ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 11
ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
देवता - अग्निः
छन्दः - विराड्गायत्री
स्वरः - षड्जः
शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ ज्येष्ठो॒ यो दमे॒ष्वा । दी॒दाय॑ दीर्घ॒श्रुत्त॑मः ॥
स्वर सहित पद पाठशी॒रम् । पा॒व॒कऽशो॑चिषम् । ज्येष्ठः॑ । यः । दमे॑षु । आ । दी॒दाय॑ । दी॒र्घ॒श्रुत्ऽत॑मः ॥
स्वर रहित मन्त्र
शीरं पावकशोचिषं ज्येष्ठो यो दमेष्वा । दीदाय दीर्घश्रुत्तमः ॥
स्वर रहित पद पाठशीरम् । पावकऽशोचिषम् । ज्येष्ठः । यः । दमेषु । आ । दीदाय । दीर्घश्रुत्ऽतमः ॥ ८.१०२.११
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 11
अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 11; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 11; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Adore Agni, omnipresent, pure, fiery and purifying. Agni is the highest divine, most famous, and shines in us and illuminates our homes.
मराठी (1)
भावार्थ
भौतिक अग्नी भौतिक मलाला भस्म करतो. भौतिक पदार्थ सुवर्ण इत्यादी धातूंना शुद्ध करतो. सर्वव्यापक, ज्ञानस्वरूप कर्मप्रेरक परमेश्वराचे बलच आम्हा उपासकात व्याप्त आहे. आम्ही त्या सर्व शक्तिमानाच्या संगतीत निश्चितपणे निर्दोष होऊ शकतो. ॥११॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यः) जो प्रभु (शीरम्) सर्वत्र व्याप्त है; (पावकशोचिषम्) जो अपनी सन्निधि के द्वारा अग्नि के तुल्य दोषों का दाहक है; (ज्येष्ठः) सर्व देवों में श्रेष्ठ है; (दीर्घश्रुत्तमः) दीर्घकाल से नितान्त प्रसिद्ध है; वह (दमेषु) हमारे शरीररूपी घरों में (आ, दीदाय) सर्वतः प्रकाशित हो॥११॥
भावार्थ
भौतिक अग्नि भौतिक मल भस्म कर सुवर्ण आदि धातुओं को शुद्ध कर देता है; सर्वव्यापक ज्ञानस्वरूप, कर्मप्रेरक प्रभु का बल ही हम उपासकों में व्याप्त है; हम उस सर्वशक्तिमान् की संगति में निश्चय ही निर्दोष रह सकते हैं॥११॥
विषय
उसकी स्तुति, सर्वरक्षक, सर्वकर्त्ता शिल्पी के तुल्य प्रभु।
भावार्थ
( यः ) जो ( दीर्घश्रुत्-तमः ) दीर्घ काल तक गुरु-मुखों से खूब श्रवण करने योग्य, ( ज्येष्ठः ) सबसे बड़ा, प्रशंसनीय, (दमेषु) सब घरों में दीपक के समान, (आ दीदाय) सर्वत्र प्रकाशमान है, सब भुवनों में प्रकाश करता है, उस ( शीरं ) सर्वव्यापक (पावक-शोचिषं) अग्नि के समान पवित्रकारक ज्योति वाले प्रभु की यज्ञादि में स्तुति कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
ज्येष्ठः-दीर्घश्रुत्तमः
पदार्थ
[१] (यः) = जो (दीर्घश्रुत्तमः) = अतिशयेन विद्वान् सर्वज्ञ (ज्येष्ठः) = सर्वश्रेष्ठ प्रभु हैं वे (दमेषु) = यज्ञशील पुरुषों के गृहों में (आदीदाय) = दीप्त होते हैं। [२] उन (शीरम्) = सर्वत्र अनुशायी [व्यापक] (पावकशोचिषम्) = पवित्र दीप्तिवाले प्रभु को स्तुत करो।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु सर्वज्ञ, सर्वश्रेष्ठ हैं, यज्ञशील पुरुषों के गृहों में दीप्त होते हैं। उन सर्वव्यापक पवित्र दीप्तिवाले प्रभु का हम स्तवन करें।
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