अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 3
ऋषिः - मातृनामा
देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
98
मा सं वृ॑तो॒ मोप॑ सृप ऊ॒रू माव॑ सृपोऽन्त॒रा। कृ॒णोम्य॑स्यै भेष॒जं ब॒जं दु॑र्णाम॒चात॑नम् ॥
स्वर सहित पद पाठमा । सम् । वृ॒त॒: । मा । उप॑ । सृ॒प॒: । ऊ॒रू इति॑ । मा । अव॑ । सृ॒प॒: । अ॒न्त॒रा । कृ॒णोमि॑ । अ॒स्यै॒ । भे॒ष॒जम् । ब॒जम् । दु॒र्ना॒म॒ऽचात॑नम् ॥६.३॥
स्वर रहित मन्त्र
मा सं वृतो मोप सृप ऊरू माव सृपोऽन्तरा। कृणोम्यस्यै भेषजं बजं दुर्णामचातनम् ॥
स्वर रहित पद पाठमा । सम् । वृत: । मा । उप । सृप: । ऊरू इति । मा । अव । सृप: । अन्तरा । कृणोमि । अस्यै । भेषजम् । बजम् । दुर्नामऽचातनम् ॥६.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
[हे रोग !] (मा सम् वृतः) तू मत घूमता रह, (मा उप सृपः) मत रींगता आ, (ऊरू अन्तरा) दोनों जाँघों के बीच (मा अव सृपः) मत सरकता जा। (अस्यै) इस [स्त्री] के लिये (दुर्णामचातनम्) दुर्नामनाशक [दुष्ट नाम रोग मिटानेवाले] (बजम्) बलवान् (भेषजम्) औषध को (कृणोमि) बनाता हूँ ॥३॥
भावार्थ
वैद्य गर्भिणी स्त्री के लिये उत्तम ओषधि बनावे, जिससे उसको कोई कठिन रोग न होवे ॥३॥
टिप्पणी
३−(मा सम् वृतः) द्युद्भ्यो लुङि। पा० १।३।९१। इति वृतु वर्तने परस्मैपदम्, द्युतादित्वाद् अङ्। संवर्तनं मा कुरु (मोप सृपः) उपसर्पणं मा कार्षीः (ऊरू अन्तरा) अन्तरान्तरेण युक्ते। पा० २।३।४। इति द्वितीया। जानूपरिभागयोर्मध्ये (माव सृपः) अवाक् सर्पणं मा कुरु (कृणोमि) करोमि (अस्यै) गर्भिण्यै (भेषजम्) औषधम् (बजम्) वज गतौ-अच्, वस्य बः। बलकरम् (दुर्णामचातनम्) चातयतिर्नाशने-निरु० ६।३०। अतिकठिनरोगस्य विनाशकम् ॥
विषय
दामचातन 'बज'
पदार्थ
१. दुर्नामाख्यरोगाभिमानिन्! तू इस युवति के (ऊरू अन्तरा) = ऊरूओं के मध्य में (मा संवृतः) = संवृति संकोच मत कर तथा (मा उपसृपः) = उपसर्पण-अन्तःप्रवेश मत कर और ऊरूओं के बीच में (मा अवसृपः) = नीचे की ओर गति न कर। २. मैं (अस्यै) = इस युवती के लिए (दुर्णाम चातनम्) = दुर्नामाख्य दोष के विनाशक (बजम्) = श्वेत सर्षपरूप (भेषजम्) = औषध को (कृणोमि) = करता हूँ।
भावार्थ
श्वेत सर्षप का प्रयोग दुर्नामाख्य रोग का विनाशक है।
भाषार्थ
[हे दुर्नामारोग [मन्त्र १] या रोगकीटाणु !] (ऊरू अन्तरा) दो ऊरुओं के मध्य (मा संवृतः) संकोचन न कर, (मा उपसृपः) अर्थात् न [योनि] के समीप आस-पास सर्पण कर, (मा अव सृपः) न ऊरूओं से नीचे की ओर सर्पण कर। (अस्यै) इस स्त्री के लिये (दुर्णामचातनम्) दुर्नाम रोगनाशक (वजम् भेषजम्) वजनाम वाली औषध (कृणोमि) मैं करता हूं।
टिप्पणी
[स्त्री की योनि के समीप और टांगों में सर्पण करने वाले रोग तथा रोग कीटाणु की औषधि है वज। कौशिक सूत्र में बज को सर्षप अर्थात् "सरसों" कहा है]।
विषय
कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।
भावार्थ
हे दुर्नाम ! कुष्ठ रोगी पुरुष या कुष्ठ रोग ! (मा संवृतः) तू कभी वरण न किया जाय। और यदि भूल से किसी प्रकार कन्या के द्वारा वरण भी किया गया हो तो (ऊरू) कन्या के जंघा भागों के (मा उपसृप) समीप स्पर्श मत कर कर अर्थात् कन्या के साथ संग मत कर और (अन्तरा मा अव सूप) मकान के भीतर भी मत रह। (अस्यै) इस कन्या के लिये (दुर्नाम-चातनम्) दुष्ट नाम वाले दुष्ट रोग से पीड़ित पुरुष के दूर करने वाले (बजं) अभिगमनीय, सुन्दर पुरुष को ही (भेषजम्) उत्तम उपाय (कृणोमि) करता हूं। दुष्ट रोगी पुरुष न वरे जायँ और वे कन्याओं का संग न करें। कन्याएं ऐसे रोगियों के हाथ न जायें, इसका सब से उत्तम उपाय उनके समक्ष उत्तम, शालीन वरों को स्थापित करना है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥
इंग्लिश (4)
Subject
Foetus Protection
Meaning
The ailment must not persist, must not recur, must not affect the thighs and the groin. I prepare and administer a powerful remedy which would eliminate the painful trouble.
Translation
Do not approach, Do not creep up. Do not creep inside between the two things. I administer to her the medicine bajam (white mustard), that removes durnama (ill-named) germs.
Translation
Let not disease or affection caused by these germs approach this woman; let it not come near her, let it not enter between her things as I, the physician make the herb Baja, a medicine which is the destroyer of Dusnam, to guard this woman.
Translation
O leper, don’t try to be married, if married through mistake, cohabit not with this girl. Don’t live in her house. For this girl I select a beautiful husband as remedy for one suffering from leprosy.
Footnote
I' refers to mother or father.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(मा सम् वृतः) द्युद्भ्यो लुङि। पा० १।३।९१। इति वृतु वर्तने परस्मैपदम्, द्युतादित्वाद् अङ्। संवर्तनं मा कुरु (मोप सृपः) उपसर्पणं मा कार्षीः (ऊरू अन्तरा) अन्तरान्तरेण युक्ते। पा० २।३।४। इति द्वितीया। जानूपरिभागयोर्मध्ये (माव सृपः) अवाक् सर्पणं मा कुरु (कृणोमि) करोमि (अस्यै) गर्भिण्यै (भेषजम्) औषधम् (बजम्) वज गतौ-अच्, वस्य बः। बलकरम् (दुर्णामचातनम्) चातयतिर्नाशने-निरु० ६।३०। अतिकठिनरोगस्य विनाशकम् ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal