अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 9
ऋषिः - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सर्पविषदूरीकरण सूक्त
44
अ॑र॒सास॑ इ॒हाह॑यो॒ ये अन्ति॒ ये च॑ दूर॒के। घ॒नेन॑ हन्मि॒ वृश्चि॑क॒महिं॑ द॒ण्डेनाग॑तम् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒र॒सास॑: । इ॒ह । अह॑य: । ये । अन्ति॑ । ये । च॒ । दू॒र॒के । घ॒नेन॑ । ह॒न्मि॒ । वृश्चि॑कम् । अहि॑म् । द॒ण्डेन॑ । आऽग॑तम् ॥४.९॥
स्वर रहित मन्त्र
अरसास इहाहयो ये अन्ति ये च दूरके। घनेन हन्मि वृश्चिकमहिं दण्डेनागतम् ॥
स्वर रहित पद पाठअरसास: । इह । अहय: । ये । अन्ति । ये । च । दूरके । घनेन । हन्मि । वृश्चिकम् । अहिम् । दण्डेन । आऽगतम् ॥४.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(इह) यहाँ पर (अहयः) महाहिंसक [साँप] (अरसासः) नीरस हों, (ये) जो (अन्ति) पास (च) और (ये) जो (दूरके) दूर हैं। (आगतम्) आये हुए (वृश्चिकम्) डङ्क मारनेवाले बिच्छू और (अहिम्) महाहिंसक [साँप] को (घनेन) सोटें वा मोंगरे से और (दण्डेन) दण्डे से (हन्मि) मैं मारता हूँ ॥९॥
भावार्थ
मनुष्य साँप रूप दुःखदायिओं को यथावत् दण्ड देवें ॥९॥
टिप्पणी
९−(अरसासः) अरसाः। सारहीनाः (इह) अत्र (अहयः) म० १। महाहिंसकाः। सर्पाः (ये) (अन्ति) पार्श्वे (ये) (च) (दूरके) दूरे (घनेन) काष्ठस्य लोहस्य वा मुद्गरेण (हन्मि) (वृश्चिकम्) वृश्चिकृषोः किकन्। उ० २।४०। ओव्रश्चू छेदने-किकन्। छेदनशीलम्। कीटभेदम् (अहिम्) (दण्डेन) ञमन्ताड् डः। उ० १।११४। दमु-उपशमे−ड, यद्वा दण्ड दण्डपातने-अच्। दमनसाधनेन लगुडेन (आगतम्) ॥
विषय
वृश्चिक, अहि
पदार्थ
१. (इह) = इस संसार-क्षेत्र में (ये अहयः) = जो हिंसक तत्त्व (अन्ति) = हमारे समीप हैं, (ये च) = और जो (दूरके) = दूर हैं, वे सब (अरसास:) = नीरस व निर्बल हो जाएँ। (आगतं वृश्चिकम्) = समीप आये हुए बिच्छु को (घनेन हन्मि) = घन से नष्ट करता हूँ तथा (अहिम्) = सर्प को (दण्डेन) = डण्डे से मारता हूँ|
भावार्थ
सर्प व बिच्छु स्वभाववाले पुरुषों को दण्डित करना आवश्यक ही है। प्रजा रक्षण के लिए इन्हें नष्ट करना अनिवार्य है।
सूचना
वृश्चिक को घन से, सर्प को डण्डे से आहत करने का स्वारस्य चिन्त्य है।
भाषार्थ
(इह) इस निवास स्थान में (ये) जो (अहयः) सांप (अन्ति) समीप में हैं (ये च) और जो (दूरके) दूर में हैं (अरसासः) वे विषरस से रहित हैं। तो भी (आगतम्, अहिम्) आए हुए सांप को (दण्डेन) दण्ड द्वारा, (वृश्चिकम्) और बिच्छु को (घनेन) हथौड़े द्वारा, (हन्मि) मैं मार डालता हूं।
टिप्पणी
[सांप चाहे हमारे निवास स्थान के समीप में हों, या दूर में, चाहे विषरहित भी हों तो भी उन्हें मार डालना चाहिये, तथा बिच्छुओं को भी मार डालना चाहिये]।
विषय
सर्प विज्ञान और चिकित्सा।
भावार्थ
(ये) जो सांप (अन्ति) समीप हों और (ये च दूरके) जो दूर हों वे भी (अहयः) सांप (इह) इस उपाय से (अरसासः) निर्बल, बलरहित, लाचार हो जाते हैं कि (घनेन) किसी कठोर ताड़ने योग्य हतौड़े से (वृश्चिकम्) बिच्छू को (हन्मि) मारूं और (आगतम्) समीप आये (अहिम्) सांप को (दण्डेन हन्मि) दण्ड से मारूं। अर्थात् दण्ड से सांप और हतौड़े से बिच्छू का मारने के उपाय से सभी पास और दूर के सांप लाचार हैं।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘ये अन्मि तेच’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। गरुत्मान् तक्षको देवता। २ त्रिपदा यवमध्या गायत्री, ३, ४ पथ्या बृहत्यौ, ८ उष्णिग्गर्भा परा त्रिष्टुप्, १२ भुरिक् गायत्री, १६ त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री, २१ ककुम्मती, २३ त्रिष्टुप्, २६ बृहती गर्भा ककुम्मती भुरिक् त्रिष्टुप्, १, ५-७, ९, ११, १३-१५, १७-२०, २२, २४, २५ अनुष्टुभः। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Snake poison cure
Meaning
Let the snakes which are near here and those that are far away be poisonless. I kill the scorpion with a club and the snake with a stick as it comes up.
Translation
May the serpents that are near and that are afar, or without rasa or poison become powerless. With a mace I kill the scorpion (vrscika) and with a stick the snake that comes here. With a hard stick I kill the stinger serpent that comes here.
Translation
Let the serpents which are here, which are near and which are far become powerless and poisonless. I kill the scorpion with a club and approaching snake with stick.
Translation
Powerless be the serpents here, those that are near and those afar. I kill the scorpion with a club, with a staff the coming snake.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(अरसासः) अरसाः। सारहीनाः (इह) अत्र (अहयः) म० १। महाहिंसकाः। सर्पाः (ये) (अन्ति) पार्श्वे (ये) (च) (दूरके) दूरे (घनेन) काष्ठस्य लोहस्य वा मुद्गरेण (हन्मि) (वृश्चिकम्) वृश्चिकृषोः किकन्। उ० २।४०। ओव्रश्चू छेदने-किकन्। छेदनशीलम्। कीटभेदम् (अहिम्) (दण्डेन) ञमन्ताड् डः। उ० १।११४। दमु-उपशमे−ड, यद्वा दण्ड दण्डपातने-अच्। दमनसाधनेन लगुडेन (आगतम्) ॥
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