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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 126 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 126/ मन्त्र 23
    ऋषिः - वृषाकपिरिन्द्राणी च देवता - इन्द्रः छन्दः - पङ्क्तिः सूक्तम् - सूक्त-१२६
    51

    पर्शु॑र्ह॒ नाम॑ मान॒वी सा॒कं स॑सूव विंश॒तिम्। भ॒द्रं भ॑ल॒ त्यस्या॑ अभू॒द्यस्या॑ उ॒दर॒माम॑य॒द्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पशु॑: । ह॒ । नाम॑ । मा॒न॒वी । सा॒कम् । स॒सू॒व॒ । विं॒श॒तिम् ॥ भ॒द्रम् । भ॒ल॒ । त्यस्यै॑ । अ॒भू॒त् । यस्या॑: । उ॒दर॑म् । आम॑यत् । विश्व॑स्मात् । इन्द्र॑: । उत्ऽत॑र ॥१२६.२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पर्शुर्ह नाम मानवी साकं ससूव विंशतिम्। भद्रं भल त्यस्या अभूद्यस्या उदरमामयद्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पशु: । ह । नाम । मानवी । साकम् । ससूव । विंशतिम् ॥ भद्रम् । भल । त्यस्यै । अभूत् । यस्या: । उदरम् । आमयत् । विश्वस्मात् । इन्द्र: । उत्ऽतर ॥१२६.२३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 126; मन्त्र » 23
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गृहस्थ के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (पर्शुः) शत्रुओं का नाश करनेवाली (मानवी) मनुष्य की विभूति ने (ह) निश्चय करके (नाम) प्रसिद्ध (विशतिम्) बीस [पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मन्द्रियों और इनके दस विषयों] को (साकम्) एक साथ (ससूव) उत्पन्न किया है। (भल) हे विचारवान् ! [आत्मा] (त्यस्यै) उस [माता] के लिये (भद्रम्) कल्याण (अभूत्) हुआ है, (यस्याः) जिस [माता] के (उदरम्) पेट को (आमयत्) उस [गर्भ] ने पीड़ा दी थी, (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला मनुष्य] (विश्वस्मात्) सब [प्राणी मात्र] से (उत्तरः) उत्तम है ॥२३॥

    भावार्थ

    दस इन्द्रियाँ और उनके दस विषय, मनुष्य की उत्तम विभूति अर्थात् शक्ति से उत्तम होते हैं, इस लिये मनुष्य तपश्चरण से उत्तम विद्या प्राप्त करके सुख पावें, जैसे माता गर्भ का कष्ट सहकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करके सुख पाती है ॥२३॥

    टिप्पणी

    २३−(पर्शुः) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ० १।३३। पर+शॄ हिंसायाम्-कु डित्, पृषोदरादित्वादकारलोपः। पराणां शत्रूणां नाशयित्री (ह) अवधारणे (नाम) प्रसिद्धौ (मानवी) अ० ३।२४।३। मनु-अण्, ङीष्। मनोर्मनुष्यस्येयं विभूतिः (साकम्) सह (ससूव) ससूवेति निगमे। पा० ७।४।७४। इति सूतेर्लिटि रूपम्। सुषुवे। जनयामास (विंशतिम्) दशेन्द्रियाणि दश तेषां विषयान् च (भद्रम्) कल्याणम् (भल) भल वधे दाने निरूपणे च-अच्। हे निरूपकात्मन् (त्यस्यै) तस्यै। जनन्यै (अभूत्) (यस्याः) जनन्याः (उदरम्) गर्भाशयम् (आमयत्) अम पीडने। पीडितवान् स गर्भः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    मानवी की महिमा

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के अनुसार हमें "उद' बनना है। यह तभी हो सकता है जब हमारी बुद्धि स्थिर हो। यह बुद्धि मानो मनु की सन्तान है, इसीलिए इसे 'मानवी' कहा गया है। यही मानव की पत्नी है-उसकी शक्ति है। यही उसका कल्याण करती है। यह (ह) = निश्चय से (पर्शुः नाम) = 'पशु' इस नामवाली है। यह वासना-वृक्षों के लिए सचमुच कुल्हाड़े के समान है। २. यह बुद्धि मनुष्य की वासनाओं को छिन्न-भिन्न करके सभी इन्द्रियों व सभी प्राणों को ठीक रखती है। दसों इन्द्रियों व दसों प्राणों को विकसित करने के कारण यह बुद्धि इन बीस सन्तानोंवाली कहलाती है। (साकम्) = साथ-साथ (विंशतिम्) = इस बीस को यह (ससूव) = उत्पन्न करती है। ३.हे (भल) = सर्वद्रष्टा प्रभो! (त्यस्याः) = उस बुद्धि का (भद्रम् अभूत) = भला हो, (यस्याः) = जिसका हमारी दुर्गति को देखकर (उदरम् आमयत्) = पेट पीड़ावाला हुआ, अर्थात् जिसको हमारी दुर्गति अखरी। हमारी दुर्गति को दूर करने के लिए ही इसने वासनाओं का विनाश किया और हमें अनुभव कराया कि (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (विश्वस्मात् उत्तर:) = सर्वोत्कृष्ट हैं।

