अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 24
ऋषिः - मातृनामा
देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
67
ये सूर्या॑त्परि॒सर्प॑न्ति स्नु॒षेव॒ श्वशु॑रा॒दधि॑। ब॒जश्च॒ तेषां॑ पि॒ङ्गश्च॒ हृद॒येऽधि॒ नि वि॑ध्यताम् ॥
स्वर सहित पद पाठये । सूर्या॑त् । प॒रि॒ऽसर्प॑न्ति । स्नु॒षाऽइ॑व । श्वशु॑रात् । अधि॑ । ब॒ज: । च॒ । तेषा॑म् । पि॒ङ्ग: । च॒ । हृद॑ये । अधि॑ । नि । वि॒ध्य॒ता॒म् ॥६.२४॥
स्वर रहित मन्त्र
ये सूर्यात्परिसर्पन्ति स्नुषेव श्वशुरादधि। बजश्च तेषां पिङ्गश्च हृदयेऽधि नि विध्यताम् ॥
स्वर रहित पद पाठये । सूर्यात् । परिऽसर्पन्ति । स्नुषाऽइव । श्वशुरात् । अधि । बज: । च । तेषाम् । पिङ्ग: । च । हृदये । अधि । नि । विध्यताम् ॥६.२४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गर्भ की रक्षा का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जो [उल्लू चोर आदि] (सूर्यात्) सूर्य से (अधि) अधिकारपूर्वक (परिसर्पन्ति) खिसक जाते हैं, (इव) जैसे (स्नुषा) पतोहू (श्वशुरात्) ससुर से। (बजः) बली (च) और (पिङ्गः) पराक्रमी [पुरुष] (च) भी (तेषाम्) उनके (हृदये) हृदय में (अधि) अधिकारपूर्वक (नि) निरन्तर (विध्यताम्) छेद डालें ॥२४॥
भावार्थ
बुद्धिमान् बलवान् पुरुष डरपोक चोर आदि और हिंसक जन्तुओं का नाश करें ॥२४॥
टिप्पणी
२४−(ये) चोरादयो हिंस्रजन्तवो वा (परिसर्पन्ति) पृथग् गच्छन्ति (स्नुषा) स्नुव्रश्चिकृत्यृषिभ्यः कित्। उ० ३।६६। ष्णु प्रस्रवणे-स प्रत्ययः, टाप्। स्नुषा साधुसादिनीति वा साधुसानिनीति वा स्वपत्यं तत्सनोतीति वा-निरु० १२।९। पुत्रवधूः (इव) यथा (श्वशुरात्) शावसेराप्तौ। उ० १।४४। शु+अशू व्याप्तौ-उरन्। आशु इति च शु इति च क्षिप्रनामनी भवतः-निरु० ६।१। शीघ्रव्याप्तव्यात् पतिजनकात् (अधि) अधिकृत्य (बजः) म० ३। बली पुरुषः (च) (तेषाम्) पूर्वोक्तानाम् (पिङ्गः) म० ६। पराक्रमी (च) अपि (हृदये) (अधि) अधिकृत्य (नि) निश्चयेन (विध्यताम्) ताडयताम् ॥
विषय
बजः च पिङ्गः च
पदार्थ
१. (ये) = जो कृमि (सूर्यात् परिसर्पन्ति) = सूर्य से-सूर्य प्रकाश से इसप्रकार दूर भागते हैं (इव) = जैसेकि (स्नुषा श्वशुरात् अधि) = पुत्रवधू श्वशुर से दूर हटती है। (तेषाम्) = उन सब कृमियों के (हृदये) = हृदय में (बजः च पिङ्गः च) = यह गौर सर्षप और पिंगल वर्ण का सर्षप (अधिनि विध्यताम्) = अतिशयेन बेध करनेवाले हों।
भावार्थ
बज और पिंग सर्षप अन्धकार में पनपनेवाले कृमियों को नष्ट करें।
भाषार्थ
(ये) जो (सूर्यात् परि) सूर्य का परिवर्जन कर के (सर्पन्ति) सर्पण करते हैं, (इव) जैसे कि (स्नुषा) पुत्रवधू (श्वशुरात्) श्वशुर से (अधि) परे-परे विचरती है, (ब्रजः च पिङ्गः च) वज और पिङ्ग (तेषाम्) उनके (हृदयेऽधि) हृदय में (नि विध्यताम्) नितरां वेधन करें।
टिप्पणी
