ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 166/ मन्त्र 7
ऋषिः - मैत्रावरुणोऽगस्त्यः
देवता - मरुतः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
प्र स्क॒म्भदे॑ष्णा अनव॒भ्ररा॑धसोऽलातृ॒णासो॑ वि॒दथे॑षु॒ सुष्टु॑ताः। अर्च॑न्त्य॒र्कं म॑दि॒रस्य॑ पी॒तये॑ वि॒दुर्वी॒रस्य॑ प्रथ॒मानि॒ पौंस्या॑ ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । स्क॒म्भऽदे॑ष्णाः । अ॒न॒व॒भ्रऽरा॑धसः । अ॒ला॒तृ॒णासः॑ । वि॒दथे॑षु । सुऽस्तु॑ताः । अर्च॑न्ति । अ॒र्कम् । म॒दि॒रस्य॑ । पी॒तये॑ । वि॒दुः । वी॒रस्य॑ । प्र॒थ॒मानि॑ । पौंस्या॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र स्कम्भदेष्णा अनवभ्रराधसोऽलातृणासो विदथेषु सुष्टुताः। अर्चन्त्यर्कं मदिरस्य पीतये विदुर्वीरस्य प्रथमानि पौंस्या ॥
स्वर रहित पद पाठप्र। स्कम्भऽदेष्णाः। अनवभ्रऽराधसः। अलातृणासः। विदथेषु। सुऽस्तुताः। अर्चन्ति। अर्कम्। मदिरस्य। पीतये। विदुः। वीरस्य। प्रथमानि। पौंस्या ॥ १.१६६.७
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 166; मन्त्र » 7
अष्टक » 2; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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अष्टक » 2; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
ये स्कम्भदेष्णा अनवभ्रराधसोऽलातृणासः सुष्टुता जना विदथेषु वीरस्य प्रथमानि पौंस्या विदुस्ते मदिरस्य पीतयेऽर्कं प्रार्च्चन्ति ॥ ७ ॥
पदार्थः
(प्र) (स्कम्भदेष्णाः) स्तम्भनदातारः (अनवभ्रराधसः) अविनष्टधनाः (अलातृणासः) अलं शत्रूणां हिंसकाः (विदथेषु) संग्रामेषु (सुष्टुताः) सुष्ठुप्रशंसिताः (अर्च्चन्ति) सत्कुर्वन्ति (अर्कम्) अर्चनीयं विद्वांसम् (मदिरस्य) आनन्दप्रदस्य रसस्य (पीतये) पानाय (विदुः) जानन्ति (वीरस्य) शूरत्वादिगुणयुक्तस्य योद्धुः (प्रथमानि) (पौंस्या) बलानि ॥ ७ ॥
भावार्थः
ये युक्ताऽऽहारविहाराः शूरजनप्रियाः स्वसेनाबलानि वर्द्धयन्ते ते शत्रुविरहिता असंख्यधना पुष्कलदातारः प्राप्तप्रशंसा भवन्ति ॥ ७ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
जो (स्कम्भदेष्णाः) स्तम्भन देनेवाले अर्थात् रोक देनेवाले (अनवभ्रराधसः) जिनका धन विनाश को नहीं प्राप्त हुआ, (अलातृणासः) पूर्ण शत्रुओं को मारनेहारे (सुष्टुताः) अच्छी प्रशंसा को प्राप्त जन (विदथेषु) संग्रामों में (वीरस्य) शूरता आदि गुणयुक्त युद्ध करनेवाले के (प्रथमानि) प्रथम (पौंस्या) पुरुषार्थों बलों को (विदुः) जानते हैं वे (मदिरस्य) आनन्ददायक रस के (पीतये) पीने को (अर्कम्) सत्कार करने योग्य विद्वान् का (प्र, अर्च्चन्ति) अच्छा सत्कार करते हैं ॥ ७ ॥
भावार्थ
जो यथायोग्य आहार-विहार करने, शूरजनों से प्रीति रखनेवाले अपनी सेना के बलों को बढ़ाते हैं, वे शत्रुरहित असङ्ख्य धनयुक्त बहुत दान देनेवाले और प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥
विषय
श्रेष्ठ पुरुष
पदार्थ
१. गत मन्त्र के अनुसार आचार्यों से सुमति प्राप्त करनेवाले (प्रस्कम्भदेष्णाः) = प्रकर्षेण दान को धारण करनेवाले बनते हैं, ये निरन्तर दानशील होते हैं । (अनवभ्रराधसः) = [अभ्रष्टहविरादिधना:] इनका हविरूप धन कभी नष्ट नहीं होता। ये सदा हवि का स्वीकार करते हैं, दानपूर्वक ही अदन करनेवाले होते हैं, (अलातृणास:) = [अलं पर्याप्तं आतर्दनाः शत्रूणाम् – सा०] हवि की वृत्ति से काम-क्रोधादि शत्रुओं के खूब ही संहार करनेवाले होते हैं। हवि के द्वारा लोभ नष्ट हो जाता है, लोभ के नाश से कामक्रोधादि भी समाप्त हो जाते हैं, (विदथेषु सुष्टुता:) = ज्ञानयज्ञों में ये उत्तम स्तवनवाले होते हैं (शोभनं स्तुतं येषाम्) । २. (मदिरस्य) = मद व हर्ष के कारणभूत सोम के पीतये शरीर में ही पान के लिए ये प्राणसाधक पुरुष (अर्कम्) = उस उपासनीय प्रभु को (अर्चन्ति) = अर्चित करते हैं। 'प्रभु-उपासना' वासनाओं को विनष्ट करके उन्हें सोम के पान व रक्षण के योग्य बनाती है। इस प्रकार सोम का रक्षण करते हुए ये पुरुष (वीरस्य) = वीर प्रभु के (प्रथमानि पौंस्या) = सर्वोत्कृष्ट बलों को (विदुः) = जानते हैं, अर्थात् प्राप्त करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- श्रेष्ठ पुरुष 'दानशील, हवि का धारण करनेवाले, कामादि शत्रुओं के संहारक, स्तोता व उपासना के द्वारा सोम के रक्षक - प्रभु की शक्ति को प्राप्त करनेवाले' होते हैं ।
