Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 25 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 25/ मन्त्र 16
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - वरुणः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    परा॑ मे यन्ति धी॒तयो॒ गावो॒ न गव्यू॑ती॒रनु॑। इ॒च्छन्ती॑रुरु॒चक्ष॑सम्॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पराः॑ । मे॒ । य॒न्ति॒ । धी॒तयः । गावः॑ । न । गव्यू॑तीः । अनु॑ । इ॒च्छन्तीः॑ । उ॒रु॒ऽचक्ष॑सम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु। इच्छन्तीरुरुचक्षसम्॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पराः। मे। यन्ति। धीतयः। गावः। न। गव्यूतीः। अनु। इच्छन्तीः। उरुऽचक्षसम्॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 25; मन्त्र » 16
    अष्टक » 1; अध्याय » 2; वर्ग » 19; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

    अन्वयः

    यथा गव्यूतीरन्विच्छन्त्यो गावो न इव मे ममेमा धीयत उरुचक्षसं मां परायन्ति तथा सर्वान् कर्त्तॄन् प्रति स्वानि स्वानि कर्माणि प्राप्नुवन्त्येवेति विज्ञेयम्॥१६॥

    पदार्थः

    (परा) प्रकृष्टार्थे (मे) मम (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (धीतयः) दधात्यर्थान् याभिः कर्मवृत्तिभिस्ताः (गावः) पशुजातयः (न) इव (गव्यूतीः) गवां यूतयः स्थानानि। गोर्यूतौ छन्दस्युपसंख्यानम्। (अष्टा०वा०६.१.७९) (अनु) अनुगमार्थे (इच्छन्तीः) इच्छन्त्यः। अत्र सुपां सुलुग्० इति पूर्वसवर्णः। (उरुचक्षसम्) उरुषु बहुषु चक्षो विज्ञानं प्रकाशनं वा यस्य तं कर्मकर्त्तारं जीवं माम्॥१६॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैरेवं निश्चतेव्यं यथा गावः स्व-स्ववेगानुसारेण धावन्त्योऽभीष्टं स्थानं गत्वा परिश्रान्ता भवन्ति, तथैव मनुष्याः स्व-स्वबुद्धिबलानुसारेण परमेश्वरस्य सूर्यादेर्वा गुणानन्विष्य यथाबुद्धि विदित्वा परिश्रान्ता भवन्ति, नैव कस्यापि जनस्य बुद्धिशरीरवेगोऽपरिमितो भवितुमर्हति। यथा पक्षिणः स्व-स्वबलानुसारेणाकाशं गच्छन्तो नैतस्यान्तं कश्चिदपि प्राप्नोति, तथैव कश्चिदपि मनुष्यो विद्याविषयस्यान्तं गन्तुं नार्हति॥१६॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (5)

    विषय

    फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    जैसे (गव्यूतीः) अपने स्थानों को (इच्छन्तीः) जाने की इच्छा करती हुई (गावः) गो आदि पशु जाति के (न) समान (मे) मेरी (धीतयः) कर्म की वृत्तियाँ (उरुचक्षसम्) बहुत विज्ञानवाले मुझ को (परायन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं, वैसे सब कर्त्ताओं को अपने-अपने किये हुए कर्म प्राप्त होते ही हैं, ऐसा जानना योग्य है॥१६॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा निश्चय करना चाहिये कि जैसे गौ आदि पशु अपने-अपने वेग के अनुसार दौड़ते हुए चाहे हुए स्थान को पहुँच कर थक जाते हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि बल के अनुसार परमेश्वर वायु और सूर्य्य आदि पदार्थों के गुणों को जानकर थक जाते हैं। किसी मनुष्य की बुद्धि वा शरीर का वेग ऐसा नहीं हो सकता कि जिस का अन्त न हो सके, जैसे पक्षी अपने-अपने बल के अनुसार आकाश को जाते हुए आकाश का पार कोई भी नहीं पाता, इसी प्रकार कोई मनुष्य विद्या विषय के अन्त को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता है॥१६॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यथा गव्यूतीः अन्विच्छन्त्यः गावः न इव मे मम इमाः धीयत उरुचक्षसं मां परा यन्ति तथा सर्वान् कर्त्तॄन् प्रति स्वानि स्वानि कर्माणि प्राप्नुवन्ति एव इति विज्ञेयम्॥१६॥ 