[सूर्यात् परि= सूर्य वर्जयित्वा। अपपरी वर्जने (अष्टा० १।४।८९)। सूर्य की रश्मियों में रोगकीटाणु मर जाते हैं अतः वे निज जीवनार्थ सूर्य रश्मियों को वर्जित कर सर्पण करते हैं। (अथर्व० २।३२।१)। वजः, पिङ्गः= भूरे तथा श्वेत सर्षप= सरसों के बीज। मन्त्र में रोगकीटाणुओं का वर्णन है। तथा चोर आदि का भी जो कि सूर्य को परिवर्जित कर के रात्रीकाल में चौर्य आदि कर्म करते हैं। इस अभिप्राय में "वजः" = वाजः = बलशाली (निघं० २।९)। पिङ्गः अर्थात् रक्षक राजपुरुष (मन्त्र २१)। "पिङ्ग" के साहचर्य से "वज" का अभिप्राय है रक्षकवर्ग के साथ गति करने वाले अन्य बलशाली सहायक। वज व्रज गतौ (भ्वादिः)]।
विषय
कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।
भावार्थ
(श्वशुराद् अधि) श्वशुर से (स्नुषा इव) जिस प्रकार पुत्रवधू या बहू लज्जायुक्त होकर छिप जाती है उसी प्रकार (ये) जो दुष्ट प्राणी (सूर्यात्) सूर्य के प्रकाश से परे भाग कर अन्धेरे में जा छिपते हैं (बजः च पिंगः च) गतिशील, पराक्रमी और बली पुरुष या ओषधि (तेषाम्) उनके (हृदये अधि) हृदय में, मर्म में (नि विध्यताम्) खूब प्रहार करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥
इंग्लिश (4)
Subject
Foetus Protection
Meaning
Let Baja and Pinga pierce through the heart of those germs which creep away from sun light like the daughter-in-law slipping away from the presence of the father-in-law.
Translation
Those who shy away from the Sun, like a daughter-in-law from the father-in-law, let baja and pinga pierce them through their heart.
Translation
Let the plants named Baja and Pinga pierce through the hearts of those germs which creep away stealthily from the sun like a woman from the house of her husband’s father.
Translation
Thieves and dacoits shun the light of the Sun, as a woman through modesty shuns her husband’s father. Deep down into the heart of these let an energetic and powerful person pierce.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२४−(ये) चोरादयो हिंस्रजन्तवो वा (परिसर्पन्ति) पृथग् गच्छन्ति (स्नुषा) स्नुव्रश्चिकृत्यृषिभ्यः कित्। उ० ३।६६। ष्णु प्रस्रवणे-स प्रत्ययः, टाप्। स्नुषा साधुसादिनीति वा साधुसानिनीति वा स्वपत्यं तत्सनोतीति वा-निरु० १२।९। पुत्रवधूः (इव) यथा (श्वशुरात्) शावसेराप्तौ। उ० १।४४। शु+अशू व्याप्तौ-उरन्। आशु इति च शु इति च क्षिप्रनामनी भवतः-निरु० ६।१। शीघ्रव्याप्तव्यात् पतिजनकात् (अधि) अधिकृत्य (बजः) म० ३। बली पुरुषः (च) (तेषाम्) पूर्वोक्तानाम् (पिङ्गः) म० ६। पराक्रमी (च) अपि (हृदये) (अधि) अधिकृत्य (नि) निश्चयेन (विध्यताम्) ताडयताम् ॥
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