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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 166 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 166/ मन्त्र 10
    ऋषिः - मैत्रावरुणोऽगस्त्यः देवता - मरुतः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    भूरी॑णि भ॒द्रा नर्ये॑षु बा॒हुषु॒ वक्ष॑स्सु रु॒क्मा र॑भ॒सासो॑ अ॒ञ्जय॑:। अंसे॒ष्वेता॑: प॒विषु॑ क्षु॒रा अधि॒ वयो॒ न प॒क्षान्व्यनु॒ श्रियो॑ धिरे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भूरी॑णि । भ॒द्रा । नर्ये॑षु । बा॒हुषु॑ । वक्षः॑ऽसु । रु॒क्माः । र॒भ॒सासः॑ । अ॒ञ्जयः॑ । अंसे॑षु । एताः॑ । प॒विषु॑ । क्षु॒राः । अधि॑ । वयः॑ । न । प॒क्षान् । वि । अनु॑ । श्रियः॑ । धि॒रे॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भूरीणि भद्रा नर्येषु बाहुषु वक्षस्सु रुक्मा रभसासो अञ्जय:। अंसेष्वेता: पविषु क्षुरा अधि वयो न पक्षान्व्यनु श्रियो धिरे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भूरीणि। भद्रा। नर्येषु। बाहुषु। वक्षःऽसु। रुक्माः। रभसासः। अञ्जयः। अंसेषु। एताः। पविषु। क्षुराः। अधि। वयः। न। पक्षान्। वि। अनु। श्रियः। धिरे ॥ १.१६६.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 166; मन्त्र » 10
    अष्टक » 2; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    येषां नर्येषु भूरीणि भद्रा बाहुषु वक्षःसुः रुक्मा अंसेष्वेता रभसासोऽञ्जयः पविष्वधिक्षुरा वर्त्तन्ते वयः पक्षान् न श्रियो व्यनु धिरे ॥ १० ॥

    पदार्थः

    (भूरीणि) बहूनि (भद्रा) भजनीयानि धर्म्याणि कर्माणि (नर्येषु) नृभ्यो हितेषु (बाहुषु) प्रचण्डदोर्दण्डेषु (वक्षस्सु) उरस्सु (रुक्माः) सुवर्णरत्नादियुक्ता अलङ्काराः (रभसासः) वेगवन्तः (अञ्जयः) प्रसिद्धप्रशंसाः (अंसेषु) स्कन्धेषु (एताः) शिक्षायां प्राप्ताः (पविषु) सुशिक्षितासु वाक्षु। पवीति वाङ्ना०। निघं० १। ११। (क्षुराः) धर्म्यशब्दाः (अधि) अधिके (वयः) पक्षिणः (न) इव (पक्षान्) (वि) (अनु) (श्रियः) लक्ष्मीः (धिरे) दधिरे दधति। अत्र छान्दसोऽभ्यासस्य लुक् ॥ १० ॥

    भावार्थः

    ये ब्रह्मचर्येण प्राप्तविद्या गृहाश्रमे धृताऽलङ्काराः पुरुषार्थयुक्ताः कृतपरोपकारा वानप्रस्थे प्राप्तवैराग्या अध्यापनरताः संन्यासेऽधिगतयाथातथ्याः परोपकाररताः सर्वत्र विचरन्तः सत्यं ग्राहयन्तोऽसत्यं त्याजयन्तोऽखिलाञ्जनान् वर्द्धयन्ति ते मोक्षमाप्नुवन्ति ॥ १० ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    जिनके (नर्येषु) मनुष्यों के लिये हितरूप पदार्थों में (भूरीणि) बहुत (भद्रा) सेवन करने योग्य धर्मयुक्त कर्म वा (बाहुषु) प्रचण्ड भुजदण्डों और (वक्षस्सु) वक्षःस्थलों में (रुक्माः) सुवर्ण और रत्नादियुक्त अलङ्कार (अंसेषु) स्कन्धों में (एताः) विद्या की शिक्षा में प्राप्त (रभसासः) वेग जिनमें विद्यमान ऐसे (अञ्जयः) प्रसिद्ध प्रशंसायुक्त पदार्थ (पविषु, अधि) उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों में (क्षुराः) धर्मानुकूल शब्द वर्त्तमान हैं वे (वयः) पखेरू (पक्षान्) पंखों को (न) जैसे वैसे (श्रियः) लक्ष्मियों को (वि, अनु, धिरे) विशेषता से अनुकूल धारण करते हैं ॥ १० ॥

    भावार्थ

    जो ब्रह्मचर्य से विद्याओं को प्राप्त हुए, गृहाश्रम में आभूषणों को धारण किये पुरुषार्थयुक्त परोपकारी, वानप्रस्थाश्रम में वैराग्य को प्राप्त पढ़ाने में रमे हुए और संन्यास आश्रम में प्राप्त हुआ यथार्थभाव जिनको और परोपकारी सर्वत्र विचरते सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कराते हुए समस्त मनुष्यों को बढ़ाते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥

