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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 11
    ऋषिः - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
    49

    पै॒द्वस्य॑ मन्महे व॒यं स्थि॒रस्य॑ स्थि॒रधा॑म्नः। इ॒मे प॒श्चा पृदा॑कवः प्र॒दीध्य॑त आसते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पै॒द्वस्य॑ । म॒न्म॒हे॒ । व॒यम् । स्थि॒रस्य॑ । स्थि॒रऽधा॑म्न: । इ॒मे । प॒श्चा । पृदा॑कव: । प्र॒ऽदीध्य॑त: । आ॒स॒ते॒ ॥४.११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पैद्वस्य मन्महे वयं स्थिरस्य स्थिरधाम्नः। इमे पश्चा पृदाकवः प्रदीध्यत आसते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पैद्वस्य । मन्महे । वयम् । स्थिरस्य । स्थिरऽधाम्न: । इमे । पश्चा । पृदाकव: । प्रऽदीध्यत: । आसते ॥४.११॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 11
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    हिन्दी (4)

    विषय

    सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (स्थिरस्य) स्थिर स्वभाववाले (स्थिरधाम्नः) स्थिरः तेजवाले (पैद्वस्य) शीघ्रगामी [पुरुष] का (वयम्) हम (मन्महे) चिन्तन करते हैं। (इमे) यह (प्रदीध्यतः) क्रीड़ा करते हुए (पृदाकवः) फुँसकारनेवाले [साँप] (पश्चा) पीछे (आसते) बैठते हैं ॥११॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य कुटिल साँप के समान छिपे उपद्रवियों का खोज लगाते हैं, वे संसार में स्मरणीय होते हैं ॥११॥

    टिप्पणी

    ११−(पैद्वस्य) म० ५। शीघ्रगामिनः पुरुषस्य। अधीगर्थदयेशां कर्मणि। पा० २।३।५२। इति षष्ठी (मन्महे) चिन्तयामः। स्मरामः (वयम्) (स्थिरस्य) दृढस्वभावस्य (स्थिरधाम्नः) दृढतेजस्कस्य (इमे) (पश्चा) तलोपः। पश्चात् (पृदाकवः) कुत्सितशब्दकारकाः। सर्पाः (प्रदीध्यतः) वर्तमाने पृषद्बृहन्०। उ० २।८४। दीधीङ् दीप्तिदेवनयोः-अति। कीडन्तः (आसते) तिष्ठन्ति ॥

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    विषय

    पृदाकव: प्रदीध्यतः

    पदार्थ

    १. (वयम्) = हम (स्थिरस्य) = स्थिरवृत्तिवाले, (स्थिरधाम्न:) = स्थिर तेजवाले. (पैद्वस्य) = गतिशील व्यक्ति का (मन्महे) = मनन करते हैं, इसके जीवन का चिन्तन करते हैं। (इमे) = ये पैट लोग (पृदाकव:) = [पृदाकु] पालन के लिए दान की वृत्तिवाले (प्रदीध्यतः) = [दीधीङ्दीप्तौ] दीस जीवनवाले (पश्चा आसते) = विषय-व्यावृत होकर पीछे ही बैठते हैं। प्रत्याहार' की साधना करते हुए ये लोग विषयों में नहीं फैसते।

    भावार्थ

    स्थिर, स्थिरधाम्ना, पैद' लोगों का चिन्तन करते हुए हम भी 'गतिशील, स्थिर वृत्तिवाले व स्थिर तेजवाले' बनें। दान की वृत्तिवाले व दीप्त जीवनवाले बनकर हम विषय व्यावृत रहें।

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    भाषार्थ

    (स्थिरस्य) स्थिरता से लड़ने वाले, (स्थिर धाम्नः) तथा स्थिर तेज वाले (पैद्वस्य) पैद्व के [बल को] (वयम् मन्महे) हम मानते हैं। (इमे पृदाकवः) ये पृदाकु-सांप (प्रदीध्यतः) विष के कारण प्रदीप्त हुए (पश्चा) पीछे (आसते) बैठे रहते हैं।

    टिप्पणी

    [पैद्व, पृदाकुओं के साथ युद्ध में स्थिरता पूर्वक लड़ता है, और इस का युद्ध सम्बन्धी तेज अर्थात्, शौर्य निर्बल नहीं पड़ता। इस की सत्ता में पृदाकु, विषैले होते हुए भी, पीछे हट कर बैठे रहते हैं। प्रदीध्यतः = प्र + दीधीङ् दीप्ति देवनयोः (अदादिः); अर्थात् विषाग्नि से प्रदीप्त। आसते= आस उपवेशने (अदादिः)]

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    विषय

    सर्प विज्ञान और चिकित्सा।

    भावार्थ

    (वयम्) हम (स्थिरस्य) स्थिर (स्थिरधाम्नः) स्थिरवीर्य वाले (पैद्वस्य) पैद्व=अश्व नामक औषधि के बल से विष को हम (मन्महे) स्तम्भित करते हैं। उसी के बल पर (इमे) ये (पृदाकवः) पृदाकु नामक महासर्प (पश्चा) पीछे हट कर (प्रदीध्यतः) विशेष रूप से, चिन्तामग्न से होकर (आसते) खड़े रह जाते हैं।

    टिप्पणी

    (च०) ‘दीध्यतासते’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Snake poison cure

    Meaning

    We recognise and value the presence of Paidva, Ashvagandha or Karnika plant, which is steady and stable in place. Because of this, these poisonous snakes, deadly and raging, stay back. (Paidva has also been interpreted as the mongoose which fights and kills snakes.)

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    Translation

    With appreciation, we think of paidva, steady, and of fixed abode behind there these vipers lie thinking of us.

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    Translation

    We think of the influence of paidva plant-which is stable and of permanent effect. Through this these serpents become crouched down and stand back frustrated.

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    Translation

    We fix our thoughts on Paidva, steady in nature, and strong in lustre, seeing which these serpents crouch behind.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ११−(पैद्वस्य) म० ५। शीघ्रगामिनः पुरुषस्य। अधीगर्थदयेशां कर्मणि। पा० २।३।५२। इति षष्ठी (मन्महे) चिन्तयामः। स्मरामः (वयम्) (स्थिरस्य) दृढस्वभावस्य (स्थिरधाम्नः) दृढतेजस्कस्य (इमे) (पश्चा) तलोपः। पश्चात् (पृदाकवः) कुत्सितशब्दकारकाः। सर्पाः (प्रदीध्यतः) वर्तमाने पृषद्बृहन्०। उ० २।८४। दीधीङ् दीप्तिदेवनयोः-अति। कीडन्तः (आसते) तिष्ठन्ति ॥

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