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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 6 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 22
    ऋषिः - मातृनामा देवता - मातृनामा अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गर्भदोषनिवारण सूक्त
    69

    द्व्यास्याच्चतुर॒क्षात्पञ्च॑पादादनङ्गु॒रेः। वृन्ता॑द॒भि प्र॒सर्प॑तः॒ परि॑ पाहि वरीवृ॒तात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    द्विऽआ॑स्यात् । च॒तु॒:ऽअ॒क्षात् । पञ्च॑ऽपादात् । अ॒न॒ङ्गु॒रे: । वृन्ता॑त् । अ॒भ‍ि । प्र॒ऽसर्प॑त: । परि॑ । पा॒हि॒ । व॒री॒वृ॒तात् ॥६.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    द्व्यास्याच्चतुरक्षात्पञ्चपादादनङ्गुरेः। वृन्तादभि प्रसर्पतः परि पाहि वरीवृतात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    द्विऽआस्यात् । चतु:ऽअक्षात् । पञ्चऽपादात् । अनङ्गुरे: । वृन्तात् । अभ‍ि । प्रऽसर्पत: । परि । पाहि । वरीवृतात् ॥६.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 6; मन्त्र » 22
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गर्भ की रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    (द्व्यास्यात्) दुमुहे से, (चतुरक्षात्) चार आँखोंवाले से, (पञ्चपादात्) पाँच पैरवाले से, (अनङ्गुरेः) विना चेष्टावाले से। (वृन्तात्) फल पत्र आदि के डण्ठल से (अभि) चारों ओर को (प्रसर्पतः) रेंगनेवाले (वरीवृतात्) टेढ़े-टेढ़े घूमनेवाले [कीड़े] से (परि) सब ओर से (पाहि) बचा ॥२२॥

    भावार्थ

    मनुष्य दुःखदायी कुरूप दुष्ट कीड़ों से सदा रक्षा करे ॥२२॥

    टिप्पणी

    २२−(द्व्यास्यात्) मुखद्वययुक्तात् (चतुरक्षात्) बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः०। पा० ५।४।११३। अक्षि-षच्। चतुर्नेत्रोपेतात् (पञ्चपादात्) पादपञ्चकयुक्तात् (अनङ्गुरेः) ऋतन्यञ्जिवन्य०। उ० ४।२। अगि गतौ-उलि, लस्य रः। चेष्टारहितात् (वृन्तात्) वृ वरणे-क्त, नुम् च। फलपत्रादिबन्धनात् (अभि) अभितः (प्रसर्पतः) प्रसर्पकात् (परि) (पाहि) (वरीवृतात्) वृतु वर्तने यङ्लुकि-पचाद्यच्। रीगृदुपधस्य च। पा० ७।४।९०। रीगागमः। कुटिलं वर्तनशीलात् क्रमेः ॥

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    विषय

    यास्यात् चतुरक्षात्

    पदार्थ

    १. (धास्यात्) = दो मुखवाले, (चतुरक्षात्) = चार आँखोंवाले, (पञ्चपादात्) = पाँच पाँववाले, (अनङ्गुरे:) = अंगुलियों से रहित (वृन्तात् अभिप्रसर्पत:) = लता-पुञ्ज से निकलकर हमारी ओर आते हुए अथवा [वृन्तवद् वृन्तं शिरः, पादाग्रं वा] सिर से आगे बढ़े हुए [अवाग् भूयाभिगच्छतः] (वरीवृतात्) = सब अङ्गों को व्याप्त करनेवाले इस कृमि से, हे ओषधे! तू (परिपाहि) = हमारा रक्षण कर।

    भावार्थ

    कई कृमि बड़े विचित्र-से होते हैं। उनके दो मुख, चार आँखे व पाँच पाँव होते हैं, इनकी अंगुली नहीं दिखती। सिर के बल आगे बढ़े हुए इन कृमियों से यह सर्षप हमारा रक्षण करे।

