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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 13
    ऋषिः - मातृनामा देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
    70

    य आ॒त्मान॑मतिमा॒त्रमंस॑ आ॒धाय॒ बिभ्र॑ति। स्त्री॒णां श्रो॑णिप्रतो॒दिन॒ इन्द्र॒ रक्षां॑सि नाशय ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । आ॒त्मान॑म् । अ॒ति॒ऽमा॒त्रम् । अंसे॑ । आ॒ऽधाय॑ । बिभ्र॑ति । स्त्री॒णाम् । श्रो॒णि॒ऽप्र॒तो॒दिन॑: । इन्द्र॑ । रक्षां॑सि । ना॒श॒य॒ ॥६.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य आत्मानमतिमात्रमंस आधाय बिभ्रति। स्त्रीणां श्रोणिप्रतोदिन इन्द्र रक्षांसि नाशय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । आत्मानम् । अतिऽमात्रम् । अंसे । आऽधाय । बिभ्रति । स्त्रीणाम् । श्रोणिऽप्रतोदिन: । इन्द्र । रक्षांसि । नाशय ॥६.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 6; मन्त्र » 13
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    हिन्दी (4)

    विषय

    गर्भ की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (ये) जो [कीड़े अपने] (आत्मानम्) आत्मा को (अंसे) पीड़ा देने में (अतिमात्रम्) अत्यन्त (आधाय) लगाकर (बिभ्रति) रखते हैं। और (स्त्रीणाम्) स्त्रियों के (श्रोणिप्रतोदिनः) कटिभाग में व्यथा करनेवाले हैं, (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष ! [उन] [रक्षांसि] राक्षसों को (नाशय) नष्ट कर दे ॥१३॥

    भावार्थ

    वैद्य लोग गर्भिणी स्त्रियों के दुःखदायी कीड़ों और रोगों को नाश करें ॥१३॥

    टिप्पणी

    १३−(ये) क्रिमयो रोगा वा (आत्मानम्) मनः (अतिमात्रम्) यथा तथा। अत्यर्थम् (अंसे) अमेः सन्। उ० ५।२१। अम पीडने-सन्। पीडने (आधाय) समन्ताद्धृत्वा (बिभ्रति) धरन्ति (स्त्रीणाम्) गर्भिणीनाम् (श्रोणिप्रतोदिनः) वहिश्रिश्रुयुद्रु०। उ० ४।५१। श्रु गतौ भ्वा०-नि+प्रतुद व्यथने णिनि। कटिभागपीडकान् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् वैद्य (रक्षांसि) तान् दुःखदायिनः (नाशय) घातय ॥

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    विषय

    स्त्रीणां श्रोणिप्रतोदिनः

    पदार्थ

    १. (ये) = जो कृमि (अतिमात्रम्) = बहुत ही अधिक (अंसे आधाय) = औरों को पीड़ा में स्थापित करके (आत्मानम् बिभ्रति) = अपने को धारण करते हैं, अर्थात् जिनका जीवन औरों की पीड़ा पर ही आश्रित है, उन (स्त्रीणां श्रोणिप्रतोदिन:) = स्त्रियों के कटिप्रदेश को पीड़ित करनेवाले रक्षांसि रोगकृमियों को, हे (इन्द्र) = राजन् ! नाशय नष्ट कर राजा स्वच्छता आदि की इसप्रकार व्यवस्था कराये कि रोगकृमि उत्पन्न ही न हों।

    भावार्थ

    औरों को पीड़ित करने पर ही जिनका जीवन निर्भर करता है, स्त्रियों के कटिप्रदेशों को अतिशयेन व्यथित करनेवाले उन रोगकृमियों के विनाश के लिए राजा की ओर से समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।

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    भाषार्थ

    (ये) जो (अतिमात्रम्) अतिपरिमाण वाले (आत्मानम्) स्वकीय अङ्ग को, (असे) निज कन्धे पर (आधाय) रख कर (बिभ्रति) निज भरण-पोषण करते हैं, तथा जो (स्त्रीणाम्) स्त्रियों के (श्रोणिप्रतोदिनः) कटि प्रदेश को व्यथित कर देते हैं, (इन्द्र) हे इन्द्र (रक्षांसि) उन राक्षस स्वभाव वाले कीटों तथा कीटाणुओं का तू (नाशय) नाश कर।

