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अथर्ववेद > काण्ड 5 > सूक्त 19

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  • अथर्ववेद - काण्ड 5/ सूक्त 19/ मन्त्र 11
    सूक्त - मयोभूः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त

    नवै॒व ता न॑व॒तयो॒ या भूमि॒र्व्य॑धूनुत। प्र॒जां हिं॑सि॒त्वा ब्राह्म॑णीमसंभ॒व्यं परा॑भवन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नव॑ । ए॒व । ता: । न॒व॒तय॑: । या: । भूमि॑: । विऽअ॑धूनुत । प्र॒ऽजाम् । हिं॒सि॒त्वा। ब्राह्म॑णीम् । अ॒स॒म्ऽभ॒व्यम् । परा॑ । अ॒भ॒व॒न् ॥१९.११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नवैव ता नवतयो या भूमिर्व्यधूनुत। प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नव । एव । ता: । नवतय: । या: । भूमि: । विऽअधूनुत । प्रऽजाम् । हिंसित्वा। ब्राह्मणीम् । असम्ऽभव्यम् । परा । अभवन् ॥१९.११॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 19; मन्त्र » 11

    पदार्थ -

    १. (ता:) = वे (नव नवतयः) = निन्यानवे लोग (याः भूमि: व्यधूनुत) = जिन्हें इस पृथिवी ने कम्पित कर दिया (ब्राह्मणीम्) = ज्ञानी ब्राह्मण से उपदिष्ट मार्ग पर चलनेवाली (प्रजाम्) = प्रजा को (हिंसित्वा) = हिंसित करके (असंभव्यम् एव पराभवन्) = अत्याचारी राजा इसप्रकार नष्ट हो गये जिसकी कोई कल्पना भी नहीं थी। २. राजा कई बार शक्ति के घमण्ड में धार्मिक प्रजा पर अत्याचार करने लगता है, परन्तु अन्ततः इसका असम्भव-से प्रतीत होनेवाले ढंग से विनाश हो जाता है।

    भावार्थ -

    सैकड़ों राजा धार्मिक प्रजाओं पर अत्याचार करके अन्ततः विनष्ट हो जाते हैं।

     

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