विषय
प्रशंसनीय वीरों के लक्षण ।
भावार्थ
वीर पुरुष और विद्वान् जन ( स्कम्भदेष्णाः ) युद्धादि में अपने सैन्य और प्रजा के बीच में स्तम्भन बल, दृढ़ता आदि गुणों और प्रबन्ध, बल के देने और “स्कम्भ” नाम सर्वाधार परमेश्वर के ज्ञान का उपदेश करने वाले, (अनवभ्रराधसः) कभी धन का नाश न करने वाले, सदा समृद्ध ( अलातृणासः ) शत्रुओं को खूब काट गिरा देने वाले और अति दानशील पुरुष (विदथेषु) संग्रामों और यज्ञों में (सु-ष्टुताः) उत्तम प्रशंसित होते हैं वे ( मदिरस्य पीतये ) आनन्दप्रद राष्ट्र की रक्षा के लिये ( अर्क अर्चन्ति ) सूर्य समान तेजस्वी पुरुष की अर्चना करते हैं, उसको प्रमुख बना कर उसके अधीन रहते हैं। इसी प्रकार विद्वान् ज्ञान मार्गों में ( मदिरस्य पीतये ) अति आनन्दमय आत्मरस का पान करने के लिये तेजोमय प्रभु की उपासना करते हैं। वे ही ( वीरस्य ) शूरवीर परम शक्तिमान् प्रभु के श्रेष्ठ श्रेष्ठ कर्मों को भली प्रकार जानते हैं ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मैत्रावरुणोऽगस्त्य ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः– १, २, ८ जगती । ३, ५, ६, १२, १३ निचृज्जगती । ४ विराट् जगती । ७, ९, १० भुरिक् त्रिष्टुप् । ११ विराट् त्रिष्टुप् । १४ त्रिष्टुप् । १५ पङ्क्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
जे यथायोग्य आहार-विहार करून शूर लोकांशी प्रीती ठेवणाऱ्या आपल्या सेनेचे बल वाढवितात ते शत्रूरहित होतात व अमाप धन प्राप्त करून पुष्कळ दान देतात व प्रशंसित होतात. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Givers of settlement and sustenance, sure and secure of their wealth and power of accomplishment, victorious over their opponents, highly applauded in the yajnic battles of life, honour and invite the brilliant and the wise for a drink of inspiring soma. They know, achieve and command the first, essential heroic powers of the brave and virtuous.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
In the praise of Maruts.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
The Maruts (learned persons ) give enduring gifts, possess unlimited riches and destroy enemies. They are free from ill-will and are ever praised on the moments of tough struggles with successful stamina. You know the heroic deeds of the brave Indra (commander of the army), you honor the venerable learned persons and drink the sweet juice of the exhilarating Soma plant etc.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those persons who are regular and punctual in their routine life are liked by brave persons. With powerful army at their command, they are capable to annihilate their enemies. Such people possess, inexhaustible wealth and are liberal donors and get praise everywhere.
Foot Notes
(अर्कम् ) अर्चनीयं विद्वांसम् := Venerable learned persons. ( अलातृणास:) अलं शत्रूणां हिंसका: = Destroyers of their enemies. ( अनवभ्रराधसः) अविनष्टधना: = Possessors of inexhaustible wealth, ( मदिरस्य) आनन्दप्रदस्य रसस्य = Of the joy-giving juice.
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