    भावार्थ

    अन्तत: बुद्धि ही हमारा कल्याण करती है-यही मानवी है। वासना-वृक्षों के लिए पशु बनकर यह हमारी इन्द्रियों व प्राणशक्तियों को उत्कृष्ट बनाती है। इस बुद्धि को विकसित करनेवाला व्यक्ति सब बुराइयों को [कु] सन्तप्त व विनष्ट [ताप] करनेवाला बनता है। सो यह 'कुन्ताप' कहलाता है। अगले दस सूक्त इसी ऋषि के हैं, अत: ये 'कुन्ताप-सूक्त' कहलाते हैं।

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    भाषार्थ

    (पर्शुः) हड्डियों-पसिलियोंवाली (मानवी) मानुषी-मातृदेह, (साकम्) एक साथ, (विंशतिम्) शारीरिक २० घटकों को (ससूव) जन्म देती है। (भल) हे विचारशील! कह कि (त्यस्याः) उस माता का (भद्रम्) कल्याण (अभूत्) हो, (यस्याः) जिसका कि (उदरम्) पेट (आमयत्) गर्भकाल में तथा जन्म देने में, पीड़ित तथा रुग्ण हुआ था, और कहो कि (विश्वस्मात् इन्द्र उत्तरः) परमेश्वर सर्वोत्कृष्ट है।

    टिप्पणी

    [विंशतिम्—शरीर के घटक २० अवयव हैं—५ ज्ञानेन्द्रिया, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ तन्मात्राएँ, ५ भूत। ये २० घटक-अवयव हैं शरीर के। मातृ-देह, अन्तःकरण-चतुष्टय अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को जन्म नहीं देती। अन्तःकरण-चतुष्टय परमेश्वरीय देन है, जीवात्मा को मोक्ष तक पहुँचाने के लिए जीवात्मा के साथ अन्तःकरण-चतुष्टय का प्रवाह से अनादि सम्बन्ध है, और तब तक जीवात्मा के साथ जन्म-जन्मान्तरों में रहेगा, जब तक कि जीवात्मा मुक्ति नहीं पा लेता। इसके द्वारा वृषाकपि को यह उपदेश दिया है कि परमेश्वरीय-देन को तू परमेश्वरार्पित कर दे, तभी मरु-भूमिरूप (मन्त्र २०) तु, ब्रह्मानन्दरस से सींचा जाकर हरा-भरा हो सकेगा। दैहिक भोग और देह विनाशी हैं, इसलिए इनका भोग और अपचार तू उस अंश तक कर, जिस अंश तक कि ये जीवात्मा के मोक्षमार्ग में अग्रसर होने में सहायक हों। तथा साथ ही हे वृषाकपि! तू उस मातृशक्ति का सदा कल्याण चाहा कर जिसने दुःख-कष्ट सहकर तुझे शारीरिक-जन्म दिया है, ताकि तू कर्मों के फलों को भोगता हुआ मोक्ष पा सके। मन्त्र १ से २३ तक की प्रायः आध्यात्मिक व्याख्या यहाँ की गई है। आधिदैविक व्याख्या नहीं की गई। [भल=भल् to see, behold (आप्टे), यथा—निभालय=देख। तथा “भल्” परिभाषणे। पर्शुः=पर्शुका=The rib (आप्टे)। पर्शुका ह्रस्वार्थे कन्)।] सारांश सूक्त १२६ के २३ मन्त्रों में मुख्यरूप में इन्द्र, इन्द्राणी और वृषाकपि का वर्णन हुआ है। आध्यात्मिक दृष्टि में इन्द्र द्वारा परमेश्वर का, इन्द्राणी द्वारा ओ३म् के जप द्वारा साध्य जीवात्मा की आध्यात्मिक शक्ति का तथा परमेश्वरीय कृपा का, और वृषाकपि द्वारा जीवात्मा का वर्णन हुआ है। विषय के प्रासङ्गिक अवान्तर भेदों के कारण इन २३ मन्त्रों को ६ विभागों में विभक्त है— १—मन्त्र १-३ तक में वृषाकपि को “भक्तिरसवर्षी, पापशत्रुओं को कम्पा देनेवाला, तथा इन्द्रियों का स्वामी कहकर उसका वर्णन मोक्षाधिकारी रूप में हुआ है”। २—मन्त्र ४ और ५ में वृषकपि का विभिन्न अर्थ लिया गया है। वह है “वृषा” अर्थात् कामुकता के कारण वीर्य की वर्षा करनेवाला, “कपि” अर्थात् बन्दर के समान कामुक; तथा “श्वा” अर्थात् कुत्ते के समान लोभी और अपवित्र। इस दृष्टि से ऐसे वृषाकपि को मोक्ष का अनधिकारी कहा है। तथा एक सुन्दर स्त्री के रूप में आध्यात्मिक-इन्द्राणी का वर्णन हुआ है। ३—मन्त्र ६-१२ तक में इन्द्राणी के प्रसङ्गवश मानुषी स्त्री के सद्गुणों, कन्या का माता के प्रति व्यवहार, स्त्री-स्वभाव, तथा क्षत्राणी-पत्नी का वर्णन हुआ है। ४—मन्त्र १३-१५ में इन्द्राणी को—वृषाकपि अर्थात् भक्तिरसवर्षी तथा पाप-शत्रुओं को कम्पा देनेवाले उपासक की माता के रूप में; उत्तम-पुत्रवाली तथा उत्तम-पुत्रवधूवाली के रूप में आध्यात्मिक वर्णन करके, मन्त्र २४ वें में परमेश्वर के प्रति जीवात्मा के सर्वस्व समर्पण तथा परमेश्वरीय अन्तर्नाद का वर्णन हुआ है। ५—मन्त्र १६-१८ में इन्द्र पद द्वारा विद्युत् और वृषाकपि द्वारा सूर्य का आधिदैविक वर्णन हुआ है। ६—अन्त में १९-२३ मन्त्रों में उपसंहाररूप में, परमेश्वर और जीवात्मा के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन हुआ है। इस प्रकार १२६ वें सूक्त में आध्यात्मिक, आधिदैविक, तथा आधिभौतिक-तीनों अर्थ संभव हैं। ये तीनों अर्थ गौण-मुख्याभाव से प्रायः अन्य सूक्तों के भी लिए जा सकते हैं।]

