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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 12
    ऋषिः - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - भुरिग्गायत्री सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
    47

    न॒ष्टास॑वो न॒ष्टवि॑षा ह॒ता इ॑न्द्रेण व॒ज्रिणा॑। ज॒घानेन्द्रो॑ जघ्नि॒मा व॒यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न॒ष्टऽअ॑सव: । न॒ष्टऽवि॑षा: । ह॒ता: । इन्द्रे॑ण । व॒ज्रिणा॑ । ज॒घान॑ । इन्द्र॑: । ज॒घ्नि॒म । व॒यम् ॥४.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नष्टासवो नष्टविषा हता इन्द्रेण वज्रिणा। जघानेन्द्रो जघ्निमा वयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नष्टऽअसव: । नष्टऽविषा: । हता: । इन्द्रेण । वज्रिणा । जघान । इन्द्र: । जघ्निम । वयम् ॥४.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 4; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (वज्रिणा) वज्रधारी (इन्द्रेण) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले मनुष्य] करके (हताः) मारे गये [साँप] (नष्टासवः) प्राणों से नष्ट और (नष्टविषाः) विष से नष्ट [होवें]। (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] ने [साँपों को] (जघान) मारा था, और (वयम्) हम ने (जघ्निम) मारा था ॥१२॥

    भावार्थ

    दुष्टों के मारने में पूर्वजों के समान सब लोग शूर का साथ देवें ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(नष्टासवः) विगतप्राणाः (नष्टविषाः) विगतगरलाः (हताः) मारिताः (इन्द्रेण) परमैश्वर्यवता पुरुषेण (वज्रिणा) वज्रधारिणा (जघान) नाशितवान् (जघ्निम) नाशितवन्तः (वयम्) ॥

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    विषय

    वज्री इन्द्रः

    पदार्थ

    १. (वज्रिणा) = गतिशील [वज् गतौ] (इन्द्रेण) = जितेन्द्रिय पुरुष से (हता:) = मारे हुए काम, क्रोध, लोभ' रूप असुर (नष्टासव:) = नष्ट-प्राण हो जाते हैं और (नष्टविषा:) = इनका विषैला प्रभाव हमारे जीवन से दूर हो जाता है। २. (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (जघान) = इन असुरों को मार डालता है। (वयम् जघ्निमा) = हम भी इन आसुरभावों को नष्ट करनेवाले बनते हैं।

    भावार्थ

    गतिशील, जितेन्द्रिय पुरुष 'काम, क्रोध, लोभ' रूप असुरों का विनाश करके उनके विषैले प्रभाव से बचाता है। हम भी ऐसे ही बनें।

     

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    भाषार्थ

    (वज्रिणा) वज्रधारी (इन्द्रेण) इन्द्र द्वारा (हताः) मारे गये सांप (नष्टासवः) नष्ट प्राण और (नष्टविषाः) नष्ट विष वाले हो गए हैं। (इन्द्रः) इन्द्र ने (जघान) [सांप] मार डाले हैं; (वयम्) हम ने भी (जघ्निमा) मार डाले हैं। [इन्द्र का अर्थ यद्यपि विद्युत् है। परन्तु लक्षणया विद्युत् के प्रयोक्ता को इन्द्र कहा है और विद्युत् को वज्र कहा है]।

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    विषय

    सर्प विज्ञान और चिकित्सा।

    भावार्थ

    (वज्रिणा) वज्र=वीर्य बल वाले (इन्द्रेण) इन्द्र नामक पूर्वोक्त औषध से (हताः) मरे हुए सर्प (नष्टासवः) प्राण रहित और (नष्टविषाः) विष रहित हो जाते हैं। (इन्द्रः जघान) जब ‘इन्द’ औषध उनको मारता है तब उनको (वयम् जघ्निम) हम ही मारते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Snake poison cure

    Meaning

    Void of breath, void of poison, the snakes have been destroyed by Indra with the ‘vajra’, thunderous blow of lightning power. Indra has killed them, we have killed them.

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    Translation

    With destroyed life, with destroyed poison, they lie smitten, by the resplendent one (Indra), bearing the adamantine weapon. The resplendent one has killed; we also kill them.

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    Translation

    These snakes killed by the most efficacious Indra-plant become poisonless and deprived of life. When this Indra-plant kills them we easily kill them.

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    Translation

    Bereft of life and poison they lie slain by the powerful medicine Indra. Indra and we have slaughtered them.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(नष्टासवः) विगतप्राणाः (नष्टविषाः) विगतगरलाः (हताः) मारिताः (इन्द्रेण) परमैश्वर्यवता पुरुषेण (वज्रिणा) वज्रधारिणा (जघान) नाशितवान् (जघ्निम) नाशितवन्तः (वयम्) ॥

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