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  • अथर्ववेद - काण्ड 9/ सूक्त 10/ मन्त्र 22
    सूक्त - ब्रह्मा देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम् छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आत्मा सूक्त

    कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति। तं आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यूदुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कृ॒ष्णम् । नि॒ऽयान॑म् । हर॑य: । सु॒ऽप॒र्णा: । अ॒प: । वसा॑ना: । दिव॑म् । उत् । प॒त॒न्ति॒ । ते । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒न् । सद॑नात् । ऋ॒तस्य॑ । आत् । इत् । घृ॒तेन॑ । पृ॒थि॒वीम् । वि । ऊ॒दु॒: ॥१५.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति। तं आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद्घृतेन पृथिवीं व्यूदुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कृष्णम् । निऽयानम् । हरय: । सुऽपर्णा: । अप: । वसाना: । दिवम् । उत् । पतन्ति । ते । आ । अववृत्रन् । सदनात् । ऋतस्य । आत् । इत् । घृतेन । पृथिवीम् । वि । ऊदु: ॥१५.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 10; मन्त्र » 22

    पदार्थ -

    १. (कृष्णम्) = [कृष् श्रम का प्रतीक है, ण ज्ञान का] उत्पादक श्रम व ज्ञान से बने हुए (नियानम्) = बाड़े में (हरयः) = इन्द्रियों का प्रत्याहरण करनेवाले कर्मेन्द्रियों को उत्पादन श्रम में तथा ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान-प्राप्ति में लगाये रखनेवाले और इसप्रकार (सुपर्णा:) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (अपः वसान:) = अपने कर्तव्यकर्मों का धारण करनेवाले लोग (दिवम् उत्पतन्ति) = स्वर्ग को जाते हैं। २. जब कभी (ते) = वे सत्य-मार्ग पर चलनेवाले लोग (ऋतस्य सदनात्) = सत्य के निवास स्थान से (आववृत्रन्) = लौट आते हैं, अर्थात् मोक्ष से लौटते हैं तो (आत् इत्) = इसके पश्चात् शीघ्र ही (पतेन) = ज्ञान की दीसि से (पृथिवीं व्यदः) = इस पृथिवी को क्लिन्न कर देते हैं। मोक्ष से लौटने पर ये पृथिवी पर ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए यत्नशील होते हैं।

    भावार्थ -

    मोक्ष-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को ज्ञान व कर्म के बाड़े में प्रत्याहृत करें, अपना पालन व पूरण करें, सदा क्रियामय जीवनवाले हों। मोक्ष से लौटने पर हम ज्ञान-प्रसार के कार्य में ही प्रवृत्त रहें।

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