अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 13
ऋषिः - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
38
ह॒तास्तिर॑श्चिराजयो॒ निपि॑ष्टासः॒ पृदा॑कवः। दर्विं॒ करि॑क्रतं श्वि॒त्रं द॒र्भेष्व॑सि॒तं ज॑हि ॥
स्वर सहित पद पाठह॒ता: । तिर॑श्चिऽराजय: । निऽपि॑ष्टास: । पृदा॑कव: । दर्वि॑म् । करि॑क्रतम् । श्वि॒त्रम् । द॒र्भेषु॑ । अ॒सि॒तम् । ज॒हि॒ ॥४.१३॥
स्वर रहित मन्त्र
हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः। दर्विं करिक्रतं श्वित्रं दर्भेष्वसितं जहि ॥
स्वर रहित पद पाठहता: । तिरश्चिऽराजय: । निऽपिष्टास: । पृदाकव: । दर्विम् । करिक्रतम् । श्वित्रम् । दर्भेषु । असितम् । जहि ॥४.१३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(तिरश्चिराजयः) तिरछी धारीवाले (पृदाकवः) फुँसकारनेवाले [साँप] (हताः) मार डाले गये और (निपिष्टासः) कुचिल डाले गये [हों]। (दर्भेषु) दाभों में (दर्विम्) फन को (करिक्रतम्) बड़ा करनेवाले, (श्वित्रम्) श्वेत और (असितम्) काले [साँप] को (जहि) मार डाल ॥१३॥
भावार्थ
मनुष्य महाउपद्रवियों को साँपों के समान मारें ॥१३॥
टिप्पणी
१३−(हताः) नाशिताः (तिरश्चिराजयः) अ० ३।२७।२। तिर्यगवस्थितरेखाः (निपिष्टासः) अत्यन्तचूर्णिताः (पृदाकवः) कुत्सितशब्दाः। सर्पाः (दर्विम्) अ० ४।१४।७। दॄ विदारणे-विन्। सूपचालनपात्रवद्विदारकं फणम् (करिक्रतम्) दाधर्तिदर्धर्ति०। पा० ७।४।६५। करोतेर्यङ्लुकि शतृ। भृशं कुर्वन्तम् (श्वित्रम्) म० ५। श्वेतम् (दर्भेषु) काशेषु (असितम्) म० ५। कृष्णम् (जहि) नाशय ॥
विषय
दर्विम् करिक्रतं [जहि]
पदार्थ
१. (तिरश्चिराजय:) = कुटिलता [crooked] व छल-छिद्र की पंक्तियाँ (हता:) = नष्ट की गई हैं। (पृदाकव:) = [पिपर्ति स्वम्, 'पिपर्तेर्दाकुर्हस्वश्च'] आत्मम्भरिता व स्वार्थ को वृत्तियाँ (निपिष्टास:) = पीस डाली गई हैं। २. (दर्विम्) = विदारण की वृत्ति को (करिक्रतम्) = अतिशयेन कृन्तन [छेदन] की वृत्ति को (श्वित्रम्) = कुष्ठादि रोगों को व (असितम्) = कृष्ण [मलिन] कर्मों को (दर्भेषु) = यज्ञार्थ यज्ञवेदि पर कुशाओं के आस्तिर्ण होने पर (जहि) = नष्ट कर डाल।
भावार्थ
हम यज्ञशील बनें। यज्ञीय वृत्ति के द्वारा हम 'कुटिलता, स्वार्थ, विदारणवृत्ति, छेदन-भेदन की वृत्ति, रोगों व अशुभ कर्मों को नष्ट कर डालें।'
भाषार्थ
(तिरश्चिराजयः) टेढ़ी धारियों वाले सर्प (हताः) मार दिये हैं (पृदाकवः) पृदाकु-सर्प (निपिष्टासः) पीस दिये हैं। (दर्विम्) कड़छीसदृश फण (करिक्रतम्) फैलाने वाले को, (श्वित्रम्) सुफेदकुष्ठ सदृश वर्ण वाले को, (दर्भेषु) दर्भ-घासों में रहने वाले (असितम्) काले सांप को (जहि) तू मार डाल।
टिप्पणी
[जहि = वज्री इन्द्र को या पैद्व को कहा है कि तू मार डाल]।
विषय
सर्प विज्ञान और चिकित्सा।
भावार्थ
(तिरश्वि-राजयः) तिरछी धारियों वाले सर्प (हताः) मार दिये गये और (पृदाकवः) ‘पृदाकु’ नामक मूषक-भक्षक सर्प भी (निपिष्टासः) सर्वथा पीस डाले जा सकते हैं। (दर्विम्) ‘दर्वी’ कड़छे के आकार के फण वाले नाग को (करिक्रतम्) और करिक्रत्=‘कडैत’ नामक काले सांप को और (श्वित्रम्) श्वेत ‘श्वित्र’ नामक सांप को और (असितं) असित, काल नामक सर्प को भी हे पुरुष ! (दर्भेषु) उपरोक्त दाभ या कुशाओं के बल पर (जहि) मार। अथवा (दर्भेषु) सर्पनाशक पदार्थों के बल पर उनका नाश करो।
टिप्पणी
(तृ०) ‘दर्वि कनिक्रदं’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Snake poison cure
Meaning
Killed are the snakes with stripes, crushed are the poisonous ones. O Paidva, O Indra, kill the Darvi that spreads its hood, the white one and the black hiding in the grasses.
Translation
Killed are the snakes with crossed lines (tirasci-rajayah); crushed are the vipers (prdāku). Kill the hooded snake (cobra), karikratam, white and also the black snake in the kusa grass.
Translation
The serpents in row have been slain, Pridakus, the most venomous ones are brayed to bits. O Man! kill snakes called as Darvi, Karikrat, Shvitra and Asita in the Darbha-grass.
Translation
Serpents with transverse streaks have been slain, and vipers crushed and brayed to bits. Slay Darvi, Karikrata, white and black serpents in the Durbha grass.
Footnote
Darvi and Karikrata are species of serpents.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१३−(हताः) नाशिताः (तिरश्चिराजयः) अ० ३।२७।२। तिर्यगवस्थितरेखाः (निपिष्टासः) अत्यन्तचूर्णिताः (पृदाकवः) कुत्सितशब्दाः। सर्पाः (दर्विम्) अ० ४।१४।७। दॄ विदारणे-विन्। सूपचालनपात्रवद्विदारकं फणम् (करिक्रतम्) दाधर्तिदर्धर्ति०। पा० ७।४।६५। करोतेर्यङ्लुकि शतृ। भृशं कुर्वन्तम् (श्वित्रम्) म० ५। श्वेतम् (दर्भेषु) काशेषु (असितम्) म० ५। कृष्णम् (जहि) नाशय ॥
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