणधर्मा हैं । २. (देवः) = वे प्रभु देव हैं। (देवैः) = सब देवों के साथ उनका निवास है, और सब देव उस प्रभु के कारण ही देवत्व को प्राप्त हुए हैं। प्रभु के सम्पर्क में आनेवाला यह होता भी ('देव:') = देव बनता है, (देवैः) = दिव्य गुणों से अपने जीवन को अलंकृत करता है। (सवीर्यः) = यह पराक्रमशाली बनता है, वज्रहस्तः- क्रियाशील हाथोंवाला होता है और पुरन्दरः = इन शरीररूप पुरियों का विदारण करता है, अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठकर मुक्त हो जाता है । ३. इसी उद्देश्य से जीव को चाहिए कि वह आज्यस्य वेतु-शक्ति का पान करनेवाला बने, सोम, अर्थात् वीर्य को शरीर में ही सुरक्षित रक्खे। इस प्रकार सोम का पान करनेवाले (होतः) = सदा दानपूर्वक अदन करनेवाले ! तू (यज) = दान देनेवाला बन और उस प्रभु से अपना मेल बना।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु वेदवाणियों से स्तुत होते हैं। उन प्रभु से मेल बनाकर जीव भी देव बनता है। जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठता है, अतः जीव को चाहिए कि शक्ति की रक्षा करे और दानशील बनकर प्रभु को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो ।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसे राजे व राजपुरुष पित्याप्रमाणे प्रजेचे पालन करतात तसे प्रजेने त्यांना पित्याप्रमाणे समजावे. जे आप्त विद्वानांच्या अनुमतीने सर्व काम करतात ते भ्रमात अडकत नाहीत.

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    विषय

    पुनश्‍च, तोच विषय -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे (होत:) ग्रहीता मनुष्य, जसा एक (होता) सुखदाता मनुष्य, (इडाभिः) आपल्या सुसंस्कृत वाणी द्वारे (प्रार्थना करीत) (अमर्त्यम्) साधारण माणसांपेक्षा वेगळे विलक्षण अशा (आजुह्वानम्) पुढे पुढे जाणार्‍या (ईडितम्) प्रशंसनीय (इन्द्रम्) विद्या व ऐश्‍वर्ययुक्त राजपुरूषाला (यक्षत्) प्राप्त करतो (त्याला सहाय्यासाठी हाक मारतो) तेव्हा हा (वज्रहस्तः) हाती अस्त्र-शस्त्र धारण केलेला पुरन्दरः) शत्रूच्या नगरांना छिन्न-भिन्न करणारा हा (सुवीर्यः) बूलशाली (देवः) विद्वान राजपुरूष (देवैः) अन्य विद्वान सेनानायकांसह (आज्यस्य) विज्ञान व रणनीतीद्वारे राज्याच्या विवधि प्रदेशांकडे (वेतु) रक्षणासाठी त्वरित येतो, तसा तूदेखील (यज) रक्षणासाठी त्या राजपुरूषाची संगती करीत जा. ॥3॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. ज्याप्रमाणे राजाने आणि राजपुरूषांनी पित्याप्रमाणे प्रजाजनांचे पालन केले पाहिजे, त्याप्रमाणे प्रजेनेदेखील राजा व राजपुरूषाला पितासमान मानून त्यांची सेवा केली पाहिजे. तसेच जे लोक आत विद्वानांच्या अनुमतीने सर्व कार्यें करतात, ते भ्रम-संदेहात सापडत नाहीत. ॥3॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O sacrificer, just as the pleasure-giving person, with well-trained modes of speech, wins the king equipped with knowledge and supremacy, above the ordinary run of mankind, full of rivalry against foes, praised and just as he, the thunder-wielder, the breaker-down of the enemies, cities, full of power, learned, performs with the help of the learned, the duties of a ruler, so shouldst thou cultivate friendly inter-course with him.

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    Meaning

    Let the man of yajna, with the holiest words and oblations offer yajna and service to Indra, immortal ruler of the world, honoured and worshipped by the noblest powers. And he, brilliant and generous, mighty of strength, wielder of the thunderbolt in hand, destroyer of the enemy forts, would lead you to the best and sweetest gifts of a prosperous society. Man of yajna, maintain the yajna, don’t relent.

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    Translation

    The sacrificer worships with praises (ida) the resplendent Lord, praised and invoked (by worshippers), the immortal one. May the divine Lord, full of vigour, wielder of thunderbolt, subduer of (enemy's) cities, enjoy it. O sacrificer, offer oblations of purified butter. (1)

    Notes

    Idabhiḥ iditam, worshipped or praised with praises. Ājuhvānam, आहूयमानम्, being invoked; invited. Saviryaḥ, full of vigour. Vajrahastaḥ, wielder of thun der-bolt. Purandarah, breaker or subduer of the cities or the castles (of enemies).

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ–হে (হোতঃ) গ্রহীতা পুরুষ! আপনি যেমন (হোতা) সুখদাতা ব্যক্তি (ইডাভিঃ) উত্তম শিক্ষিত বাণী দ্বারা (অমর্ত্যম্) সাধারণ মনুষ্য হইতে বিলক্ষণ (আজুহ্বানম্) স্পর্দ্ধা করিয়া (ঈডিতম্) প্রশংসিত (ইন্দ্রম্) উত্তম বিদ্যা ও ঐশ্বর্য্য দ্বারা যুক্ত রাজপুরুষকে (য়ক্ষৎ) প্রাপ্ত হউন যেমন এই (বজ্রহস্তঃ) হস্তে অস্ত্র শস্ত্র ধারণ করিয়া (পুরন্দরঃ) শত্রুদিগের নগর ভঙ্গকারী (সবীর্য়ঃ) বলযুক্ত (দেবঃ) বিদ্বান্ ব্যক্তি (দেবৈঃ) বিদ্বান্দিগের সহ (আজ্যস্য) বিজ্ঞান দ্বারা রক্ষণীয় রাজ্যের অবয়ব সকলকে (বেতু) প্রাপ্ত হউন তদ্রূপ (য়জ) সংগতি করুন ॥ ৩ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যেমন রাজা ও রাজপুরুষ পিতা সদৃশ প্রজাদিগের পালন করিবে সেইরূপই প্রজা ইহাকে পিতৃতুল্য সেবন করিবে । যাহারা আপ্ত বিদ্বান্দিগের অনুমতি পূর্বক সকল কাজ করিবে, তাহারা ভ্রমের মধ্যে থাকিবে না ॥ ৩ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    হোতা॑ য়ক্ষ॒দিডা॑ভি॒রিন্দ্র॑মীডি॒তমা॒জুহ্বা॑ন॒মম॑র্ত্যম্ ।
    দে॒বো দে॒বৈঃ সবী॑র্য়ো॒ বজ্র॑হস্তঃ পুরন্দ॒রো বেত্বাজ্য॑স্য॒ হোত॒র্য়জ॑ ॥ ৩ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    হোতেত্যস্য বৃহদুক্থো বামদেব ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । স্বরাট্পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
    পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥

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