    पदार्थ

    (यथा)=जैसे, (गव्यूतीः) गवां यूतयः स्थानानि=गायें अपने स्थानों को पहुंचने के लिये,  (अनु) अनुगमार्थे=एक दूसरे का अनुगमन करते हुए, (इच्छन्त्यः)  इच्छन्तीः=जाने की इच्छा करती हुई, (गावः) पशुजातयः=गो आदि पशु जाति के, (न) इव=जैसे, (मे) मम=मेरे, (इमाः)=ये सब, (धीतयः) दधात्यर्थान् याभिः कर्मवृत्तिभिस्ताः=कर्म की वृत्तियाँ, (उरुचक्षसम्) उरुषु बहुषु चक्षो विज्ञानं प्रकाशनं वा यस्य तं कर्मकर्त्तारं जीवं माम्= बहुत प्रशस्त विशिष्ट ज्ञान को प्रकाशित करने वाले मुझ को, (परा) प्रकृष्टार्थे=अच्छे प्रकार से, (यन्ति) प्राप्नुवन्ति=प्राप्त होती हैं, (तथा)=वैसे ही, (सर्वान्)=समस्त, (कर्त्तॄन्)=कर्त्ताओं के, (प्रति)=प्रति, (स्वानि)=अपने, (स्वानि)=अपने, (कर्माणि)=कर्मों को, (प्राप्नुवन्ति)= प्राप्त होते हैं, (एव)=ही, (इति)=ऐसे, (विज्ञेयम्)=जानने योग्य है॥१६॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा निश्चय करना चाहिये कि जैसे गायें अपने-अपने वेग के अनुसार दौड़ते हुए चाहे हुए स्थान पर पहुँच कर थक जाती हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि होने पर बुद्धि के अनुसार परमेश्वर वायु और सूर्य आदि पदार्थों के गुणों के  के प्रकट होने पर जानकर थक जाते हैं। किसी मनुष्य की बुद्धि वा शरीर का वेग ऐसा असीमित  नहीं हो सकता है। जैसे पक्षी अपने-अपने बल के अनुसार आकाश को जाते हुए इसके अन्त को पार कोई भी नहीं पाते हैं, इसी प्रकार कोई मनुष्य विद्या विषय के अन्त को प्राप्त होने में समर्थ नहीं हो सकता है॥१६॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यथा) जैसे (गव्यूतीः) गायें अपने स्थानों को पहुंचने के लिये  (अनु) एक दूसरे का अनुगमन करते हुए (इच्छन्त्यः)  जाने की इच्छा करती हुई (गावः) गो आदि पशु जाति के (न) जैसे गमन करते हैं। (मे) मेरी (इमाः) ये सब    (धीतयः) कर्म की वृत्तियाँ (उरुचक्षसम्) बहुत प्रशस्त विशिष्ट ज्ञान को प्रकाशित करने वाले मुझ को (परा) अच्छे प्रकार से  (यन्ति) प्राप्त होती हैं। (तथा) वैसे ही (सर्वान्) समस्त (कर्त्तॄन्) कर्त्ताओं के (प्रति) प्रति (स्वानि) अपने (स्वानि) अपने (कर्माणि) कर्मों को (प्राप्नुवन्ति) प्राप्त होते हैं। (इति) ऐसे (एव) ही  (विज्ञेयम्) जानने योग्य है॥१६॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (परा) प्रकृष्टार्थे (मे) मम (यन्ति) प्राप्नुवन्ति (धीतयः) दधात्यर्थान् याभिः कर्मवृत्तिभिस्ताः (गावः) पशुजातयः (न) इव (गव्यूतीः) गवां यूतयः स्थानानि। गोर्यूतौ छन्दस्युपसंख्यानम्। (अष्टा०वा०६.१.७९) (अनु) अनुगमार्थे (इच्छन्तीः) इच्छन्त्यः। अत्र सुपां सुलुग्० इति पूर्वसवर्णः। (उरुचक्षसम्) उरुषु बहुषु चक्षो विज्ञानं प्रकाशनं वा यस्य तं कर्मकर्त्तारं जीवं माम्॥१६॥
    विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

