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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 25/ मन्त्र 7
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - वरुणः छन्दः - निचृद्गायत्री स्वरः - षड्जः

    वेदा॒ यो वी॒नां प॒दम॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ताम्। वेद॑ ना॒वः स॑मु॒द्रियः॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वेद॑ । यः । वी॒नाम् । प॒दम् । अ॒न्तरि॑क्षेण । पत॑ताम् । वेद॑ । ना॒वः । स॒मु॒द्रियः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम्। वेद नावः समुद्रियः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वेद। यः। वीनाम्। पदम्। अन्तरिक्षेण। पतताम्। वेद। नावः। समुद्रियः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 25; मन्त्र » 7
    अष्टक » 1; अध्याय » 2; वर्ग » 17; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    एतद्यथावत्को वेदेत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः

    यः समुद्रियो मनुष्योऽन्तरिक्षेण पततां वीनां पदं वेद समुद्रे गच्छन्त्या नावश्च पदं वेद स शिल्पविद्यासिद्धिं कर्त्तुं शक्नोति नेतरः॥७॥

    पदार्थः

    (वेद) जानाति। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (यः) विद्वान् मनुष्यः (वीनाम्) विमानानां सर्वलोकानां पक्षिणां वा (पदम्) पदनीयं गन्तव्यमार्गम् (अन्तरिक्षेण) आकाशमार्गेण। अत्र अपवर्गे तृतीया। (अष्टा०२.३.६) इति तृतीया विभक्तिः। (पतताम्) गच्छताम् (वेद) जानाति (नावः) नौकायाः (समुद्रियः) समुद्रेऽन्तरिक्षे जलमये वा भवः। अत्र समुद्राभ्राद् घः। (अष्टा०४.४.११८) अनेन समुद्रशब्दाद् घः प्रत्ययः॥७॥

    भावार्थः

    या ईश्वरेण वेदेष्वन्तरिक्षभूसमुद्रेषु गमनाय यानानां विद्या उपदिष्टाः सन्ति ताः साधितुं यः पूर्णविद्याशिक्षाहस्तक्रियाकौशलेषु विचक्षण इच्छति स एवैतत्कार्यकरणे समर्थो भवतीति॥७॥

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    हिन्दी (5)

    विषय

    उक्त विद्या को यथावत् कौन जानता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    (यः) जो (समुद्रियः) समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष वा जलमय प्रसिद्ध समुद्र में अपने पुरुषार्थ से युक्त विद्वान् मनुष्य (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (पतताम्) जाने-आनेवाले (वीनाम्) विमान सब लोक वा पक्षियों के और समुद्र में जानेवाली (नावः) नौकाओं के (पदम्) रचन, चालन, ज्ञान और मार्ग को (वेद) जानता है, वह शिल्पविद्या की सिद्धि के करने को समर्थ हो सकता है, अन्य नहीं॥७॥

    भावार्थ

    जो ईश्वर ने वेदों में अन्तरिक्ष भू और समुद्र में जाने आनेवाले यानों की विद्या का उपदेश किया है, उन को सिद्ध करने को जो पूर्ण विद्या शिक्षा और हस्त क्रियाओं के कलाकौशल में कुशल मनुष्य होता है, वही बनाने में समर्थ हो सकता है॥७॥

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    विषय

    उक्त विद्या को यथावत् कौन जानता है, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    यः समुद्रियः मनुष्यः अन्तरिक्षेण पततां वीनां पदं वेद समुद्रे गच्छन्ति आ नावः च पदं वेद स शिल्पविद्यासिद्धिं कर्त्तुं शक्नोति न इतरः॥७॥

