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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 102 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 16
    ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    अग्ने॑ घृ॒तस्य॑ धी॒तिभि॑स्तेपा॒नो दे॑व शो॒चिषा॑ । आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अग्ने॑ । घृ॒तस्य॑ । धी॒तिऽभिः॑ । ते॒पा॒नः । दे॒व॒ । शो॒चिषा॑ । आ । दे॒वान् । व॒क्षि॒ । यक्षि॑ । च॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्ने घृतस्य धीतिभिस्तेपानो देव शोचिषा । आ देवान्वक्षि यक्षि च ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने । घृतस्य । धीतिऽभिः । तेपानः । देव । शोचिषा । आ । देवान् । वक्षि । यक्षि । च ॥ ८.१०२.१६

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 16
    अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 12; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, light of life, brilliant and generous divinity, burning and shining by the flames of fire fed on ghrta, O enlightened scholars and divines, shining by the light of knowledge fed by your own awareness, bring in the divinities of nature and humanity to the vedi and carry on the yajna.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    वारंवार पदार्थ बोध करून, दिव्य गुणांना धारण करून व उपदेश करून विद्वान दुसऱ्यांना ते प्रदान करण्यायोग्य बनतात. ॥१६॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    हे (अग्ने) विद्वज्जन! (देव) दिव्यगुण धारण करने के इच्छुक! साधक! (घृतस्य) विद्या के प्रदीप्त बोध को (धीतिभिः) अनेक बार मनन कर (शोचिषा) पावन विज्ञान से (तेपानः) तपता हुआ तू (देवान्) दिव्यगुणों को (अवक्षि) प्राप्त कर (च) और (यक्षि) उनका दूसरों से संगम करा॥१६॥

    भावार्थ

    बार-बार पदार्थ बोध का मनन करने से विद्वान् दिव्य गुणों को धार कर तथा उपदेश द्वारा उन्हें दूसरों को प्रदान करने में समर्थ होता है॥१६॥

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    विषय

    सर्व प्रकाशक, परम सुखदायक प्रभु की स्तुति भक्ति और उपासना।

    भावार्थ

    जिस प्रकार सूर्य ( घृतस्य धीतिभिः ) तेज की धारण शक्तियें ( देवान् ) किरणों को धारण करता और ( तेपानः ) तपता है और जिस प्रकार घृत की आहुतियों से अग्नि (देवान्) सुगन्ध दान आदि गुणों को धारण करता है उसी प्रकार हे ( अग्ने ) तेजस्विन् ! हे ( देव ) ज्ञान आदि के दातः ! ( तेपानः ) तप करता हुआ तू ( शोचिषा ) तेज से ( घृतस्य धीतिभिः ) ज्ञान की वाणियों द्वारा ( देवान् ) ज्ञान के इच्छुक शिष्य जनों के प्रति ( आ वक्षि ) ज्ञान करा प्रवचन कर और ( यक्षि च ) उनको ज्ञान का दान दे, उनसे सत्संग कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥

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    विषय

    घृतस्य धीतिभिः - शोचिषा

    पदार्थ

    [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी देव हमारे जीवनों को ज्ञान से द्योतित करनेवाले प्रभो ! [देवो द्योतनात्] (घृतस्य) = ज्ञानदीप्तियों के (धीतिभिः) = धारणों से विविध विज्ञानों को प्राप्त कराने के द्वारा तथा (शोचिषा) = अन्त: प्रकाश के द्वारा, पूर्ण निर्मल हृदय की दीप्ति के द्वारा [चमक के द्वारा ] (तेपान:) = हमारे जीवनों को दीप्त करते हुए आप (देवान् आवक्षि) = हमारे जीवनों में दिव्य गुणों को प्राप्त कराइये (च) = और (यक्षि) = उनके साथ ही हमारा सम्बन्ध करिये।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु हमें विज्ञानों के धारण व अन्त: प्रकाश से दीप्त जीवनवाला बनाते हुए दिव्य गुणों को प्राप्त करायें, दिव्य गुणों से ही हमारा सम्बन्ध करें।

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