    अन्वयः- यथा गव्यूतीरन्विच्छन्त्यो गावो न इव मे ममेमा धीयत उरुचक्षसं मां परायन्ति तथा सर्वान् कर्त्तॄन् प्रति स्वानि स्वानि कर्माणि प्राप्नुवन्त्येवेति विज्ञेयम्॥१६॥

    भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैरेवं निश्चतेव्यं यथा गावः स्व-स्ववेगानुसारेण धावन्त्योऽभीष्टं स्थानं गत्वा परिश्रान्ता भवन्ति, तथैव मनुष्याः स्व-स्वबुद्धिबलानुसारेण परमेश्वरस्य सूर्यादेर्वा गुणानन्विष्य यथाबुद्धि विदित्वा परिश्रान्ता भवन्ति, नैव कस्यापि जनस्य बुद्धिशरीरवेगोऽपरिमितो भवितुमर्हति। यथा पक्षिणः स्व-स्वबलानुसारेणाकाशं गच्छन्तो नैतस्यान्तं कश्चिदपि प्राप्नोति, तथैव कश्चिदपि मनुष्यो विद्याविषयस्यान्तं गन्तुं नार्हति॥१६॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    वरुण की ही कामना

    पदार्थ

    १. (उरुचक्षसम्) - अनन्त व विस्तीर्ण ज्ञानवाले उस वरुण को (इच्छन्ति) - चाहती हुई (मे) - मेरी (धीतयः) - चित्तवृत्तियाँ (परा यन्ति) - विषयों से पराङ्मुख होकर हृदयदेश की ओर जाती हैं । मेरी वृत्तियाँ हृदयदेश की ओर उसी प्रकार जाती हैं (न) - जैसेकि (गावः) - गौएँ (गव्यूतीः ,अनु) - चरागाहों को लक्ष्य करके जाती हैं । 

    २. भूख लगी होने पर गौओं को चरागाह के अतिरिक्त कुछ सूझता नहीं । वे इधर - उधर ध्यान न करती हुई चरागाह की ओर ही बढ़ती हैं , इसी प्रकार मेरी चित्तवृत्तियाँ भी उस प्रभु की ओर ही बढ़ती हैं । उस प्रभु के सिवाय मेरी यह वृत्ति अन्यत्र नहीं जाती , उस प्रभु पर पहुँचकर ही विश्रान्त होती है । 

     

     

    भावार्थ

    भावार्थ - हम विषयों से पृथक् होकर अपनी वृत्ति को 'वरुण' में ही लगाएँ । उसी का वरण करें और 'वरुण' ही बन जाएँ । 

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    विद्वान् पुरुष ।

    भावार्थ

    ( गव्यूतीः अनु ) गौओं के जाने के स्थान, बाड़े में जिस प्रकार (गावः न ) गौएं जाती हैं उसी प्रकार ( उरुचक्षसम् ) समस्त विशाल लोकों के द्वष्टा सूर्य के समान दर्शनीय, तेजोमय उस परमेश्वर को ( इच्छन्तीः ) चाहती हुई ( मे ) मेरी ( धीतयः ) बुद्धियां और चेष्टाएं ( परा अनु यन्ति ) दूर तक उसीको लक्ष्य करके चलती जाती हैं। और मुमुक्षु के सब मनन और कर्म प्रयत्न उसी परमेश्वर के लिए हैं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुनःशेप आजीगर्तिऋषिः॥ वरुणो देवता ॥ गायत्र्य: । एकविंशत्यृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    मन्त्रार्थ

    (मे धीतयः-उरुचक्षसम्-इच्छन्तीः परायन्ति) मेरी ध्यान वृत्तियां महान् द्रष्टा अथवा बहुदर्शनीय वरुण परमात्मा को चाहती हुई अन्य विषयों से पराङ्मुख होती जाती हैं किन्तु उसी वरुण परमात्मा में विश्राम पाती हैं (गाव:-गव्यूती:-अनु) गौएं जैसे अपने गोस्थलियों की ओर चली जाती हैं विश्रामार्थ अग्य भ्रमण चरण से पराङ्मुख होकर वह ऐसा वरुण परमात्मा है॥१६॥