    पदार्थ

    (यः)=जो,  (विद्वान्)=विद्वान्, (मनुष्यः)=मनुष्य, (समुद्रियः) समुद्रेऽन्तरिक्षे जलमये वा भवः=समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष वा जलमय प्रसिद्ध समुद्र में, (अन्तरिक्षेण) आकाशमार्गेण=आकाश मार्ग से, (पतताम्) गच्छताम्=जानेवाले, (वीनाम्) विमानानां सर्वलोकानां पक्षिणां वा=विमानों के या सब लोक के पक्षियों के, (पदम्) पदनीयं गन्तव्यमार्गम्=गन्तव्य स्थान को जाने वाले मार्ग को, (वेद) जानाति=जानता है, (समुद्रे)=समुद्र में, (गच्छन्त्या)=जाने के लिए, (नावः) नौकायाः=नौकाओं के, (च)=और, (पदम्) पदनीयं गन्तव्यमार्गम्=गन्तव्य स्थान को जाने वाले मार्ग को, (वेद) जानाति=गन्तव्य स्थान को जाने वाले मार्ग को, (सः)=वह, (शिल्पविद्यासिद्धिम्)=शिल्प विद्या की सिद्धि को, (कर्त्तुम्)=करने के लिये, (शक्नोति)=सकते हैं, (न)=नहीं, (इतर)=दूसरे॥७॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    जो ईश्वर ने वेदों में अन्तरिक्ष और भूमि स्थित समुद्र में जाने-आनेवाले यानों की विद्या का उपदेश किया है, उन को सिद्ध करने को जो पूर्ण विद्या, शिक्षा हस्त क्रियाओंकी कुशलता में दक्ष इच्छा करता है, वही उस कार्य को करने में समर्थ होता है॥७॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    (यः) जो  (विद्वान्) विद्वान् (मनुष्यः) मनुष्य  (समुद्रियः) समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष या जलमय प्रसिद्ध समुद्र में (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (पतताम्) जानेवाले (वीनाम्) विमानों के या सब लोकों के पक्षियों के (पदम्) गन्तव्य स्थान को जाने वाले मार्ग को (वेद)  जानता है। जो (समुद्रे) समुद्र में (नावः) नौकाओं के द्वारा (गच्छन्त्या) जाने के लिए (च) और (पदम्) गन्तव्य स्थान को जाने वाले मार्ग को (वेद) जानते हैं। (सः) वे (शिल्पविद्यासिद्धिम्) शिल्प विद्या की सिद्धि (कर्त्तुम्) कर (शक्नोति) सकते हैं (इतर) दूसरे (न) नहीं॥७॥

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (वेद) जानाति। द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (यः) विद्वान् मनुष्यः (वीनाम्) विमानानां सर्वलोकानां पक्षिणां वा (पदम्) पदनीयं गन्तव्यमार्गम् (अन्तरिक्षेण) आकाशमार्गेण। अत्र अपवर्गे तृतीया। (अष्टा०२.३.६) इति तृतीया विभक्तिः। (पतताम्) गच्छताम् (वेद) जानाति (नावः) नौकायाः (समुद्रियः) समुद्रेऽन्तरिक्षे जलमये वा भवः। अत्र समुद्राभ्राद् घः। (अष्टा०४.४.११८) अनेन समुद्रशब्दाद् घः प्रत्ययः॥७॥
    विषयः- एतद्यथावत्को वेदेत्युपदिश्यते॥

    अन्वयः- यः समुद्रियो मनुष्योऽन्तरिक्षेण पततां वीनां पदं वेद समुद्रे गच्छन्त्या नावश्च पदं वेद स शिल्पविद्यासिद्धिं कर्त्तुं शक्नोति नेतरः॥७॥

    महर्षिकृतः(भावार्थः)- या ईश्वरेण वेदेष्वन्तरिक्षभूसमुद्रेषु गमनाय यानानां विद्या उपदिष्टाः सन्ति ताः साधितुं यः पूर्णविद्याशिक्षाहस्तक्रियाकौशलेषु विचक्षण इच्छति स एवैतत्कार्यकरणे समर्थो भवतीति॥७॥

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    विषय

    अन्तरिक्ष व समुद्र में भी

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के अनुसार हम उस प्रभु की ओर चलते हैं (यः) - जो कि (अन्तरिक्षेण पतताम्) - आकाशमार्ग से जाते हुए (वीनाम्) - पक्षियों के (पदम्) - गन्तव्य मार्ग को (वेद) - जानता है और 

    २. (समुद्रियः) - समुद्र में गति करनेवाली (नावः) - नौकाओं को भी (वेद) - जानता है , स्थल की बातों का तो कहना ही क्या! 

    ३. वे वरुण 'स्थल , जल व नभ' सबमें व्याप्त है । वस्तुतः सर्वव्यापक होने के कारण उनसे कुछ भी छिपा नहीं है । स्थान के दृष्टिकोण से वे प्रभु अनवच्छिन्न हैं , दिशाएँ उन्हें अविच्छिन्न नहीं कर सकती । 

    भावार्थ

    भावार्थ - जल , स्थल व अन्तरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त वे प्रभु सभी को जानते हैं । उस प्रभु से हम कुछ छिपा नहीं सकते । मन , वाणी और कर्म से पाप होने पर वह वरुण हमें जकड़ता ही है । आकाश में उड़कर या नाव में भागकर हम उस बन्धन से बच नहीं पाते । 

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    विषय

    राजा के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    ( यः ) जो परमेश्वर और राजा ( अन्तरिक्षे ) अन्तरिक्ष, आकाश मार्ग से ( पतताम् ) जाने वाले ( वीनां ) पक्षियों और विमानों के भी ( पदम् ) गन्तव्य मार्ग को ( वेद ) जानता है ( समुद्रियः ) समुद्र में चलने वाली ( नावः ) महान् आकाश में विद्यमान, बड़े २ सूर्य लोकों या समुद्रगामी नौकाओं, जहाज़ों को भी ( वेद ) जानता है वही परमेश्वर और राजा सेवनीय है ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुनःशेप आजीगर्तिऋषिः॥ वरुणो देवता ॥ गायत्र्य: । एकविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    मन्त्रार्थ

