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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 26
    ऋषिः - मातृनामा देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
    65

    अ॑प्र॒जास्त्वं॒ मार्त॑वत्स॒माद्रोद॑म॒घमा॑व॒यम्। वृ॒क्षादि॑व॒ स्रजं॑ कृ॒त्वाप्रि॑ये॒ प्रति॑ मुञ्च॒ तत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒प्र॒जा:ऽत्वम् । मार्त॑ऽवत्सम् । आत् । रोद॑म् । अ॒घम् । आ॒ऽव॒यम् । वृ॒क्षात्ऽइ॑व । स्रज॑म् । कृ॒त्वा । अप्रि॑ये । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ । तत् ॥६.२६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अप्रजास्त्वं मार्तवत्समाद्रोदमघमावयम्। वृक्षादिव स्रजं कृत्वाप्रिये प्रति मुञ्च तत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अप्रजा:ऽत्वम् । मार्तऽवत्सम् । आत् । रोदम् । अघम् । आऽवयम् । वृक्षात्ऽइव । स्रजम् । कृत्वा । अप्रिये । प्रति । मुञ्च । तत् ॥६.२६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 6; मन्त्र » 26
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गर्भ की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (अप्रजास्त्वम्) बिना सन्तान होना, (मार्तवत्सम्) बच्चों का मर जाना (आत्) और (रोदम्) रोदन करना (अघम्) पाप और (आवयम्) सब ओर से दुःख के योग को। (तत्) उसे (अप्रिये) अप्रिय पर (प्रति मुञ्च) छोड़ दे (इव) जैसे (वृक्षात्) वृक्ष से (स्रजम्) फूलों की माला को (कृत्वा) बनाकर [छोड़ते हैं] ॥२६॥

    भावार्थ

    मनुष्य प्रयत्न करें कि उनके सन्तान उत्पन्न होकर क्लेशों से बचकर दीर्घ आयु प्राप्त करें ॥२६॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥

    टिप्पणी

    २६−(अप्रजास्त्वम्) नित्यमसिच् प्रजामेधयोः। पा० ५।४।१२२। अप्रजा-असिच्, भावे त्व, छान्दसो दीर्घः। अप्रजस्त्वम्। सन्तानराहित्यम् (मार्तवत्सम्) भावे अण्। मृतबालत्वम् (आत्) अपि च (रोदम्) रुदिर् अश्रुविमोचने-घञ्। रोदनम् (अघम्) पापम् (आवयम्) आ+व+यम्। वा गतिगन्धनयोः-ड, युजिर् योगे-ड। आ समन्ताद् वस्य गन्धनस्य हिंसनस्य यं योगम् (वृक्षात्) द्रुमात् (इव) यथा (स्रजम्) अ० १।१४।१। पुष्पमालाम् (कृत्वा) निर्माय (अप्रिये) द्वेष्ये (प्रति मुञ्च) प्रत्यक्षं मोचय (तत्) पूर्वोक्तं कर्म ॥

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    विषय

    विचित्र माला

    पदार्थ

    १. (अप्रजास्त्वम्) = सन्तान का न होना, (मार्तवत्सम्) = मृत सन्तान का होना (आत्) = और (रोदम्) = उत्पद्यमान दु:ख के कारण सर्वदा हृदय में रोते रहना, (अघम्) = पाप (आवयम्) = गर्भ का न ठहरना [non-conception]-ये जितनी भी बाते हैं, (तत्) = उन सबको, उसी प्रकार माला-सी बनाकर (अप्रिये प्रतिमुञ्च) = समाज के साथ अप्रीतिवाले किसी पुरुष में डाल, (इव) = जैसेकि (वृक्षात्) = वृक्ष से फूलों को लेकर (स्त्रजं कृत्वा) = माला-सी बनाकर किसी प्रिय मित्र को पहना देते हैं|

    भावार्थ

    उचित औषध-विनियोग से स्त्री के 'अप्रजासत्व, मार्तवत्स, रोद, अघ, आवय' आदि दोषों को दूर किया जाए।

    गृहस्थ को इन सब कष्टों से बचने के लिए स्थिरवृत्तिवाला बनना आवश्यक है। यही 'अथर्वा' है। रोगों के दूरीकरण के लिए उपादेय ओषधियों का ज्ञान प्राप्त करता हुआ यह 'अथर्वा'

    अगले सूक्त का ऋषि है तो 'ओषधयः' देवता हैं।

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    भाषार्थ

    (अप्रजास्त्वम्) प्रजा का न होना, (मार्तवत्सम्) मृतपुत्र का पैदा होना, (आत्) तदनन्तर (रोदम्) रोना, (अघम्) पाप [जिस कारण अप्रजासत्व आदि पैदा होते हैं] उनका (आ वयम्) सदा बुनते रहना, [जैसे कि पट को बुना जाता है], इन सब अप्रजास्त्व आदि को, (वृक्षात्) वृक्ष [के पुष्पों से] (स्रजं कृत्वा इव) रचो मालारूप१ कर के, (तत्) उसे (अप्रिये) अप्रियपक्ष में (प्रतिमुञ्च) डाल। आवयम्= असकृद् वयनम् (सायण)

