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  • अथर्ववेद - काण्ड 9/ सूक्त 4/ मन्त्र 15
    सूक्त - ब्रह्मा देवता - ऋषभः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ऋषभ सूक्त

    क्रो॒ड आ॑सीज्जामिशं॒सस्य॒ सोम॑स्य॒ क॒लशो॑ धृ॒तः। दे॒वाः सं॒गत्य॒ यत्सर्व॑ ऋष॒भं व्यक॑ल्पयन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क्रो॒ड: । आ॒सी॒त् । जा॒मि॒ऽशं॒सस्य॑ । सोम॑स्य । क॒लश॑: । धृ॒त: । दे॒वा: । स॒म्ऽगत्य॑ । यत् । सर्वे॑ । ऋ॒ष॒भम् । वि॒ऽअक॑ल्पयन् ॥४.१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    क्रोड आसीज्जामिशंसस्य सोमस्य कलशो धृतः। देवाः संगत्य यत्सर्व ऋषभं व्यकल्पयन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    क्रोड: । आसीत् । जामिऽशंसस्य । सोमस्य । कलश: । धृत: । देवा: । सम्ऽगत्य । यत् । सर्वे । ऋषभम् । विऽअकल्पयन् ॥४.१५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 4; मन्त्र » 15

    भावार्थ -
    वह परमात्मा (जामिशंसस्य) सब जगत् को उत्पन्न करने वाली माता कहने वाले भक्त के लिये, (क्रोडः आसीत्) माता की गोद ही है। और मानो वह स्वयं (सोमस्य) सोम, आनन्द रस का (कलशः) पूर्ण कलश (धृतः) माना गया हैं। (देवाः) विद्वान् लोग (यत्) भी (सर्वे) सब (संगत्य) नाना प्रकार से संगति लगाकर (ऋषभं) उस महान् परमेश्वर को (वि अकल्पयन्) विविध प्रकार से कल्पना कर लेते हैं। अथवा (सर्वे देवाः) समस्त दिव्य पदार्थ ही (संगत्य) विविध परस्पर मिलकर स्वयं (ऋषभम्) उस महान् पुरुष को (वि अकल्पयन्) विविध रूपों से कल्पित कर रहे हैं अर्थात् वे ही उसके अंग प्रत्यंग बना रहे हैं।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - ब्रह्मा ऋषिः। ऋषभो देवता। १-५, ७, ९, २२ त्रिष्टुभः। ८ भुरिक। ६, १०,२४ जगत्यौ। ११-१७, १९, २०, २३ अनुष्टुभः। १२ उपरिष्टाद् बृहती। २१ आस्तारपंक्तिः। चतुर्विंशर्चं सूक्तम्॥

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