अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 9
ऋषिः - अथर्वा
देवता - उच्छिष्टः, अध्यात्मम्
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - उच्छिष्ट ब्रह्म सूक्त
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अ॑ग्निहो॒त्रं च॑ श्र॒द्धा च॑ वषट्का॒रो व्र॒तं तपः॑। दक्षि॑णे॒ष्टं पू॒र्तं चोच्छि॒ष्टेऽधि॑ स॒माहि॑ताः ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्नि॒ऽहो॒त्रम् । च॒ । श्र॒ध्दा । च॒ । व॒ष॒ट्ऽका॒र: । व्र॒तम् । तप॑: । दक्षि॑णा । इ॒ष्टम् । पू॒र्तम् । च॒ । उत्ऽशि॑ष्टे । अधि॑ । स॒म्ऽआहि॑ता: ॥९.९॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निहोत्रं च श्रद्धा च वषट्कारो व्रतं तपः। दक्षिणेष्टं पूर्तं चोच्छिष्टेऽधि समाहिताः ॥
स्वर रहित पद पाठअग्निऽहोत्रम् । च । श्रध्दा । च । वषट्ऽकार: । व्रतम् । तप: । दक्षिणा । इष्टम् । पूर्तम् । च । उत्ऽशिष्टे । अधि । सम्ऽआहिता: ॥९.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सब जगत् के कारण परमात्मा का उपदेश।
पदार्थ
(अग्निहोत्रम्) अग्निहोत्र [अग्नि में हवन] (च) और (श्रद्धा) श्रद्धा [भक्ति], (च) और (वषट्कारः) दानकर्म, (व्रतम्) व्रत [नियम] (तपः) तप [चित्त की एकाग्रता], (दक्षिणा) दक्षिणा [प्रतिष्ठा] (इष्टम्) वेदाध्ययन, आतिथ्य आदि (च) और (पूर्तम्) अन्नदानादि पुण्य कर्म (उच्छिष्टे) शेष [म० १। परमात्मा] में (अधि) अधिकारपूर्वक (समाहिताः) एकत्र किये गये हैं ॥९॥
भावार्थ
हवन और शिल्प आदि व्यवहारों में अग्नि का प्रयोग ईश्वर और वेद में श्रद्धा आदि कर्म परमेश्वर ने जगत् के हित के लिये नियत किये हैं ॥९॥
टिप्पणी
९−(अग्निहोत्रम्) अग्नौ होमः (च) (श्रद्धा) भक्तिः (च) (वषट्कारः) अ० १।११।१। वह प्रापणे-डषटि। आहुतिकरणम्। दानक्रिया (व्रतम्) (तपः) चित्तैकाग्र्यम् (दक्षिणा) अ० १।५।१। प्रतिष्ठा (इष्टम्) अ० २।१२।४। वेदाध्यनातिथ्यादि कर्म (पूर्तम्) अ० २।१२।४। अन्नदानादिपुण्यकर्म। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥
विषय
अग्रिहोत्र आदि का आश्रय 'प्रभु'
पदार्थ
१. (अग्निहोत्रं च) = सायं-प्रात: किया जानेवाला अग्निहोत्र [सायं प्रातरग्रिहोत्रं जुहुयात् आप० श्री०६।१५।१४](श्रद्धा च) = यज्ञानुष्ठान विषयक आस्तिक्य बुद्धि, (वषट्कार:) = याज्यान्त में हवि: प्रदान के लिए प्रयुज्यमान 'वषट्' शब्द, (व्रतम्) = असत्य न बोलने का व्रत, (तपः) = मन व इन्द्रियों का एकाग्रतारूप तप (दक्षिणा) = यज्ञ की समाप्ति पर ऋत्विज् के लिए देय द्रव्य, (इष्टम्) = यज्ञ, (पूर्तं च) = वापी, कूप आदि निर्माण, लोकपूरक कर्मों का अनुष्ठान-ये सब (उच्छिष्टे अधि समाहिता:) = उच्छिष्ट प्रभु में ही आश्रित हैं।
भावार्थ
अग्निहोत्र आदि सब कर्मों का आधार प्रभु हैं।
भाषार्थ
(अग्निहोत्रं च श्रद्धा च) अग्निहोत्र तथा श्रद्धा, (वषट्कारः) याज्यामन्त्रों के अन्त में, हवि के प्रदान के लिए, उच्चार्यमाण "वौषट्" शब्द, (व्रतं तपः) व्रतग्रहण तथा तप (दक्षिणा) ऋत्विजों को देय धन, (इष्टम्) याग होम आदि, (पूर्तं च) समाजोपकार के लिये धर्मशाला, कूप आदि का निर्माण (उच्छिष्टे अधि) उच्छिष्ट परमेश्वर में (समाहिताः) समाश्रित है। अर्थात् ये सव कृत्य परमेश्वरार्पित कर; करने चाहिये।
विषय
सर्वोपरि विराजमान उच्छिष्ट ब्रह्म का वर्णन।
भावार्थ
(अग्निहोत्रं च) अग्निहोत्र (श्रद्धा च) और श्रद्धा और (वषट्कारः) वषट्कार, स्वाहाकार (व्रतं तपः) व्रत और तप (दक्षिणा इष्टा पूर्तं च) दक्षिणा यज्ञ और कूप तालाब बनवाने आदि सब परोपकार के पुण्य कार्य (उच्छिष्टे अधि समाहिताः) उत्कृष्टतम, सर्वोपरि प्रतिपाद्य परब्रह्म में ही आश्रित हैं। वह ईश्वर न हो तो ये सब भी न हों।
टिप्पणी
(च०) ‘उच्छिष्टेऽति’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अध्यात्म उच्छिष्टो देवता। ६ पुरोष्णिग् बार्हतपरा, २१ स्वराड्, २२ विराट् पथ्याबृहती, ११ पथ्यापंक्तिः, १-५, ७-१०, २०, २२-२७ अनुष्टुभः। सप्तविंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Ucchhishta, the Ultimate Absolute Brahma
Meaning
Agnihotra, fire yajna as daily ritual, Shraddha, faith in ultimate truth, the offer of oblations with Vashatkara, Vratas, specific vows, Tapa, observance of austerity, Dakshina, gifts to the priest and the guru, Ishta, projects for specific aims, Purta, yajna for thanksgiving, all these abide and subsist in Brahma, the Ultimate Supreme beyond everything else.
Translation
Both the fire-offering (agnihotra) and faith, the vashat-exclamation, the vow (vrata), penance, the sacrificial gift (daksina), what is offered (ista) and what is bestowed (purta) -- are set together in the remnant.
Translation
Agnyadhana, Diksha, the good performances (Yajna) which fulfill the wishes of performers and are performed with the vedic metric verses, Upasanayajna (Brahmayajna) etc. and Sattra all these are contained in Uchchhista.
Translation
Fire-oblation, faith, charitable acts, vow, austerity, priestly guerdon, Vedic study, entertainment of guests, philanthropic acts of public utility depend on God.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(अग्निहोत्रम्) अग्नौ होमः (च) (श्रद्धा) भक्तिः (च) (वषट्कारः) अ० १।११।१। वह प्रापणे-डषटि। आहुतिकरणम्। दानक्रिया (व्रतम्) (तपः) चित्तैकाग्र्यम् (दक्षिणा) अ० १।५।१। प्रतिष्ठा (इष्टम्) अ० २।१२।४। वेदाध्यनातिथ्यादि कर्म (पूर्तम्) अ० २।१२।४। अन्नदानादिपुण्यकर्म। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥
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