अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 14
ऋषिः - मातृनामा
देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः
छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः
सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
62
ये पूर्वे॑ व॒ध्वो॒ यन्ति॒ हस्ते॒ शृङ्गा॑णि॒ बिभ्र॑तः। आ॑पाके॒स्थाः प्र॑हा॒सिन॑ स्त॒म्बे ये कु॒र्वते॒ ज्योति॒स्तानि॒तो ना॑शयामसि ॥
स्वर सहित पद पाठये । पूर्वे॑ । व॒ध्व᳡: । यन्ति॑ । हस्ते॑ । शृङ्गा॑णि । बिभ्र॑त: । आ॒पा॒के॒ऽस्था: । प्र॒ऽहा॒सिन॑: । स्त॒म्बे । ये । कु॒र्वते॑ । ज्योति॑: । तान् । इ॒त: । ना॒श॒या॒म॒सि॒ ॥६.१४॥
स्वर रहित मन्त्र
ये पूर्वे वध्वो यन्ति हस्ते शृङ्गाणि बिभ्रतः। आपाकेस्थाः प्रहासिन स्तम्बे ये कुर्वते ज्योतिस्तानितो नाशयामसि ॥
स्वर रहित पद पाठये । पूर्वे । वध्व: । यन्ति । हस्ते । शृङ्गाणि । बिभ्रत: । आपाकेऽस्था: । प्रऽहासिन: । स्तम्बे । ये । कुर्वते । ज्योति: । तान् । इत: । नाशयामसि ॥६.१४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जो [कीड़े] (हस्ते) हाथ में (शृङ्गाणि) हिंसाकर्मों को (बिभ्रतः) धारण करते हुए (वध्वः) वधू के (पूर्वे) सन्मुख (यन्ति) चलते हैं। (ये) जो [कीड़े] (आपाकेष्ठाः) पाकशाला वा कुम्हार के आवाँ में बैठनेवाले, (प्रहासिनः) ठट्टा मारते हुए [जैसे] (स्तम्बे) बैठने के स्थान में (ज्योतिः) ज्वाला [जलन, चमक वा पीड़ा] (कुर्वते) करते हैं, (तान्) उन [कीड़ों] को (इतः) यहाँ से (नाशयामसि) हम नष्ट करते हैं ॥१४॥
भावार्थ
घरों, पाकशालाओं और आवाँओं में कूड़ा-कर्कट एकत्र हो कर उष्णता के कारण रोगजनक कीड़े उत्पन्न होते हैं, मनुष्य ऐसे स्थानों को शुद्ध रक्खें ॥१४॥
टिप्पणी
१४−(ये) क्रमयः (पूर्वे) अग्रे (वध्वः) आडभावः। वध्वाः। स्त्रियाः (यन्ति) गच्छन्ति (हस्ते) करे (शृङ्गाणि) शृणातेर्ह्रस्वश्च। उ० १।१२६। श्रॄ हिंसायाम्-गन् नुट् च। हिंसाकर्माणि (बिभ्रतः) धारयन्तः (आपाकेष्ठाः) पाकशालायां कुम्भकारस्य मृत्पात्रपाकस्थाने वा स्थिताः (प्रहासिनः) अट्टहासं कुर्वन्त इव (स्तम्बे) अ० ८।६।५। स्थितिस्थाने (ये) (कुर्वते) उत्पादयन्ति (ज्योतिः) अ० १।९।१। ज्वालाम्। ज्वलनम्। पीडनम् (तान्) क्रमीन् (इतः) अस्मात् स्थानात् (नाशयामसि) ॥
विषय
आपाकेस्थाः प्रहासिनः
पदार्थ
१. (ये) = जो कृमि हस्ते (शृङ्गाणि विभ्रत:) = हाथ में हिंसा-साधन धारण करते हुए (वध्वः पूर्वे यन्ति) = वधुओं के आगे जाते हैं, (आपाकेस्था:) = जो पाकशालाओं में स्थिर होते हैं, (प्रहासिन:) = जो अपने दंश से हँसाते-से हैं, (ये) = जो कृमि (स्तम्बे) = तृणादि के गुच्छों में (ज्योतिः कुर्वते) = प्रकाश करते हैं, अर्थात् झाड़ियों में चमकते हैं (तान्) = उन सबको (इत:) = यहाँ से (नाशयामसि) = विनष्ट करते हैं।
भावार्थ
जिन कृमियों के हाथ में सींग-सा दंश है, जो पाकगृह में रहते हैं, जो चमकते हैं और स्त्रियों के पास जाकर रोग उत्पन्न करते हैं, उन रोगकृमियों को यहाँ से विनष्ट कर दो।
भाषार्थ
(ये) जो [आततायी] (हस्ते) हाथों में (शृङ्गाणि) जलती-मशालों को (बिभ्रतः) धारण करते हुए [वधू के मार्ग पर] (वध्वः पूर्व) वधू से पहले (यन्ति) पहुंच जाते हैं, तथा (प्रहासिनः) उपहास अर्थात् वधू पर ठठ्ठा मखौल करते हुए (अपाकेष्ठाः) पाकशाला में आ खड़े होते हैं, और (ये) जो (स्तम्बे) झाड़ियों में (ज्योतिः कुर्वते) आग लगादेते हैं (तान्) उन्हें (इतः) इस पृथिवी से (नाशयामसि) हम नष्ट कर देते हैं।
टिप्पणी
