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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 166 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 166/ मन्त्र 8
    ऋषिः - मैत्रावरुणोऽगस्त्यः देवता - मरुतः छन्दः - जगती स्वरः - निषादः

    श॒तभु॑जिभि॒स्तम॒भिह्रु॑तेर॒घात्पू॒र्भी र॑क्षता मरुतो॒ यमाव॑त। जनं॒ यमु॑ग्रास्तवसो विरप्शिनः पा॒थना॒ शंसा॒त्तन॑यस्य पु॒ष्टिषु॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श॒तभु॑जिऽभिः । तम् । अ॒भिऽह्रु॑तेः । अ॒घात् । पूः॒ऽभिः । र॒क्ष॒त॒ । म॒रु॒तः॒ । यम् । आव॑त । जन॑म् । यम् । उ॒ग्राः॒ । त॒व॒सः॒ । वि॒ऽर॒प्शि॒नः॒ । पा॒थन॑ । शंसा॑त् । तन॑यस्य । पु॒ष्टिषु॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शतभुजिभिस्तमभिह्रुतेरघात्पूर्भी रक्षता मरुतो यमावत। जनं यमुग्रास्तवसो विरप्शिनः पाथना शंसात्तनयस्य पुष्टिषु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शतभुजिऽभिः। तम्। अभिऽह्रुतेः। अघात्। पूःऽभिः। रक्षत। मरुतः। यम्। आवत। जनम्। यम्। उग्राः। तवसः। विऽरप्शिनः। पाथन। शंसात्। तनयस्य। पुष्टिषु ॥ १.१६६.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 166; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 4; वर्ग » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे तनयस्य पुष्टिषु प्रयतमानां उग्रास्तवसो विरप्शिनो मरुतो यूयं शतभुजिभिः पूर्भिः सह यमभिह्रुतेरघाद्रक्षत यं जनमावत यं शंसात्पाथन तं वयमपि सर्वतो रक्षेम ॥ ८ ॥

    पदार्थः

    (शतभुजिभिः) शतमसङ्ख्यं सुखं भोक्तुं शीलं येषान्तैः (तम्) (अभिह्रुतेः) अभितः कुटिलात् (अघात्) पापात् (पूर्भिः) पूरणपालनसुखयुक्तैर्नगरैः (रक्षत)। अत्राऽन्येषामपीति दीर्घः। (मरुतः) वायवइव वर्त्तमानाः (यम्) (आवत) पालयत (जनम्) (यम्) (उग्राः) तेजस्विनः (तवसः) प्रवृद्धबलाः (विरप्शिनः) पूर्णविद्याशिक्षावीर्याः (पाथन) रक्षत। अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (शंसात्) आत्मस्तुतिरूपात् दोषात् (तनयस्य) अपत्यस्य (पुष्टिषु) पुष्टिकरणेषु कर्म्मसु ॥ ८ ॥

    भावार्थः

    ये मनुष्या युक्ताऽहारविहारसुशिक्षाब्रह्मचर्यविद्याभिः स्वसन्तानान् पुष्टियुक्तान् सत्यप्रशंसिनः पापात् पृथग्भूताँश्च कुर्वन्ति प्राणवत्प्रजा आनन्दयन्ति च तेऽनन्तसुखा भवन्ति ॥ ८ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (तनयस्य) सन्तान की (पुष्टिषु) पुष्टि करनेवाले कामों में प्रयत्न करते हुए (उग्राः) तेजस्वी तीव्र प्रतापयुक्त (तवसः) अत्यन्त बढ़े हुए बल से युक्त (विरप्शिनः) पूर्ण विद्या पूर्ण शिक्षा और पूर्ण पराक्रमवाले (मरुतः) पवनों के समान वर्त्तमान विद्वानो ! तुम (शतभुजिभिः) असङ्ख्य सुख भोगने को जिनका शील (पूर्भिः) पूरण, पालन और सुखयुक्त नगरों के साथ (यम्) जिसकी (अभिह्रुतेः) सब ओर से कुटिल (अघात्) पाप से (रक्षत) रक्षा करो बचाओ वा (यम्) जिस (जनम्) जन को (आवत) पालो वा जिसकी (शंसात्) आत्मप्रशंसारूप दोष से (पाथन) पालना करो (तम्) उसकी हम लोग भी सब ओर से रक्षा करें ॥ ८ ॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य युक्त आहार-विहार, उत्तम शिक्षा, ब्रह्मचर्य और विद्यादि गुणों से अपने सन्तानों को पुष्टियुक्त, सत्य की प्रशंसा करनेवाले और पाप से अलग रहनेवाले करते और प्राण के समान प्रजा को आनन्दित करते हैं, वे अनन्त सुखभोक्ता होते हैं ॥ ८ ॥