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    विषय

    जीव, प्रकृति और परमेश्वर।

    भावार्थ

    (पर्शुः ह नाम) पर्शु नाम (मानवी) मननशील पुरुष की सहचारिणी बुद्धि या विचारशक्ति जिस प्रकार (साकम्) एक साथ ही (विंशतिम्) बीस को (ससूव) उत्पन्न करती है। १० इन्दियों के स्थूल साधन और १० भीतरी ग्राहक सूक्ष्म साधन इन सबको मनु मननशील आत्मा की विचारशक्ति ही उत्पन्न करती है। वही सर्वत्र स्पर्श करनेहारी व्यापक होने से ‘पशु’ कहाती है। (भल) हे जीव ! (त्यस्याः) उसका (भद्रं) कल्याण (अभूत्) होता है (यस्या उदरम्) जिसके पेट को (आमयत) जीव गर्भ-प्रसव से पीड़ित करता है। इसी प्रकार (मानवी) मननशील परमेश्वर की वह (पर्शुः ह नाम) सदा पार्श्ववर्त्तिनी, सहचारिणी स्त्री के समान व्यापक प्रकृति है जो (विंशतिम्) २० प्रकृति विकारों को एक ही साथ उत्पन्न करती है। (त्यस्याः) उससे भी (भदम्) सुखकारी जगत् (अभूत्) उत्पन्न होता है (यस्या) जिसके (उदरम्) उदर, गर्भाशय के समान भीतर में (आमयत्) व्याप्त होकर वह परमेश्वर स्वयं पीड़ित करता है उसमें विक्षोभ उत्पन्न करता है। (विश्वस्मात् इन्द्रः उत्तरः) वही परमेश्वर समस्त संसार से उत्कृष्ट है। ‘पर्शु मानवी’ को देखकर यवन या इस्लाम सम्प्रदाय ने कदाचित् आदम की पसली से हौवा बनाकर सृष्टि क्रम चलाने की कथा गढ़ी है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वृषाकपिरिन्द्र इन्द्राणी च ऋषयः। इन्द्रो देवता। पंक्तिः। त्रयोविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    The creative and catalytic power of omniscient Indra, universal mother, together creates twenty varying modes of matter, energy and thought for physical, biological and intelligent forms of existence. O noble soul, blessed be the mother who suffers the travail to bear the transmigrant soul on way to earthly pleasure and pain and then the bliss divine. Great is Indra, greater than all, supreme over all the world.