    (यः-वीनाम् अन्तरिक्षेण पततां पदं वेद) जो आकाश में से गमन करते हुए सूर्य चन्द्र मङ्गल बुध आदि गतिशील पिण्डों के गमन योग्य स्थान मार्ग को जानता है (समुद्रियः-नाव:-वेद) समुद्र में होने वाली नावों-नाव सदृश प्राणियों मछली आदियों को जानता है वह सर्वज्ञाता सर्वाधिकर्ता वरुण परमात्मा है। तथा (यः-अन्तरिक्षेण पततां वीनां पदं वेद) जो श्राकाश में से उडान करते हुए पक्षी समान विमानों के स्वरूप को जानता है (समुद्रिय:-नाव:-वेद) और समुद्र में चलने वाली नौकाओं को जानता है अधिकार किये हुए है वह क्षत्र श्री- राष्ट्रपति हुआ करता है । तथा (यः-अन्तरिक्षेण पततां वीनां पदं वेद) जो आकाश में उड़ते हुए पक्षियों के स्वरूप को जानता है वह (समुद्रिय:-नाव:-वेद) समुद्र अन्तरिक्ष सम्बन्धी "समुद्रम्अन्तरिक्षम्" [निघ० १।३] नाना विमानों-आकाशयानों हवाई जहाजों के स्वरूप को जानता है वह ऐसा शिल्पी-मनीषी वरण करने योग्य है ॥७॥

    विशेष

    ऋषिः-आजीगर्तः शुनः शेपः (इन्द्रियभोगों की दौड में शरीरगर्त में गिरा हुआ विषयलोलुप महानुभाव) देवता-वरुणः (वरने योग्य और वरने वाला परमात्मा)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्या ईश्वराने वेदामध्ये अंतरिक्ष, भूमी व समुद्रात जाणाऱ्या येणाऱ्या यानांच्या विद्येचा उपदेश केलेला आहे, ती सिद्ध करण्यासाठी पूर्ण विद्येचे शिक्षण घेतलेला व हस्तक्रियांच्या कलाकौशल्यात कुशल माणूसच ते बनविण्यास समर्थ असतो. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    The specialist of the sea and the sky is the man who knows the science and paths of the birds and planes flying across the skies, and he knows the science and routes of the ships sailing across the seas.

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    Subject of the mantra

    Who knows aforesaid knowledge precisely, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yaḥ)=That, (vidvān)=scholarly, (manuṣyaḥ)=man, (samudriyaḥ)=in the ocean, in other words, in the space or watery famous ocean, (antarikṣeṇa)=by the space way, (patatām)=going, (vīnām)=of the aircrafts or of the birds of all worlds, (padam)=to the destination going road, (veda) =knows, [jo]=those, (samudre)=in the ocean, (nāvaḥ)=by the boats, (gacchantyā)=for going, (ca)=and, (padam) =to the destination going road, (veda)=know, (saḥ)=they, (śilpavidyāsiddhim)=accomplishment of the craftsmanship, (karttum)=do, (śaknoti)=can, (itara)=others, (na)=not.

    English Translation (K.K.V.)

    The learned man, who knows the way to the ocean, i.e. space or the well-known ocean of water to the planes going from the sky or the birds of all the worlds to their destination. Those, who know the way to go by boats in the ocean and the way to the destination. They can achieve the perfection of craft education, not others.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    The one who aspires to accomplish what God has preached in the Vedas, the knowledge of vehicles going to and from the seas located in the space and land, he is capable of doing that work.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    Who knows it fully is taught in the 7th Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    The person dwelling on sea shore, who knows the path of the birds and aero planes flying through the air, who also knows the course of ships, can accomplish artistic activities and none else.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (वीनाम्) विमानानां सर्वलोकानां पक्षिणां वा । = Of the aero planes, all worlds and birds. (पदम् ) पदनीयं गन्तव्यमार्गम् । = Path. समुद्राभ्राद् घ० ( अष्टा० ४.४.११८) अनेन समुद्रशब्दाद् घः प्रत्ययः ॥ (पतताम् ) गच्छताम् = going or flying.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The person who is thoroughly well-versed in sciences, arts and industries is able to understand fully and give practical shape to the science of the vehicles that can be useful equally in firmament, earth and ocean as taught a by God through the Vedas.

    Translator's Notes

    The word वयः is derived from वी-गति-व्याप्ति प्रजनकान्त्यसनखादनेषु सर्वधातुभ्योऽसुन् (उणा० ४.१८९) वेति गच्छतीति वयः = That which goes or moves, hence birds, moving birds and aero planes all can be equally called वयांसि पत्लृ-गतौं hence पतताम् of going or flying.

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