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    विषय

    स्वस्थ शरीर स्वस्थ मन

    पदार्थ

    १. हे (मरुतः) = प्राणो ! (यम्) = जिसको (आवत) = आप रक्षित करते हो (तम्) = उसे (शतभुजिभिः) = सौ वर्ष (पर्यन्त) = पालित होनेवाले पूर्भिः शरीरों के द्वारा (अभिह्रुतेः) = कुटिलता से तथा (अघात्) = पाप से (आ रक्षत) = बचाये रखते हो। प्राणसाधना का पहला परिणाम यह है कि शरीर सौ वर्ष पर्यन्त बड़ा स्वस्थ बना रहता है, दूसरा यह कि मन में कुटिलता व पाप की वृत्ति नहीं रहती। २. हे (उग्रा:) = तेजस्वी (तवस:) = बलवान् (विरप्शिन:) = महान् अथवा विशिष्ट स्तुति- शब्दोंवाले [रप् - शब्द] प्राणसाधको! आप (यं जनम्) = जिस मनुष्य को (पाथन) = रक्षित करते हो वह (तनयस्य पुष्टिषु) = सन्तानों का पोषण होने पर (आ शंसात्) = शंसन करनेवाला हो। ब्रह्मचर्याश्रम में जिसे तेजस्वी, बलवान्, प्रभुस्तवन करनेवाले ज्ञानी आचार्य प्राप्त होते हैं और उसे अशुभ मार्ग में जाने से बचाते हैं, वह व्यक्ति सद्गृहस्थ बनकर सन्तानों का समुचित पोषण करता है। इस पोषणकार्य की समाप्ति पर वह गृहस्थ के बोझ से मुक्त होकर स्वयं पाठन व प्रचार कार्य में व्याप्त होता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणसाधना से हम स्वस्थ शरीर व स्वस्थ मनवाले बनें। उत्तम आचार्यों द्वारा सुरक्षित जीवनवाले होकर सद्गृहस्थ बनें और गृहस्थ को समुचित रूप से निभाकर पाठन व प्रचार कार्य में प्रवृत्त हों ।

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    विषय

    उनके कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( मरुतः ) वीर पुरुषो ! ( उग्राः ) सदा बलशाली, ( विरप्शिन: ) नाना वाणियों, ज्ञानोपदेशों व विद्याओं के ज्ञाता, ( तवसः ) बलवान् होकर ( यम् ) जिस (जनं ) पुरुष को ( आवत ) बचाते और ( शंसात् ) गर्व भरी स्तुति या हिंसा होने से ( तनयस्य ) पुत्र समान पोषणादि कर्मों से (पाथन) रक्षा करते हो (तम्) उसको आप लोग ( अभिह्रतेः ) कुटिल मूर्छाकारी ( अघात् ) प्राणघातक पाप से ( शतभुजिभिः ) सेकड़ों को पालने वाले ( पूर्भिः ) पुरों या नगरों से ( रक्षत ) सुरक्षित रखो । प्राणों के पक्ष में—ये इन्द्रिय गण या देह सैकड़ों भोगदायी पुर हैं, उनसे प्राण गण, आत्मा की रक्षा करते और बालक के पोषण के लिये उसको ( शंसात् ) मृत्यु से भी बचाते हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मैत्रावरुणोऽगस्त्य ऋषिः ॥ मरुतो देवता ॥ छन्दः– १, २, ८ जगती । ३, ५, ६, १२, १३ निचृज्जगती । ४ विराट् जगती । ७, ९, १० भुरिक् त्रिष्टुप् । ११ विराट् त्रिष्टुप् । १४ त्रिष्टुप् । १५ पङ्क्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जी माणसे युक्त आहारविहार, उत्तम शिक्षण, ब्रह्मचर्य व विद्या इत्यादी गुणांनी आपल्या संतानांना पुष्ट करतात, सत्याची प्रशंसा करतात व पापापासून दूर राहतात, ती प्राणाप्रमाणे प्रजेला आनंदित करतात व अनंत सुख भोगतात. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Maruts, young leaders and heroes, bright, powerful and generous, whoever you promote and protect in city life with a hundred ways of comfort and security, protect him from crime and damage, and in matters of the promotion and advancement of his children, save the man from sin and scandal.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The qualities of the Maruts are further developed here.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    The Maruts are the brave persons. They always try to make our children strong and sturdy in every way. They are fierce (for the wicked) and mighty like the winds. They are full of wisdom, knowledge and vitality and therefore are great. You protect men from the crooked and build the cities of model standard and of luxurious dwellings, and protect them well. They also save us from the sins of self- praise. Let us also emulate them.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons enjoy limitless happiness who make their off springs, strong and robust by giving them good education and keep an observation on their regular life and Brahmacharya (continence). Thus they become free from all sins and become admirers of truth. It delights all people like their very Pranas.

    Foot Notes

    (अभिहतेः) अभितः कुटिलात्) = From crookedness on all sides. ( विरप्शिन:) पूर्णविद्याशिक्षावीर्या: = Full of wisdom, education and vitality. (शंसात्) आत्मस्तुतिरूपात् दोषात् = From the sin or blame of self-praise.

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