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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 126 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 126/ मन्त्र 21
    ऋषिः - वृषाकपिरिन्द्राणी च देवता - इन्द्रः छन्दः - पङ्क्तिः सूक्तम् - सूक्त-१२६
    38

    पुन॒रेहि॑ वृषाकपे सुवि॒ता क॑ल्पयावहै। य ए॒ष स्व॑प्न॒नंश॒नोऽस्त॒मेषि॑ प॒था पुन॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पुन॑: । आ । इ॒हि॒ । वृ॒षा॒क॒पे॒ । सु॒वि॒ता । क॒ल्प॒या॒व॒है॒ ॥ य: । ए॒ष: । स्व॒प्न॒ऽनंश॑न: । अस्त॑म् । एषि॑ । प॒था । पुन॑: । विश्व॑स्मात् । इन्द्र॑: । उत्ऽत॑र ॥१२६.२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुनरेहि वृषाकपे सुविता कल्पयावहै। य एष स्वप्ननंशनोऽस्तमेषि पथा पुनर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पुन: । आ । इहि । वृषाकपे । सुविता । कल्पयावहै ॥ य: । एष: । स्वप्नऽनंशन: । अस्तम् । एषि । पथा । पुन: । विश्वस्मात् । इन्द्र: । उत्ऽतर ॥१२६.२१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 126; मन्त्र » 21
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गृहस्थ के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (वृषाकपे) हे वृषाकपि ! [बलवान् चेष्टा करानेवाले जीवात्मा] तू (पुनः) फिर (आ इहि) आ, (सुविता) ऐश्वर्य कर्मों को (कल्पयावहै) हम दोनों [तू और मैं] विचार कर करें, (यः) जो (एषः) यह तू (स्वप्ननंशनः) स्वप्न नाश करनेवाला [आलस्य छुड़ानेवाला] है, सो तू (पथा) मार्ग से [सन्मार्ग से] (पुनः) फिर (अस्तम्) घर (एषि) पहुँचता है, (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला मनुष्य] (विश्वस्मात्) सब [प्राणी मात्र] से (उत्तरः) उत्तम है ॥२१॥

    भावार्थ

    मनुष्य अपने गिरे हुए आत्मा को सावधानी से ठिकाने पर लाकर ऐश्वर्य बढ़ाता रहे ॥२१॥

    टिप्पणी

    २१−(पुनः) (आ इहि) आगच्छ (वृषाकपे) म० १। हे बलवन् चेष्टयितर्जीवात्मन् (सुविता) प्र० २९।१। ऐश्वर्यकर्माणि (कल्पयावहै) त्वमहं चावामुच्चौ पर्यालोचनं कुर्याव (वः) (एष) स त्वम् (स्वप्ननंशनः) णश अदर्शने नाशे च-ल्युट्। मस्जिनशोर्झलि। पा० ७।१।६०। इति नुम्। स्वप्नस्यालस्यस्य नाशयिता (अन्तम्) गृहम् (एषि) गच्छसि (पथा) सन्मार्गेण (पुनः)। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    स्वप्न-नंशनः [नींद से उठ बैठना]

    पदार्थ

    १. हे (वृषाकपे) = वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले वृषाकपे! तू (पुन:) = फिर (एहि) = घर में प्राप्त हो। इधर-उधर भटकने की अपेक्षा तू मन को निरुद्ध करके हृदय में आत्मदर्शन करनेवाला हो। प्रभु कहते हैं कि मैं और तू मिलकर (सुविता) = उत्तमकों को [सु-इता] (कल्पयावहै) = करनेवाले हों। जीव प्रभु की शक्ति का माध्यम बने, जीव के माध्यम से प्रभु शक्ति उत्तम कार्यों को सिद्ध करनेवाली हो। २. जीव इस दुनिया की चमक में अपने कर्तव्य को भूल जाता है और अपने लक्ष्य को वह सदा भूला-सा रहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह सो गया हो। अब (स्वप्ननंशन:) = इस नींद को समास करनेवाला तू अपने लक्ष्य का स्मरण करता है और (अस्तम् एषि) = फिर से घर में आता है। (पुन:) = फिर (पथा) = ठीक मार्ग से चलता हुआ हृदयरूप गृह में प्रभु का दर्शन करता है और अनुभव करता है कि (इन्द्रः) = यह परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (विश्वस्मात् उत्तर:) = सबसे उत्कृष्ट है।

    भावार्थ

    इस संसार में हमें सोते नहीं रह जाना। जागकर लक्ष्य की ओर बढ़ना है। प्रभु की शक्ति का माध्यम बनकर सदा उत्तम कर्मों को करना है।

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    भाषार्थ

    (वृषाकपे) हे वृषाकपि! (पुनः) तू बार-बार (एहि) मुझ परमेश्वर की ओर आ, ताकि हम दोनों एक-दूसरे के (सुविता=सुवितानि) स्वागत (कल्पयावहै) करते रहें। (य एषः) जो यह तू जब (स्वप्ननंशः) सांसारिक-भोगों के स्वप्नों को विनष्ट कर देगा, तब तू (पथा) इस योगमार्ग द्वारा, (पुनः) बार-बार (अस्तम्) असली घर जो मैं हूँ उसे, (एषि) प्राप्त करेगा। (विश्वस्मात् इन्द्र उत्तरः) देख परमेश्वर ही सर्वोत्कृष्ट है। [सुविता=सु+इत=सु+आगत=स्वागत।]