    विशेष

    ऋषिः-आजीगर्तः शुनः शेपः (इन्द्रियभोगों की दौड में शरीरगर्त में गिरा हुआ विषयलोलुप महानुभाव) देवता-वरुणः (वरने योग्य और वरने वाला परमात्मा)

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. माणसांनी असा निश्चय केला पाहिजे, की जशा गायी इत्यादी पशू आपापल्या वेगानुसार धावतात व इच्छित स्थानी पोहोचून परिश्रांत होतात, तशीच माणसे आपल्या बुद्धिबळानुसार परमेश्वर, वायू व सूर्य इत्यादी पदार्थांच्या गुणांना जाणून परिश्रांत होतात. एखाद्या माणसाची बुद्धी किंवा शरीराचा वेग असा असू शकत नाही, की ज्याचा अंत होणार नाही. जसा पक्षी आपापल्या बलानुसार आकाशात उडताना आकाशाच्या पलीकडे जाऊ शकत नाही, त्याचप्रकारे कोणताही माणूस विद्येचा अंत जाणण्यास समर्थ होऊ शकत नाही. ॥ १६ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (3)

    Meaning

    As cows run to their stall yearning for home, so do my thoughts rise and travel far and high yearning for Varuna, Lord Supreme of universal vision, watching over all, and my haven and home.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject of the mantra

    Then, what kind of Varuna (God) is? This subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yathā)=As, (gavyūtīḥ) =cows to reach their places, (anu)=following each other, (icchantyaḥ)=desiring to go, (gāvaḥ)=bovine, (na)=as they go, (me)=my, (imāḥ)=all these, (dhītayaḥ)=karmic tendencies, (urucakṣasam)=to me who reveals very specialized knowledge, (parā)=well, (yanti)=are obtained, (tathā)=in the same way, (sarvān)=all, (karttṝn)=of doers, (prati)=against (svāni-svāni) own of each doer, (karmāṇi)=of karmas, (prāpnuvanti)=get obtained, (iti)=such as, (eva)=only, (vijñeyam)=is worth knowing.

    English Translation (K.K.V.)

    As the cows desiring to reach their places follow each other and as bovines go. My all these karmic tendencies are obtained well to me which reveals the very specialized knowledge. So in the same way get obtained to own of each doer only against all doers of karmas. Such is only worth knowing.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    Human beings should make such a decision that just as cows get tired after reaching the desired place by running according to their own speed, similarly human beings, having their own intellect, manifest the qualities of God, air and Sun etc., are tired of knowing. The velocity of a person's intellect or body cannot be such unlimited. As birds go to the sky according to their own strength, no one can cross its last end, similarly no man can be able to achieve the end of the object of learning.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is His nature is further taught in the 16th Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    (1) As the kine return to the pastures, in the same way, thoughts come back to e-soul, whose knowledge is of various kinds and who is the doer of deeds. (2) In the case of God the meaning is-Yearning for the Omniscient God my thoughts move onward unto Him as kine unto their pastures move.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (धीतयः ) दधत्यर्थान् याभिः कर्मवृत्तिभिः ताः (उरु चक्षसम् ) उरुष बहुषु चक्षः विज्ञानं प्रकाशनं बा यस्य तं कर्मकर्तारं जीवं माम् = To me-soul who has knowledge of various things. परमेश्वरपक्षे चक्षिङ्-व्यक्तायांवाचि दर्शनेऽपि विशाल चक्षसम् विश्वस्य द्रष्टारम् इत्यर्थः || = Omniscient God.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    There is Upamalankara or simile used in this Mantra -Men should know that as the kine running to the best of their power, become tired when they reach their destination, in the same way, when men search after the attributes according to their power and intellect of God, and of the sun etc. and having known to some extent according to their capacity, get tired because the intellect and the power of the body of every man in limited and can not be unlimited. As birds flying in the sky do not get its end, similarly none can get the end of knowledge.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top