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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 21
    ऋषिः - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - ककुम्मत्यनुष्टुप् सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
    51

    ओष॑धीनाम॒हं वृ॑ण उ॒र्वरी॑रिव साधु॒या। नया॒म्यर्व॑तीरि॒वाहे॑ नि॒रैतु॑ ते वि॒षम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ओष॑धीनाम् । अ॒हम् । वृ॒णे॒ । उ॒र्वरी॑:ऽइव । सा॒धु॒ऽया । नया॑मि । अर्व॑ती:ऽइव । अहे॑ । नि॒:ऽऐतु॑ । ते॒ । वि॒षम् ॥४.२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया। नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ओषधीनाम् । अहम् । वृणे । उर्वरी:ऽइव । साधुऽया । नयामि । अर्वती:ऽइव । अहे । नि:ऽऐतु । ते । विषम् ॥४.२१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 21
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (ओषधीनाम्) ओषधियों में से (उर्वरीः इव) बड़ों को मिलने योग्य [ओषधियों] को (साधुया) योग्यता से (अहम्) मैं (वृणे) अङ्गीकार करता हूँ। और (अर्वतीः इव) बड़ी बुद्धिमती [स्त्रियों] के समान (नयामि) मैं लाता हूँ, (अहे) हे महाहिंसक [साँप !] (ते विषम्) तेरा विष (निरैतु) निकल जावे ॥२१॥

    भावार्थ

    वैद्य लोग रोगनिवृत्ति के लिये उत्तम ओषधियों को ऐसे आदर से ग्रहण करें, जैसे विद्वान् गुणवती बुद्धिमती स्त्रियों का मान करते हैं ॥२१॥

    टिप्पणी

    २१−(ओषधीनाम्) (अहम्) (वृणे) अङ्गीकरोमि (उर्वरीः) उरु+ऋ गतिप्रापणयोः-अच्, ङीप्। उरुभिर्महद्भिः प्रापणीया ओषधीः (इव) पादपूरणः (साधुया) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेर्याजादेशः। साधुना धर्मेण सह (नयामि) प्रापयामि (अर्वतीः) अ० ६।९२।२। ऋ गतिप्रापणयोः-वनिप्। अर्वणस्त्रसावनञः। पा० ६।४।१२७। इति तृ, उगित्वाद् ङीप् बुद्धिमतीः स्त्रीः। अर्वतीः प्रशस्तबुद्धिमत्यः कन्याः-दयानन्दभाष्ये, ऋ० १, ३ (इव) यथा (अहे) हे सर्प (निरैतु) बहिरागच्छतु (ते) तव ॥

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    विषय

    ओषधिवरण

    पदार्थ

    १. हे (अहे) = हिंसावृत्ते! (अहं) = मैं (ओषधीनाम्) = [आचार्यो मृत्युवरुण ओषधयः पयः] आचार्यों का (वृणे) = वरण करता हूँ। (इव) = जिस प्रकार (उर्वरी:) = उपजाऊ भूमियों [fertile soil] का (साधुया) = उत्तमता से वरण किया जाता है। इन उपजाऊ भूमियों का वरण अन्नों को प्राप्त कराता है। इसी प्रकार आचार्यों का वरण ज्ञान-जलों को प्राप्त कराता है। २. इन आचार्यों से प्राप्त ज्ञान जलों को मैं इसप्रकार (नयामि) = अपने जीवन में प्राप्त कराता हूँ, (इव) = जैसेकि (अर्वती:) = [अw to kill] शत्रुसंहारक घोड़ियों को योद्धा युद्धभूमि में प्राप्त कराता है, अत: हे हिंसावृत्ते! (ते विषम् निरैतु)-तेरा विष मेरे जीवन से बाहर निकल जाए।

    भावार्थ

    आचार्यों का वरण करते हुए हम ज्ञान-जलों में हिंसा की वृत्तियों के विष को धो डालें। ज्ञान हमसे द्वेष व हिंसा को दूर कर दे।