    टिप्पणी

    [गृहस्थ जीवन में अप्रजासत्व, मार्तवत्स, तथा इन के कारण रोदन तथा इन की सत्ता का कारण पाप और इस पाप-पट का आवयन अर्थात् बुनते रहना, मानो यह मालारूप है। इन सब को परस्पर सम्बन्धी जानकर सब का उच्छेद साथ-साथ करना चाहिये, एक-एक का पृथक्-पृथक् काल में नहीं। राष्ट्रोन्नति के लिये इन सब का उच्छेद आवश्यक है। "अप्रजास्त्व" आदि की सत्ता में कारणीभूत पाप "द्विविध" है। (१) दुराचारियों के पापमय कर्म। (२) तथा गृहजीवन में अतिभोग और अमर्यादित भोग, पति और पत्नीकृत। यह भी पापमय है।] सूक्त ६ सम्बन्धी व्याख्या [ सूक्त ६ में वर्णित वज और पिङ्ग को सर्षप मान कर विशेष व्याख्या। सायणाचार्य ने श्वेत-और-पीत तथा श्वेत-और-गौर सर्षपों को वज-और-पिङ्ग कहा है। "वज" नामक सर्षप को "दुर्णामा" कीटों तथा कीटाणुओं का हननकारी कहा है, और पति-या-गौर सर्षप को "सुनामा" कहा है। दोनों प्रकार के सर्षपों का वर्णन आयुर्वेद के ग्रन्थों में मिलता है। दोनों प्रकार के सर्षप दो जाति के सरसों बीज हैं। यथा "सरसों के पौधे का बीज कुछ ललाई लिये हुए पीले रङ्ग के होते हैं। एक जाति के सरसों के बीज सफेद होते हैं। लाल और सफेद सरसों समान ही गुण वाली होती हैं। किन्तु तो भी सफेद सरसों, लाल की अपेक्षा उत्तम होती है। इन दोनों के गुणावगुण नाना वर्णित हुए हैं। परन्तु यहां वे ही लिखे जाते हैं जिन का सम्बन्ध सूक्त ६ के विषय के साथ सम्बद्ध है। "यथा" ये कृमिनाशक तथा गृहपीड़ा अर्थात स्त्री सम्बन्धी पीड़ा अर्थात् स्त्री सम्बन्धी पीड़ाओं को दूर करते, तथा विष नाश करते हैं। सरसों का रस और पाक राक्षस बाधा, कृमि, और गृह की बाधा को दूर करता है। "सरसों को पीस कर उस का शाफा बना कर, मासिकधर्म के स्नान के पश्चात् तीन दिन तक योनि में रखने से गर्भधारण होता है" (वनौषधि चन्द्रोदय, चन्द्रराज भण्डारी, विशारद, ज्ञानमन्दिर, भानपुरा)। [१. अर्थात् जैसे वृक्ष से प्राप्त पुष्पों की माला रख कर प्रिय को पहनाई जाती है, अप्रजासत्व, मृत वत्सस्व, रोद और अधरूपी पुष्पों की माला को तू अप्रियपक्ष में डाल, अर्थात् इस "पापमयी" माला को अप्रिय जान कर गृहस्थ जीवन में तू इस का परित्याग कर दे।]

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    विषय

    कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।

    भावार्थ

    (अप्रजास्त्वम्) स्त्रियों को सन्तान न होना, (मार्तवत्सम्) मरा हुआ बालक होना, (आत्) और तिस पर भी बालक के होते समय (भावयम्) उत्पन्न होने वाली पीड़ाओं के कारण (रोदम्) बहुत अधिक पीड़ा से (आयम्) कष्ट या बुरे लक्षण दीखना (तत्) इन सबको (वृक्षात् स्रजम् इव) जिस प्रकार वृक्ष से फूल तोड़ लिया जाता है उसी प्रकार सुगमता से स्त्री शरीर से (कृत्वा) दूर करके इन सब रोगों को (अप्रिये) अप्रिय पक्ष में (प्रतिमुञ्च) डाल दे, अर्थात इन रोगों को सदा अप्रिय जानकर इनका विनाश किया कर।

    टिप्पणी

    कुञोऽत्र प्रतिविधानमर्थः। सा०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Foetus Protection

    Meaning

    O man, let childlessness, child mortality, mourning and wailing, sin and suffering, be given up as objects of no-love like leaves fallen off from the branch of a tree.

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    Translation

    Sterility, still-birth, wailing and crying, and the fault causing barrenness - all these may you lay on our foe, as if having made a garland from (the flowers of) a tree.

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    Translation

    O physician ! send the barrenness, infant's death, weeping that gives signal of woe to the undesirable harmful calamity as a man plucking garland from the tree gives to other.

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    Translation

    Sterility, and infants’ death, and weeping that announced! -woe, O man, lay them on the enemy, as thou wouldst lay a garland made from the flowers of a tree on one dear and near to thee.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २६−(अप्रजास्त्वम्) नित्यमसिच् प्रजामेधयोः। पा० ५।४।१२२। अप्रजा-असिच्, भावे त्व, छान्दसो दीर्घः। अप्रजस्त्वम्। सन्तानराहित्यम् (मार्तवत्सम्) भावे अण्। मृतबालत्वम् (आत्) अपि च (रोदम्) रुदिर् अश्रुविमोचने-घञ्। रोदनम् (अघम्) पापम् (आवयम्) आ+व+यम्। वा गतिगन्धनयोः-ड, युजिर् योगे-ड। आ समन्ताद् वस्य गन्धनस्य हिंसनस्य यं योगम् (वृक्षात्) द्रुमात् (इव) यथा (स्रजम्) अ० १।१४।१। पुष्पमालाम् (कृत्वा) निर्माय (अप्रिये) द्वेष्ये (प्रति मुञ्च) प्रत्यक्षं मोचय (तत्) पूर्वोक्तं कर्म ॥

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