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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 12
    ऋषिः - चातनः देवता - जातवेदाः छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - रक्षोघ्न सूक्त
    56

    स॒माह॑र जातवेदो॒ यद्धृ॒तं यत्परा॑भृतम्। गात्रा॑ण्यस्य वर्धन्तामं॒शुरि॒वा प्या॑यताम॒यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒म्ऽआह॑र । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । यत् । हृ॒तम् । यत् । परा॑ऽभृतम् । गात्रा॑णि । अ॒स्य॒ । व॒र्ध॒न्ता॒म् । अं॒शु:ऽइ॑व । आ । प्या॒य॒ता॒म् । अ॒यम् ॥२९.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समाहर जातवेदो यद्धृतं यत्पराभृतम्। गात्राण्यस्य वर्धन्तामंशुरिवा प्यायतामयम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सम्ऽआहर । जातऽवेद: । यत् । हृतम् । यत् । पराऽभृतम् । गात्राणि । अस्य । वर्धन्ताम् । अंशु:ऽइव । आ । प्यायताम् । अयम् ॥२९.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 29; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रुओं और रोगों के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे विद्या में प्रसिद्ध ! उसे ! (समाहर) भर दे (यत्) जो कुछ (हृतम्) हर लिया गया, अथवा (यत्) जो कुछ (पराभृतम्) हटाया गया है। (अस्य) इस [मनुष्य] के (गात्राणि) सब अङ्ग (वर्धन्ताम्) बढ़ें। (अयम्) यह पुरुष (अंशुः इव) वृक्ष के अङ्कुर के समान (आ प्यायताम्) बढ़ता रहे ॥१२॥

    भावार्थ

    सद्वैद्य रोगों को हटाकर प्राणियों को स्वस्थ रक्खें ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(समाहर) सम्यगानय पूरय (जातवेदः) प्रसिद्धविद्य (यत्) (हृतम्) गृहीतम् (यत्) (पराभृतम्) दूरे हृतम् (गात्राणि) अ० १।१२।४। गम्लृ−त्रन्, मस्य आकारः। अङ्गानि (अस्य) पुरुषस्य (वर्धन्ताम्) प्रवृद्धानि भवन्तु (अंशुः) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति अंश विभाजने−कु। वृक्षसूक्ष्माङ्कुरः (इव) यथा (आ) समन्तात् (प्यायताम्) प्रवृद्धो भवतु (अयम्) ॥

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    विषय

    अंशुः इव आप्यायताम्

    पदार्थ

    १. हे (जातवेदः) = ज्ञानी वैद्य (अस्य यत् हृतम्) = इस रोगी का जो भाग हर लिया गया है, (यत् पराभृतम्) = जो धातु व बल नष्ट कर दिया गया है, उसे समाहर-पुनः भली प्रकार प्राप्त करा। २. (अस्य) = इसके (गात्राणि) = अङ्ग (वर्धन्ताम्) = बढ़ें। (अयम्) = यह (अंशुः इव) = चन्द्र के समान (आप्यायताम्) = दिनों-दिन बढ़ता चले।

    भावार्थ

    ज्ञानी वैद्य औषध-प्रयोग द्वारा रोगी की क्षीणता को दूर कर दे। इस रोगी के अङ्ग फिर से बढ़ जाएँ। चन्द्रमा के समान इसका शरीर आप्यायित होता चले।

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    भाषार्थ

    (जातवेदः) हे जातप्रज्ञ ! [चिकित्सक ] या प्रधानमन्त्रिन् ! (समाहर) वापस ला दे (यत् हृतम्) जो मांस [रोग-जीवाणुओं ने] हर लिया है, (यत्) जो (पराभृतम्) परे फेंक दिया है। (अस्य) इस रुग्ण के (गात्राणि) शरीरावयव (वर्धन्ताम्) बढ़े, (अयम् ) यह रुग्ण (अंशुः१ इव) सोम ओषधि के अंकुरों के सदृश (आप्यायताम् ) पूर्णतया प्रवृद्ध हो ।

    टिप्पणी

    [समाहर=या तो चिकित्सक, अथवा प्रधानमन्त्री रोगी के अंगों के उपचय का प्रबन्ध करे। आप्यायताम्=ओप्यायी वृद्धौ (भ्वादिः)। यज्ञियाग्नि के सम्बन्ध में जातवेदा:="जाते जाते विद्यते इति वा" (निरुक्त ७।५।१९), यज्ञियाग्नि अग्निरूप में प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान है। यज्ञियाग्नि से उत्थित ओषधि-सम्पन्न धूम भी उपचयकारी है; यथा "यस्य कुर्मो हविर्गृहे तमग्ने वर्धया स्वम्" (यजुः० १७।५२)।] [१. अथवा सोम है चन्द्रमा, और अंशु हैं किरणें। अमावास्या के पश्चात चन्द्रमा की किरणें प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं, इसी प्रकार हे रुग्ण ! तू भी प्रतिदिन प्रबुद्ध हो।]

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    विषय

    रोगों का नाश करके आरोग्य होने का उपाय।

    भावार्थ

    हे (जात-वेदः) अग्ने ! (अस्य) इस रोगी पुरुष के शरीर में से (यत्) जो धातु और बल (हृतम्) रोंगों ने हर लिया है, और (यत्) जो (परा-भृतम्) विनष्ट कर दिया है उसे (सम्-आ हर) पुनः भली प्रकार प्राप्त करा। (अस्य) इसके (गात्राणि) शरीर के अंग (वर्धन्ताम्) बढ़ें और (अयम्) यह (अंशुः-इव) चन्द्र के समान (आ प्यायताम्) दिनों दिन बढ़े, मोटा ताज़ा हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। जातवेदा मन्त्रोक्ताश्व देवताः। १२, ४, ६-११ त्रिष्टुमः। ३ त्रिपदा विराड नाम गायत्री। ५ पुरोतिजगती विराड्जगती। १२-१५ अनुष्टुप् (१२ भुरिक्। १४, चतुष्पदा पराबृहती ककुम्मती)। पञ्चदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of Germs and Insects

    Meaning

    O Jataveda, recover and consolidate whatever has been lost and robbed away. Let parts of the body system recover and grow like filaments of the lotus and be whole as phases of the moon. (The mantra suggests the possibility of the regeneration of vital organs also.)

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    Translation

    O knower of all the born organisms, may you bring (gather), again what has beén robbed and what has been taken away. May the limbs of this person grow and may this person swell like a tendril of Soma plant (or the rays of moon). (Soma = moon, also a rare herb or creeper)

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    Translation

    O learned physician! restore him whatever has taken away from his body and whatever has been born off. Let the members of the patient grow and let him grow like the phase of the moon.

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    Translation

    Restore, O learned physician, what hath been removed and borne.away. Let this sick man's organs grow, let him wax like moon!

    Footnote

    What hath been removed: All the flesh that the sick man has lost.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(समाहर) सम्यगानय पूरय (जातवेदः) प्रसिद्धविद्य (यत्) (हृतम्) गृहीतम् (यत्) (पराभृतम्) दूरे हृतम् (गात्राणि) अ० १।१२।४। गम्लृ−त्रन्, मस्य आकारः। अङ्गानि (अस्य) पुरुषस्य (वर्धन्ताम्) प्रवृद्धानि भवन्तु (अंशुः) मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति अंश विभाजने−कु। वृक्षसूक्ष्माङ्कुरः (इव) यथा (आ) समन्तात् (प्यायताम्) प्रवृद्धो भवतु (अयम्) ॥

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