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    विषय

    जीव, प्रकृति और परमेश्वर।

    भावार्थ

    हे जीव ! विद्वन् ! हे (वृषाकपे) बलवान् होकर आनंदरस का पान करने हारे मुमुक्षो ! (पुनः एहि) तू फिर आ, लौट आ. संसार में न भटक कर पुनः ईश्वर रूप शरण को प्राप्त हो। हम दोनों. ईश्वर और प्रकृति मिलकर पुत्र के लिये माता पिता के समान (सुविता) तेरे लिये सुख, कल्याणजनक फल ही (कल्पयावहै) उत्पन्न करेंगे। (यः एषः) जो तू (स्वप्नंशनः) स्वप्न, निद्रा और प्रमाद और मृत्यु को दूर करता हुआ आदित्य के समान (पथा,) सन्मार्ग से. इस मोक्ष मार्ग से (पुनः अस्तम् एषि) फिर गृह के समान शरणरूप परमेश्वर को प्राप्त हो। जिस प्रकार सूर्य उदय होकर पुनः अस्त को प्राप्त होता है इसी प्रकार तेजस्वी मुमुक्षु भी मोक्ष मार्ग से अस्त अर्थात् शरण रूप ईश्वर को प्राप्त हो। जहां वह सूर्य के समान ही महान् आनन्द सागर में अस्त हो जाय, विलीन, मग्न होजाय।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वृषाकपिरिन्द्र इन्द्राणी च ऋषयः। इन्द्रो देवता। पंक्तिः। त्रयोविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    O Vrshakapi, come again and both of us would create good things for your peace and comfort in well being. Thus destroying the state of dream and sleep, this lover of showers and breeze, Vrshakapi, comes home by the paths of existence and piety again and again. Indra is supreme over all the world.

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    Translation

    O soul, you assume body again after death. I, the Almighty God and this matter, this body are for you. You treading the path free from sleep and ignorance come to my shelter. The Almighty God is rarest of all and supreme over all.

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    Translation

    O soul, you assume body again after death. I, the Almighty God and this matter, this body are for you. You treading the path free from sleep and ignorance come to my shelter. The Almighty God is rarest of all and supreme over all.

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    Translation

    Surely that is genetic energy of human beings, which together creates twenty Organs i.e., five sense-organs, five action-organs, four Antashkaran मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार. and 20th body. O soul that has been for the goodand well-being of her, whose belly thou hast been painting. Mighty Lord is far supreme to all.

    Footnote

    This verse is inexplicable to the western scholars because they want to read history therein, whereas it simply explains a biological truth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २१−(पुनः) (आ इहि) आगच्छ (वृषाकपे) म० १। हे बलवन् चेष्टयितर्जीवात्मन् (सुविता) प्र० २९।१। ऐश्वर्यकर्माणि (कल्पयावहै) त्वमहं चावामुच्चौ पर्यालोचनं कुर्याव (वः) (एष) स त्वम् (स्वप्ननंशनः) णश अदर्शने नाशे च-ल्युट्। मस्जिनशोर्झलि। पा० ७।१।६०। इति नुम्। स्वप्नस्यालस्यस्य नाशयिता (अन्तम्) गृहम् (एषि) गच्छसि (पथा) सन्मार्गेण (पुनः)। अन्यद् गतम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    গৃহস্থকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (বৃষাকপে) হে বৃষাকপি! [দৃঢ় প্রচেষ্টাকারী জীবাত্মা] তুমি (পুনঃ) পুনরায় (আ ইহি) এসো, (সুবিতা) ঐশ্বর্য কর্মসমূহ (কল্পয়াবহৈ) আমরা উভয়েই [তুমি এবং আমি] বিচার করি/করবো, (যঃ) যে (এষঃ) সেই তুমি (স্বপ্ননংশনঃ) স্বপ্ন নাশকারী [আলস্য বিনাশকারী], সেই তুমি (পথা) মার্গে [সন্মার্গে] (পুনঃ) পুনরায় (অস্তম্) গৃহে (এষি) পৌঁছাও, (ইন্দ্রঃ) ইন্দ্র [মহান ঐশ্বর্যবান মনুষ্য] (বিশ্বস্মাৎ) সব [প্রাণী মাত্র] থেকে (উত্তরঃ) উত্তম॥২১॥

    भावार्थ

    মনুষ্য নিজের পতিত আত্মাকে সাবধানে/সযত্নে সঠিক স্থানে নিয়ে এসে ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করুক ॥২১॥

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    भाषार्थ

    (বৃষাকপে) হে বৃষাকপি! (পুনঃ) তুমি বার-বার (এহি) আমার [পরমেশ্বরের] দিকে এসো/আগমন করো, যাতে আমরা উভয় একে-অপরের (সুবিতা=সুবিতানি) স্বাগত (কল্পয়াবহৈ) করতে থাকি। (য এষঃ) যে এই তুমি যখন (স্বপ্ননংশঃ) সাংসারিক-ভোগের স্বপ্ন বিনষ্ট করে দেবে, তখন তুমি (পথা) এই যোগমার্গ দ্বারা, (পুনঃ) বার-বার (অস্তম্) মুখ্য ঘর যা আমি, (এষি) প্রাপ্ত করবে। (বিশ্বস্মাৎ ইন্দ্র উত্তরঃ) দেখো পরমেশ্বরই সর্বোৎকৃষ্ট। [সুবিতা=সু+ইত=সু+আগত=স্বাগত।]

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