ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 9
ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
देवता - अग्निः
छन्दः - निचृद्गायत्री
स्वरः - षड्जः
अ॒यं विश्वा॑ अ॒भि श्रियो॒ऽग्निर्दे॒वेषु॑ पत्यते । आ वाजै॒रुप॑ नो गमत् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒यम् । विश्वाः॑ । अ॒भि । श्रियः॑ । अ॒ग्निः । दे॒वेषु॑ । प॒त्य॒ते॒ । आ । वाजैः॑ । उप॑ । नः॒ । ग॒म॒त् ॥
स्वर रहित मन्त्र
अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते । आ वाजैरुप नो गमत् ॥
स्वर रहित पद पाठअयम् । विश्वाः । अभि । श्रियः । अग्निः । देवेषु । पत्यते । आ । वाजैः । उप । नः । गमत् ॥ ८.१०२.९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 9
अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 10; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 10; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
This Agni among all the divinities of nature and humanity creates, sustains and rules over all the beauties, graces and grandeurs of life. May the lord come to us and bless us with all kinds of knowledge, power, wealth and honour.
मराठी (1)
भावार्थ
सर्व दिव्य पदार्थांमध्ये परमेश्वरच सर्वात अधिक श्रीसंपन्न आहे. तो सर्व देवांचा अधिदेव आहे. आम्ही त्या देवाधिदेवाला आपल्या अंत:करणात प्रदीप्त करावे. ॥९॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(अयम् अग्निः) यह ज्ञानस्वरूप अग्रणी (देवेषु) दिव्य पदार्थों के तुल्य (विश्वा) सभी (श्रियः) शोभाओं को (अभि, पत्यते) प्राप्त होता है; वह प्रभु (वाजैः) सर्व प्रकार के ऐश्वर्यों के साथ (नः उप आगमत्) हमें प्राप्त हो॥९॥
भावार्थ
सकल दिव्य पदार्थों में प्रभु ही सर्वाधिक श्रीसम्पन्न है; वह अधिदेव है। हम उस देवाधिदेव को अपने अन्तःकरण में बसाएं॥९॥
विषय
उसकी स्तुति, सर्वरक्षक, सर्वकर्त्ता शिल्पी के तुल्य प्रभु।
भावार्थ
( अयं ) यह (अग्निः ) अग्रि जिस प्रकार ( देवेषु ) सब भूतों के बीच में ( श्रियः अभि पत्यते ) समस्त शोभाओं, कान्तियों को धारण करता है उसी प्रकार यह ( अग्निः ) ज्ञानी, नायक, स्वामी, प्रभु विश्वाः श्रियः ) समस्त आश्रय लेने वालों का ( अभि पत्यते ) साक्षात् पालक होता है, और ( देवेषु ) सब दिव्य पदार्थों वा दाताओं में भी अन्नों, सबसे अधिक ऐश्वर्यवान् होता है। वह ( वाजैः ) बलों, ज्ञानों, और ऐश्वर्यो सहित ( उप गमत् ) हमें प्राप्त हो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
देवों में श्री, मनुष्यों में बल
पदार्थ
[१] (अयं अग्निः) = यह अग्रेणी प्रभु देवेषु देवों के अन्दर होनेवाली (विश्वाः श्रियः) = सब लक्ष्मियों व शोभाओं के (अभिपत्यते) = ईश हैं, उन देवों में उस-उस श्री को प्राप्त करानेवाले ये प्रभु ही हैं । [२] ये 'अग्नि' प्रभु (नः) = हमें भी (वाजैः) = शक्तियों के साथ (उपगमत्) = प्राप्त हों। हमें भी अग्नि के अनुग्रह से बल की प्राप्ति हो ।
भावार्थ
भावार्थ-वे अग्रेणी प्रभु सूर्य आदि सब देवों में उस-उस श्री को स्थापित करते हैं। प्रभु हमारे अन्दर भी बल की स्थापना करें।
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