[शृङ्गाणि ज्वलतो नाम (निघं० १।१७)। वधू के विवाह में माता-पिता आदि वधू को स्त्रीधन देते हैं, तथा नाना आभूषण और वस्त्र प्रदान करते हैं। वधू, पितृगृह से जब पतिगृह जाने वाली होती है तो लुटेरे-आततायी वधू के मार्ग पर पहले पहुंच कर, मशालों द्वारा मार्गस्थ झाड़ियों में आग लगा कर वधू का मार्ग रोक कर स्त्रीधन को लूट लेते हैं, और वधूगृह की पाकशाला में घुस कर पाकशाला में पहुंची वधू का उपहास कर, और उपहास द्वारा उसे प्रकुपित कर पहिने आभूषणों को लूटने का यत्न करते हैं, ऐसों के नाश करने का विधान मन्त्र में हुआ है। मनु ने भो कहा है कि "आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्" अर्थात् आततायी को आते देख कर सोच-विचार के बिना ही उस का हनन कर दे। आततायियों में मनु ने "अग्निदः गरदः" का भी परिगणन किया है। मन्त्र में "अग्निदः" का वर्णन "हस्ते शृङ्गाणि बिभ्रतः” द्वारा हुआ है। ऐसे “सामाजिक-मानुष कीटों" के हनन की विधि मन्त्र में कही है]।
विषय
कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।
भावार्थ
(ये) जो दुष्ट, गुण्डे लोग (वध्वः पूर्वे) स्त्री के आगे, स्त्रियों के सामने (हस्ते) हाथ में (शृङ्गाणि) सींगों को या अपने गुह्याङ्गों वा शस्त्रों कों (बिभ्रतः) लिये हुए (यन्ति) आजायें ऐसे बेशर्म नीच गुण्डों को, और जो (आपाकेष्ठाः*) अकेले, टूटे, फूटे, रद्दी भयंकर स्थानों में (प्रहासिनः) अट्टहास करें, और (ये) जो ग्राम के लोगों को त्रास देने के लिए (स्तम्बे) झुण्ड में (ज्योतिः) प्रकाश या आग के शोले (कुर्वते) किया करें, (तान्) उनको (इतः) यहां से (नाशयामसि) मार भगावें।
टिप्पणी
‘पाक’ इति प्रशस्यनाम ततो विपरीतं ‘अपाकम्’ तदेव ‘आपाकम्’ तत्र तिष्ठन्ति निबसन्ति इति आपाकेष्ठाः, जीर्णभग्नचिरत्यक्तगृहकूपादिषु कृतावस्थानाः। सा०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥
इंग्लिश (4)
Subject
Foetus Protection
Meaning
Those which, of many colours, abide in the kitchen and in clumps of grass or flowers and produce flashes of light, and bearing their sting in front reach and vex married women, we destroy and eliminate from here.
Translation
Who go to a bride first carrying (drinking) horns (srngani) in their hands, visiting taverns and laughingly loudly, who flash lights in the bushes, - all of them we cause to disappear from here.
Translation
We destroy from here those germs which having horn-like needle-pipe on their hands torture newly married woman, which live in mess and laugh, which send forth light in the bushes.
Translation
Those, who-bearing arms in their hands approach the ladies, or standing in lonely, dreary, dilapidated places cut jokes with them, those who in bushes flash forth light to frighten people, all these we banish hence away.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१४−(ये) क्रमयः (पूर्वे) अग्रे (वध्वः) आडभावः। वध्वाः। स्त्रियाः (यन्ति) गच्छन्ति (हस्ते) करे (शृङ्गाणि) शृणातेर्ह्रस्वश्च। उ० १।१२६। श्रॄ हिंसायाम्-गन् नुट् च। हिंसाकर्माणि (बिभ्रतः) धारयन्तः (आपाकेष्ठाः) पाकशालायां कुम्भकारस्य मृत्पात्रपाकस्थाने वा स्थिताः (प्रहासिनः) अट्टहासं कुर्वन्त इव (स्तम्बे) अ० ८।६।५। स्थितिस्थाने (ये) (कुर्वते) उत्पादयन्ति (ज्योतिः) अ० १।९।१। ज्वालाम्। ज्वलनम्। पीडनम् (तान्) क्रमीन् (इतः) अस्मात् स्थानात् (नाशयामसि) ॥
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