ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 102/ मन्त्र 17
ऋषिः - प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
देवता - अग्निः
छन्दः - विराड्गायत्री
स्वरः - षड्जः
तं त्वा॑जनन्त मा॒तर॑: क॒विं दे॒वासो॑ अङ्गिरः । ह॒व्य॒वाह॒मम॑र्त्यम् ॥
स्वर सहित पद पाठतम् । त्वा॒ । अ॒ज॒न॒न्त॒ । मा॒तरः॑ । क॒विम् । दे॒वासः॑ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । अम॑र्त्यम् ॥
स्वर रहित मन्त्र
तं त्वाजनन्त मातर: कविं देवासो अङ्गिरः । हव्यवाहममर्त्यम् ॥
स्वर रहित पद पाठतम् । त्वा । अजनन्त । मातरः । कविम् । देवासः । अङ्गिरः । हव्यऽवाहम् । अमर्त्यम् ॥ ८.१०२.१७
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 102; मन्त्र » 17
अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
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अष्टक » 6; अध्याय » 7; वर्ग » 12; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
Angira, omniscient Agni, immortal power, enlightened leading yajaka, divinities like mothers manifest you, create you, reveal you, visionary poet and maker of poetic beauties, carrier and harbinger of yajnic wealths of fragrances.
मराठी (1)
भावार्थ
दिव्य गुणी माणूस विद्वानांच्या संगतीत राहून विद्वानाकडून गुण ग्रहण करणे व इतरांना देणे इत्यादी शिकतो व कीर्तिमान बनतो. ॥१७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
हे (अङ्गिरः) विद्वन्! (तम्) उस पूर्वोक्त प्रकार से साधना करते हुए (त्वा) तुझे (मातरः) माता के समान स्नेह से निर्माण करनेवाले (देवासः) दिव्यगुणी विद्वान् (कविम्) क्रान्तदर्शी, (हव्यवाहम्) दानाऽऽदान करने योग्य, (अमर्त्यम्) कीर्ति से मरणधर्मरहित के रूप में (अजनन्त) प्रकटते हैं॥१७॥
भावार्थ
दिव्यगुणी जनों की संगति में रहकर विद्वान् गुणग्रहण करना तथा गुणों को दूसरों को देना आदि गुण सीखता है और इस भाँति उसकी कीर्ति अमरता पा जाती है॥१७॥
विषय
सर्व प्रकाशक, परम सुखदायक प्रभु की स्तुति भक्ति और उपासना।
भावार्थ
( तं त्वा ) उस तुझ को ( मातरः देवासः ) विद्वान् जन माता के तुल्य ( कविं अजनन्त ) कविवत् क्रान्तदर्शी रूप से प्रकट करते हैं। और (हव्यवाह) ग्राह्य ज्ञान-वचनों को धारण करने वाले (अमर्त्यम्) अमरणशील तुझ को वे ( मातरः अजनन्त ) माता के समान उत्पन्न करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रयोगो भार्गवोऽग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः। अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ। तयोर्वान्यतर ऋषिः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः—१, ३—५, ८, ९, १४, १५, २०—२२ निचृद् गायत्री। २, ६, १२, १३, १६ गायत्री। ७, ११, १७, १९ विराड् गायत्री। १०, १८ पादनिचृद् गायत्री॥
विषय
मातरः-देवासः
पदार्थ
[१] हे (अंगिरः) = हमारे अंग-प्रत्यंग में रस का संचार करनेवाले अथवा हमें गति देनेवाले प्रभो ! (तं त्वा) = उन आपको (मातरः) = अपने अन्दर ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले [प्रमातारः] अथवा निर्माणात्मक कार्यों में प्रवृत्त होनेवाले लोग (अजनन्त) = अपने अन्दर प्रादुर्भूत करते हैं। प्रभु का प्रकाश इन निर्माताओं को ही प्राप्त होता है। [२] (देवासः) = देववृत्ति के लोग ही (कविम्) = उस क्रान्तदर्शी सर्वज्ञ प्रभु को, (हव्यवाहम्) = हव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले प्रभु को, (अमर्त्यम्) = अविनाशी प्रभु को अपने अन्दर प्रादुर्भूत करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु का दर्शन निर्मणात्मक कार्यों में प्रवृत्त देववृत्ति के लोगों को होता है।
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