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    विषय

    सैनिकों की शोभा

    पदार्थ

    १. गत मन्त्र में वर्णित मरुतों [सैनिकों] की (नर्येषु) = नर-हितकारी बाहुषु भुजाओं में भूरीणि भद्रा खूब ही कल्याणकर कर्म आश्रित हैं। ये सैनिक राष्ट्र के भरणात्मक कार्यों में सदा लगे रहते हैं। युद्ध का अवसर न होने पर भी ये राष्ट्रोपयोगी अन्य निर्माणात्मक कार्यों में भाग लेनेवाले होते हैं । २. ये (वक्षःसु) = छातियों पर (रुक्मा:) = स्वर्ण पदकों को धिरे धारण करते हैं, जो स्वर्ण पदक (रभसासः अञ्जयः) = इनके शक्तियुक्त कर्मों को प्रकट करनेवाले हैं । ३. (अंसेषु) = इनके कन्धों पर (एता:) = [shining] चमकते हुए अस्त्र होते हैं, (पविषु) = इनके वज्रादि अस्त्रों में (क्षुरा:) = क्षुरे के समान तेज़ धार होती हैं। इस प्रकार ये सैनिक (वयः पक्षान्) = जैसे पक्षी पंखों को धारण करते हैं, उसी प्रकार (श्रियः) = शोभाओं को (वि अनुधिरे) = विशेषरूप से धारण करते हैं। शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित सैनिक अत्यन्त शोभायमान होते हैं। सैनिक सदा राष्ट्रहितकारी कार्यों में व्याप्त रहते हैं। उनके बल के कार्यों के

    भावार्थ

    भावार्थ- सूचक स्वर्ण पदक उनके वक्षःस्थलों को सुशोभित करते हैं। ये शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित सैनिक खूब ही शोभायमान होते हैं।

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    विषय

    पक्षियोंवत् सुसज्जित वीरों का वर्णन ।

    भावार्थ

    जो वीर और विद्वान् मनुष्य ( रभसासः ) वेग से काम करने घाले, ( अंजयः ) मधुर स्वभाव, कान्तिमान् प्रसिद्ध गुणवान्, होकर ( नर्येषु ) मनुष्यों के हितकारी ( बाहुषु ) शत्रु-बाधक बाहुओं पर ( भूरीणि ) बहुत से (भद्रा) कल्याणकारी, अन्यों को सुख देने वाले बल, ऐश्वर्य और कर्त्तव्य धारण करते हैं ( वक्षः सु ) छातियों पर ( रुक्मा ) सुवर्ण के आभूषण पदक जो (अञ्जयः) उनके किये उत्तम कार्यों और गुणों को प्रकट करते हैं उनको और वे (अंसेषु) कन्धों पर ( एताः ) शुभ्रवर्ण के वस्त्र और ( पविषु ) वाणियों में ( क्षुराः ) उत्तम शब्द और ( पविषु क्षुराः ) शस्त्रों में तीक्ष्ण धारों को ( वयः न पक्षान् ) पक्षों पक्षियों के समान ( वि अनुधिरे ) विविध प्रकारों से धारण करें। इति द्वितीय वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मैत्रावरुणोऽगस्त्य ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः– १, २, ८ जगती । ३, ५, ६, १२, १३ निचृज्जगती । ४ विराट् जगती । ७, ९, १० भुरिक् त्रिष्टुप् । ११ विराट् त्रिष्टुप् । १४ त्रिष्टुप् । १५ पङ्क्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे ब्रह्मचर्याने विद्या प्राप्त करतात, गृहस्थाश्रमात आभूषण धारण करून पुरुषार्थयुक्त व परोपकारी बनतात, वानप्रस्थामध्ये वैराग्ययुक्त बनून शिकविण्यात रमलेले असतात व संन्यासाश्रमात यथार्थ भावाने परोपकारी बनून सर्वत्र संचार करतात. सत्याचे ग्रहण व असत्याचा त्याग करीत संपूर्ण मानव समाजाला उन्नत करून ते मोक्ष प्राप्त करतात. ॥ १० ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    In the arms of these heroes of the people there is abundant power for general good. On their chest are ornamented armours of strong and variegated design. On their shoulders are bows and arrows of lightning speed. On their thunderbolt is the sharpness of the razor’s edge. And they wear the dignity and grace of the wings of celestial birds.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The qualities of benevolents underlined.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    Many benevolent acts are performed by the Maruts, when they wear golden ornaments on their chests, Brilliant and conspicuous with good garlands, they have around their necks, such persons are received by the admirers because of their heroism and other good virtues. In their cultured speech, they use words thereby meaning the noble ideas. These Maruts (brave persons) spread their glory out like the birds spread out their wings.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons attain emancipation who acquire all knowledge by the observance of Brahmacharya, are industrious benevolent and are well decorative in their personal life. Such persons are engaged in teaching in Banaprastha life, being detached dispassioned and having acquired mature wisdom.

    Foot Notes

    (पविषु) सुशिक्षितासु वाक्षु । पवीती वाङ् नाम (.NG. 1-11) = In sophisticated speech. (क्षुरा: ) धर्म्मशब्दा: = Words full of noble ideas. (अञ्जयः) प्रसिद्धप्रशंसाः = Glorious.

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