अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 21
ऋषिः - मातृनामा
देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
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पवीन॒सात्त॑ङ्ग॒ल्वा॒ च्छाय॑कादु॒त नग्न॑कात्। प्र॒जायै॒ पत्ये॑ त्वा पि॒ङ्गः परि॑ पातु किमी॒दिनः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठप॒वि॒ऽन॒सात् । त॒ङ्ग॒ल्वा᳡त् । छाय॑कात् । उ॒त । नग्न॑कात् । प्र॒ऽजायै॑ । पत्ये॑ । त्वा॒ । पि॒ङ्ग: । परि॑ । पा॒तु॒ । कि॒मी॒दिन॑: ॥६.२१॥
स्वर रहित मन्त्र
पवीनसात्तङ्गल्वा च्छायकादुत नग्नकात्। प्रजायै पत्ये त्वा पिङ्गः परि पातु किमीदिनः ॥
स्वर रहित पद पाठपविऽनसात् । तङ्गल्वात् । छायकात् । उत । नग्नकात् । प्रऽजायै । पत्ये । त्वा । पिङ्ग: । परि । पातु । किमीदिन: ॥६.२१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(पवीनसात्) वज्र समान टेढ़े से, (तङ्गल्वात्) गति रोकनेवाले से, (छायकात्) काटनेवाले से (उत) और (नग्नकात्) नंगे करनेवाले (किमीदिनः) लुतरे पुरुष से (प्रजायै) प्रजा लिये और (पत्ये) पति के लिये (त्वा) तुझको (पिङ्गः) पराक्रमी पुरुष (परि पातु) सब ओर से बचावे ॥२१॥
भावार्थ
प्रतापी राजा कुकर्मी दुष्टों से स्त्रियों की रक्षा करे ॥२१॥
टिप्पणी
२१−(पवीनसात्) पविर्वज्रनाम-निघ० २।२०। सांहितिको दीर्घः। णस कौटिल्ये-अच्। वज्रवत्कुटिलात् (तङ्गल्वात्) अन्येष्वपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। तगि गतौ-विच्। कॄगॄशॄभ्यो वः। उ० १।१५५। अल वारणे-व। गतिनिवारकात् (छायकात्) छो छेदने-ण्वुल्। छेदकात् (उत) अपि च (नग्नकात्) अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। नग्न+करोतेर्ड। नग्नकारकात् (प्रजायै) प्रजार्थम् (पत्ये) पतिरक्षार्थम् (त्वा) स्त्रियम् (पिङ्गः) म० ६। पराक्रमी पुरुषः (परि) सर्वतः (पातु) रक्षतु (किमीदिनः) अ० १।७।१। पिशुनात् ॥
विषय
प्रजायै पत्ये
पदार्थ
१. (पवीनसात्) = वतुल्य नासिकावाले (तङ्गल्वात्) = बड़े गालवाले, (छायकात्) = मुख से काटनेवाले [छो छेदने] (उत) = और (नग्नकात्) = नंगे-बालों से रहित, (किमीदिन:) = हर समय भूखे [किम् इदानीं अदानि] इस रोगकृमि से (त्वा) = तुझे (प्रजायै) = उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिए तथा (पत्ये) = पति की अनुकूलता के लिए (पिङ्ग:) = पिंग वर्णवाला सर्षप (परिपातु) = रक्षित करे।
भावार्थ
पिंग वर्णवाले सर्षप के प्रयोग से रोगकृमियों के संहार के द्वारा गर्भिणी इसप्रकार स्वस्थ हो कि सन्तान भी उत्तम हो और पति की अनुकूलता भी बनी रहे। अस्वस्थ पत्नी से पति की परेशानी बढ़ती है।
भाषार्थ
(पवीनसात्) वज्रधारी द्वारा विनाश से (तङ्गल्वात् सायकात्) तीव्रगति से छेदन करने वाले वाण से, (उत) तथा (नग्नकात्) भूखे-नङ्गे१ से, (किमीदिनः) पिशुन व्यक्ति से, [हे गर्भवती स्त्री!] (प्रजायै पत्ये) सन्तानलाभ के लिये तथा पति की प्रसन्नता के लिये (पिङ्गः) "पिङ्ग" पृरुष (त्वा परिपातु) तुझे सब प्रकार से सुरक्षित करे। तङ्गल्वात्= तगि गत्यर्थः (भ्वादिः) + लूञ् छेदने।
टिप्पणी