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    Translation

    O man, This matter known as Parshu which is producer of body makes twenty members of the body together. That mother who has not suffered from the pain of delivery of child, has prosperity and auspiciousness. The Almighty God is rarest of all and supreme over all.

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    Translation

    O man, This matter known as Parshu which is producer of body makes twenty members of the body together. That mother who has not suffered from the pain of delivery of child, has prosperity and auspiciousness. The Almighty God is rarest of all and supreme over all.

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    Translation

    (The above-mentioned leader is one), whose vanguard of twenty vehicles or aeroplanes or ships is fire-thrower and death-raining on the enemy; whose squadron of 20 airships or missiles, touching the heavens and getting the mastery thereof, raining death over the enemy thoroughly raises him to the ground.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २३−(पर्शुः) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ० १।३३। पर+शॄ हिंसायाम्-कु डित्, पृषोदरादित्वादकारलोपः। पराणां शत्रूणां नाशयित्री (ह) अवधारणे (नाम) प्रसिद्धौ (मानवी) अ० ३।२४।३। मनु-अण्, ङीष्। मनोर्मनुष्यस्येयं विभूतिः (साकम्) सह (ससूव) ससूवेति निगमे। पा० ७।४।७४। इति सूतेर्लिटि रूपम्। सुषुवे। जनयामास (विंशतिम्) दशेन्द्रियाणि दश तेषां विषयान् च (भद्रम्) कल्याणम् (भल) भल वधे दाने निरूपणे च-अच्। हे निरूपकात्मन् (त्यस्यै) तस्यै। जनन्यै (अभूत्) (यस्याः) जनन्याः (उदरम्) गर्भाशयम् (आमयत्) अम पीडने। पीडितवान् स गर्भः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    গৃহস্থকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (পর্শুঃ) শত্রুদের বিনাশকারী (মানবী) মনুষ্যের বিভূতি (হ) নিশ্চিতরূপে (নাম) প্রসিদ্ধ (বিশতিম্) বিশ [পাঁচ জ্ঞানেন্দ্রিয় এবং পাঁচ কর্মন্দ্রিয় এবং এদের দশটি বিষয়কে] (সাকম্) এক সাথে (সসূব) উৎপন্ন করেছে। (ভল) হে বিচারশীল! [আত্মা] (ত্যস্যৈ) সেই [মাতার] জন্য (ভদ্রম্) কল্যাণ (অভূৎ) হয়েছে, (যস্যাঃ) যে [মাতার] (উদরম্) পেটকে (আময়ৎ) সেই [গর্ভ] পীড়া দিয়েছিল, (ইন্দ্রঃ) ইন্দ্র [মহান ঐশ্বর্যবান মনুষ্য] (বিশ্বস্মাৎ) সব [প্রাণী মাত্র] থেকে (উত্তরঃ) উত্তম ॥২৩॥

    भावार्थ

    দশটি ইন্দ্রিয় এবং এর দশ বিষয়, মানুষের উত্তম বিভূতি অর্থাৎ শক্তির চেয়ে উত্তম হয়, এই জন্য মনুষ্য তপস্যা দ্বারা উত্তম বিদ্যা লাভ করে সুখ প্রাপ্ত হয়, যেমন মাতা গর্ভের কষ্ট সহ্য করে উত্তম সন্তান উৎপন্ন করে সুখ প্রাপ্ত হয়॥২৩॥

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    भाषार्थ

    (পর্শুঃ) অস্থি-পেশীবিশিষ্ট (মানবী) মানুষী-মাতৃদেহ, (সাকম্) এক সাথে, (বিংশতিম্) শারীরিক ২০ ঘটক (সসূব) জন্ম দেয়। (ভল) হে বিচারশীল! বলো (ত্যস্যাঃ) সেই মাতার (ভদ্রম্) কল্যাণ (অভূৎ) হোক, (যস্যাঃ) যার (উদরম্) পেট (আময়ৎ) গর্ভকালে তথা জন্ম দেওয়ার ক্ষেত্রে , পীড়িত তথা রুগ্ণ হয়েছিল, এবং বলো (বিশ্বস্মাৎ ইন্দ্র উত্তরঃ) পরমেশ্বর সর্বোৎকৃষ্ট।

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