Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 68 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 68/ मन्त्र 1
    ऋषि: - प्रियमेधः देवता - इन्द्र: छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः

    आ त्वा॒ रथं॒ यथो॒तये॑ सु॒म्नाय॑ वर्तयामसि । तु॒वि॒कू॒र्मिमृ॑ती॒षह॒मिन्द्र॒ शवि॑ष्ठ॒ सत्प॑ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । त्वा॒ । रथ॑म् । यथा॑ । ऊ॒तये॑ । सु॒म्नाय॑ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । तु॒वि॒ऽकू॒र्मिम् । ऋ॒ति॒ऽसह॑म् । इन्द्र॑ । शवि॑ष्ठ । सत्ऽप॑ते ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्र शविष्ठ सत्पते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । त्वा । रथम् । यथा । ऊतये । सुम्नाय । वर्तयामसि । तुविऽकूर्मिम् । ऋतिऽसहम् । इन्द्र । शविष्ठ । सत्ऽपते ॥ ८.६८.१

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 68; मन्त्र » 1
    अष्टक » 6; अध्याय » 5; वर्ग » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    English (1)

    Meaning

    Indra, bravest of the brave, protector of the good and true, just as we turn the chariot, so do we draw your attention and pray you turn to us and come for our protection, welfare and enlightenment, lord of infinite action and conqueror of enemies.

    मराठी (1)

    भावार्थ

    तेवि=पुष्कळ, शविष्ठ = शवइष्ठ (महाबलाधिदेव) शव = बल । सर्वांनी त्याची (महाबली परमेश्वराची) प्रार्थना करावी. (महाबलाधिदेव) ॥१॥

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनरपीन्द्रनामधेयेन परमात्ममहिम्नः स्तूयते ।

    पदार्थः

    हे शविष्ठ ! महाबलाधि देव ! सत्पते=सतां पालक ! हे इन्द्र=परमैश्वर्य्यसंयुक्त भगवन् ! रथं यथा=रथमिव । ऊतये=रक्षायै । सुम्नाय=स्वाध्याय ज्ञानाय सुखाय च । तुविकूर्मिम्=बहुकर्माणम् । ऋतीसहम्=हिंसकानां दण्डयितारं निखिलविघ्ननिवारकम् । त्वा=त्वाम् । आवर्तयामसि=आवर्तयामः । आकृषाम इत्यर्थः ॥१ ॥

    हिन्दी (1)

    विषय

    पुनरपि इन्द्रनाम से परमात्मा के महिमा की स्तुति करते हैं ।

    पदार्थ

    (शविष्ठ) हे महाबलाधिदेव ! (सत्पते) हे सुजनरक्षक (इन्द्र) हे परमैश्वर्य्यसंयुक्त महेश ! (ऊतये) अपनी-अपनी सहायता और रक्षा के लिये (सुम्नाय) स्वाध्याय, ज्ञान और सुख के लिये (त्वा+आवर्तयामसि) तुझको हम अपनी ओर खेंचते हैं अर्थात् हम पर कृपादृष्टि करने के लिये तेरी प्रार्थना करते हैं । यहाँ दृष्टान्त देते हैं−(यथा+रथम्) जैसे रथ को खेंचते हैं । तू कैसा है, (तुविकूर्मिम्) जिस तेरे अनन्त कर्म हैं (ऋतीसहम्) जो तू निखिल विघ्नों को निवारण करनेवाला है ॥१ ॥

    भावार्थ

    तुवि=बहुत । शविष्ठ=शव+इष्ठ । शव=बल । सब ही उसी की प्रार्थना करें ॥१ ॥

    Top