[यथासम्भव मन्त्रपदों के यौगिकार्थ के द्वारा कुछ बुद्धिगम्य अर्थ किया है। सूक्त में सर्षप द्वारा शारीरिक रोगों का भी उपचार विहित है, और "पिङ्ग" पद द्वारा नागरिकों की सुरक्षा का भी वर्णन सूक्त में यत्र तत्र मिलता है। "राज द्वारा नियुक्त सुरक्षावर्ग है, यह नागरिक पुलिस [स्पशाः] सदृश है। "पिङ्ग" शब्द "पिजि" धातु द्वारा निष्पन्न है जिस का अर्थ "बलादान" भी है (चुरादिः)। अतः "पिङ्गः" का अभिप्राय है "बली"। नागरिक रक्षकों को बलवान होना ही चाहिये। ये शारीरिक शक्ति तथा शस्त्रास्त्रशक्ति द्वारा बलवान होने ही चाहिये। इस दृष्टि से मन्त्र (१८) में "पिङ्ग" को "उग्रधन्वा" अर्थात् उग्र धनुष वाला कहा है। "किमीदिने" का अर्थ निरुक्त में "पिशुनाय" किया है। पिशुन मनुष्य होते हैं रोगकीटाणु नहीं। इस से भी यह प्रतीत होता है कि मन्त्र (२१) में प्रजादुःखदायक "मनुष्यों" का ही वर्णन है जिन से गर्भिणी की रक्षा करनी है (निरुक्त ६/३/१२; पद ४४)। पवीनसात्= पवीनशात्। शकार को सकार "वर्ण विकार" द्वारा इसे "वर्णव्यापत्ति"२ भी कहते हैं। पविः वज्रनाम (निघं० २।२०) + नस= नश (णश, दिवादिः)]। [१. भूखे नंगों द्वारा धनप्राप्ति के लिये, आक्रमण की सम्भावना रहती है। अतः नग्नकात् का वर्णन हुआ है।]
विषय
कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।
भावार्थ
हे स्त्री ! (पवीनसात्) पूति गन्ध से युक्त, सड़ी नाक वाले, (तङ्गल्वात्) फूली गालों वाले, (छायकात्) मुँह से काटने वाले और (नग्नकात्) नंगे, निर्लज्ज इन (किमीदिनः) सब पदार्थों को तुच्छ देखने वाले, मूर्ख, असभ्य गुण्डों से (पिङ्गः) बलवान् पुरुष (प्रजायै) तेरी प्रजा और (पत्यै) तेरे पति के सुख के लिये (त्वा परि पातु) तेरी रक्षा करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥
इंग्लिश (4)
Subject
Foetus Protection
Meaning
Expectant mother, let Pinga, the powerful, protect you and the foetus from penetrative attacks of fast moving germs, nightmares, thoughts of wantonness and stingy meanness for the sake of the husband and the progeny.
Translation
From the rim-nosed, full-cheeked, the shady, and the naked devourer germ, may the pinga (yellow mustard) protect you well for the sake of your offsprings and your husband.
Translation
O woman ! let the Pinga plant guard you for the sake of your husband and children from the trouble-some disease- creating germs including Pavinasa (which has instrument-like strong nose), Tangalva (the germ which creates trouble in walking), Chhavaka (the germ which pierces violently) and Nagnaka (the germ whose instruments are always nacked).
Translation
O woman, for thy children and husband, may the king shield thee well, from foul-nosed, swollen cheeked, ugly, naked, stupid uncivilized vagabonds!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२१−(पवीनसात्) पविर्वज्रनाम-निघ० २।२०। सांहितिको दीर्घः। णस कौटिल्ये-अच्। वज्रवत्कुटिलात् (तङ्गल्वात्) अन्येष्वपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। तगि गतौ-विच्। कॄगॄशॄभ्यो वः। उ० १।१५५। अल वारणे-व। गतिनिवारकात् (छायकात्) छो छेदने-ण्वुल्। छेदकात् (उत) अपि च (नग्नकात्) अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। नग्न+करोतेर्ड। नग्नकारकात् (प्रजायै) प्रजार्थम् (पत्ये) पतिरक्षार्थम् (त्वा) स्त्रियम् (पिङ्गः) म० ६। पराक्रमी पुरुषः (परि) सर्वतः (पातु) रक्षतु (किमीदिनः) अ० १।७।१। पिशुनात् ॥
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