    टिप्पणी

    [मन्त्र के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध के प्रतिपाद्य विषय पृथक्-पृथक् हैं। पूर्वार्ध में अतिमात्रम् का अर्थ है "अतिस्थूलम्" (सायण)। अतिस्थूल कीट तो सम्भव है परन्तु कीटाणु नहीं। यह कीट "अल्गण्डु" प्रतीत होता है, अथर्व० (२।३१।२, ३)। "अलगण्डु" में "अल्" का अर्थ है "भूषण" और "गण्डु१" का अर्थ है "फफोला"। इस कीट की पीठ पर एक सफेद फफोल।१ अर्थात् फूली हुई एक ग्रन्थि होती है जो कि कीट के स्कन्धप्रदेश तक फैली होती है, "अंस" तक फैली होती है। यह कीट देखने में अति घृणित होता है। सम्भवतः इसलिये इस के हनन का कथन मन्त्र में हुआ है। यह को कभी-कभी घरों में, शौचालयों में दष्टिगोचर हो जाता है। मन्त्र के उत्तरार्ध रोगकीटाणुओं का वर्णन है, जो कि स्त्रियों के कटिप्रदेश को व्यथित कर देते हैं “तोदिनः" तुद व्यथने (तुदादिः)। “श्रोणि " पद "स्त्रीयोनि" वाचक प्रतीत होता है, जिसे कि कटिप्रदेश द्वारा सूचित किया है। इन्द्र का अर्थ सूर्य नहीं। इन्द्र है सम्राट्, यथा “इन्द्रश्च सम्राट्" (यजु० ८।३७)। साम्राज्य में सम्राट् का कर्तव्य है कि वह प्रजा के रोग निवारण तथा स्वास्थ्य का प्रबन्ध करे, तथा दुष्टाचारियों का नियन्त्रण करे, यथा (मन्त्र १४-१७)]। [१. यह फफोला ही इस का भूषण है, शिरोभूषण है। गण्ड= Bubble, swelling, pimple (आप्टे)।]

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    विषय

    कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।

    भावार्थ

    (ये) जो (अतिमात्रम् आत्मानम्) अपने भारी रूप को (अंसे) अपने कन्धे पर (आधाय बिभ्रति) रक्खे हुए हैं अर्थात् बड़े भयंकर डील डौल वाले और बनावटी मुँह बनाकर अपने कन्धे पर पहने रहते हैं ऐसे छद्मवेशी लोग रात को (स्त्रीणां) स्त्रियों के संग (श्रोणि-प्रतो दिनः) दुर्व्यवहार करने वाले हैं, हे (इन्द्र) राजन् ! (रक्षांसि) उन राक्षसों, कूट रूपधारी लोगों का (नाशय) विनाश कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Foetus Protection

    Meaning

    Those which, excessive in body even for themselves, holding that excess, abide and rise to the loins and waist part of women’s body, these attackers of the womb and foetus of women, O eminent physician, Indra, destroy.

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    Translation

    Who bear an excessively large head over their shoulders, and who cause severe pain in women’s loins, - those germs O resplendent Lord, may you destroy.

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    Translation

    O Indra ! (physician) destroy those disease-germs which bear heavy head on their shoulders, i.e., which are terrible in their stature; and which pierce the loins of woman.

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    Translation

    All those who on their shoulders bear a head of monstrous magnitude, who pierce the women’s loins with pain, those demons, O king, drive away!

    Footnote

    All those: Persons who are hypocrites, try to pass as rich, intellectual persons. Pierce the women’s loins: Misbehave towards women.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(ये) क्रिमयो रोगा वा (आत्मानम्) मनः (अतिमात्रम्) यथा तथा। अत्यर्थम् (अंसे) अमेः सन्। उ० ५।२१। अम पीडने-सन्। पीडने (आधाय) समन्ताद्धृत्वा (बिभ्रति) धरन्ति (स्त्रीणाम्) गर्भिणीनाम् (श्रोणिप्रतोदिनः) वहिश्रिश्रुयुद्रु०। उ० ४।५१। श्रु गतौ भ्वा०-नि+प्रतुद व्यथने णिनि। कटिभागपीडकान् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् वैद्य (रक्षांसि) तान् दुःखदायिनः (नाशय) घातय ॥

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