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    भाषार्थ

    (अहम्) मैं (साधुया) ठीक ढंग से (ओषधीनाम्) ओषधियों में से (उर्वरोः) उर्वरा ओषधियों का (वृणे) चुनाव करता हूं, और (अर्वतीः) विषनाशक ओषधियों को (नयामि) प्राप्त करता हूं, (अहे) हे सांप ! (ते) तेरा (विषम्) विष (निरैतु) निकल जाय।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में "इव" पद पादपूरणार्थक है। यथा “इवोऽपि दृश्यते, सुविदुरिव, सुविज्ञायेते इव" (निरुक्त १।३।११)। ओषधियां दो प्रकार की होती हैं, (१) "उर्वरीः" अर्थात् उत्पादिका संवर्धन शीला; (२) तथा रोगनाशिका। संवर्धनशीला का अभिप्राय है स्वास्थ्य का संवर्धन करने वाली, बढ़ाने वाली। तथा "अर्वतीः" का अभिप्राय है रोगनाशिका, प्रकरणानुसार विषनाशिका। अर्वतीः= अर्व हिंसायाम् (भ्वादिः)। अर्वतीः= ओषधियों द्वारा विष का नाश कर, उर्वरीः ओषधियों द्वारा स्वास्थ्य संवर्धन का निर्देश मन्त्र में हुआ है। नयामि (णीञ् प्रापणे, स्वादिः)]।

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    विषय

    सर्प विज्ञान और चिकित्सा।

    भावार्थ

    (अहम्) मैं (ओषधीनाम्) ओषधियों को (उर्वरीः, इव) धान्यों के समान (साधुया) भली प्रकार (वृणे) चुनता हूं। और (अर्वतीः इव) ‘अर्वती’ ओषधि के समान उत्तम गुण वाली ओषधियों को (नयामि) प्राप्त करता हूं जिनसे हे (अहे) सांप (ते) तेरा (विषम्) विष (निः, एतु) शरीर से दूर हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Snake poison cure

    Meaning

    Of the herbal medications, I carefully choose such as may be the freshest and most effective, and use those as are most efficacious against the poison. O snake, let the poison now go out.

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    Translation

    I select carefully the medicinal herbs. I fetch them with case like those grown on fertile lands. O snake, may your venom, go away like fast speeding mares.

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    Translation

    I, like corns, pick up well the fibres from the herbaceous plants and bring with us the herbs of salutary effect so that the venom of snake be depart away.

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    Translation

    As from the salutary plants I deftly pick out the efficacious ones, and guide them like intelligent girls, so let thy venom, Snake! depart.

    Footnote

    Just as intellectual girls are honored by learned persons, so should physicians collect good herbs and utilize them. The word अर्वतीः has been translated by Griffith as a mare. Rishi Dayananda translates it thus, अर्वतीः प्रशस्तबुद्धिमत्याः कन्याः Rigveda translation 1-145-3, i.e. intelligent girls.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २१−(ओषधीनाम्) (अहम्) (वृणे) अङ्गीकरोमि (उर्वरीः) उरु+ऋ गतिप्रापणयोः-अच्, ङीप्। उरुभिर्महद्भिः प्रापणीया ओषधीः (इव) पादपूरणः (साधुया) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेर्याजादेशः। साधुना धर्मेण सह (नयामि) प्रापयामि (अर्वतीः) अ० ६।९२।२। ऋ गतिप्रापणयोः-वनिप्। अर्वणस्त्रसावनञः। पा० ६।४।१२७। इति तृ, उगित्वाद् ङीप् बुद्धिमतीः स्त्रीः। अर्वतीः प्रशस्तबुद्धिमत्यः कन्याः-दयानन्दभाष्ये, ऋ० १, ३ (इव) यथा (अहे) हे सर्प (निरैतु) बहिरागच्छतु (ते) तव ॥

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