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    भाषार्थ

    (द्व्यास्यात्१) दुमुही से (चतुरक्षात्) चार आंखों वाले से (पञ्चपादात्) पांच पैरों वाले से (अनङ्गुरेः) अङ्गुलिरहित से, (वृन्तात्) लता से (अभिप्रसर्पतः) ऊपर-नीचे सर्पण करने वाले से (वरीवृत्तात्) वृत्ताकार वाले अर्थात् गोलावृत्ति वाले से (परि पाहि) रक्षा कर।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में कीटों द्वारा हुए भय से पूर्ण रक्षा करने का वर्णन है। मन्त्रप्रोक्त प्राणी अनुसन्धेय है। दुमुही लम्बा कीट होता है जिसके दोनों ओर मुंह होता है]।[१. मन्त्र में द्व्यास्य" आदि ६ प्रकार के कीटों का वर्णन हुआ है। ये कीटाणु नहीं। इन में से किसी द्वारा प्राप्त शरीर-विकार को सर्षप के बीज ठीक करते हैं। अनङ्गुरि द्वारा सांप और गण्डोए अभिप्रेत हैं। इन दोनों के न तो पैर होते हैं, न हाथ। अतः ये अनङ्गुरि हैं, 'अङ्गुलियों से रहित हैं'।]

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    विषय

    कन्या के लिये अयोग्य और वर्जनीय वर और स्त्रियों की रक्षा।

    भावार्थ

    (द्व्यास्यात्) दोमुँहे, (चतुरक्षात्) चार आंखों वाले, (पञ्चपादात्) पांच पैरों वाले, (अनंगुरेः) बिना अंगुली वाले या (वरीवृतात्) गोल मटोल गांठ के समान उस बालक से जो (वृन्तात्) गर्भाधानीके मूल से (अभि प्रसर्पतः) आगे को उत्पन्न हो रहा है उससे स्त्री को हे वैद्य ! (परि पाहि) सुरक्षित कर। अर्थात् वैद्य उत्तम उपचार द्वारा स्त्री को दुष्ट पिण्ड के प्रसव से बचावे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मातृनामा ऋषिः। मातृनामा देवता। उत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ३, ४-९,१३, १८, २६ अनुष्टुभः। २ पुरस्ताद् बृहती। १० त्र्यवसाना षट्पदा जगती। ११, १२, १४, १६ पथ्यापंक्तयः। १५ त्र्यवसाना सप्तपदा शक्वरी। १७ त्र्यवसाना सप्तपदा जगती॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Foetus Protection

    Meaning

    O physician, protect the mother and the foetus from double-mouthed, four eyed, five footed, fingerless germs creeping from leaves and creepers in curved motion.

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    Translation

    May you protect her well from the two-mouthed, foureyed, five-footed, fingerless worm, that creeps up and twines again and again (varivrtao).

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    Translation

    O Physician ! guard in every side from the germ having two mouths from the germ having five feet, from the germ having fore eyes, from the germ having no finger, from the germ which creeps from the stalk of the leaves and from the germ which has a curbed motion.

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    Translation

    O physician, guard the woman from the birth of a double-faced, four eyed, five-footed, fingerless, round-bodied, child, descending from the uterus!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २२−(द्व्यास्यात्) मुखद्वययुक्तात् (चतुरक्षात्) बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः०। पा० ५।४।११३। अक्षि-षच्। चतुर्नेत्रोपेतात् (पञ्चपादात्) पादपञ्चकयुक्तात् (अनङ्गुरेः) ऋतन्यञ्जिवन्य०। उ० ४।२। अगि गतौ-उलि, लस्य रः। चेष्टारहितात् (वृन्तात्) वृ वरणे-क्त, नुम् च। फलपत्रादिबन्धनात् (अभि) अभितः (प्रसर्पतः) प्रसर्पकात् (परि) (पाहि) (वरीवृतात्) वृतु वर्तने यङ्लुकि-पचाद्यच्। रीगृदुपधस्य च। पा० ७।४।९०। रीगागमः। कुटिलं वर्तनशीलात् क्रमेः ॥

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