यजुर्वेद - अध्याय 9/ मन्त्र 23
ऋषिः - वसिष्ठ ऋषिः
देवता - प्रजापतिर्देवता
छन्दः - स्वराट त्रिष्टुप्,
स्वरः - धैवतः
160
वाज॑स्ये॒मं प्र॑स॒वः सु॑षु॒वेऽग्रे॒ सोम॒ꣳ राजा॑न॒मोष॑धीष्व॒प्सु। ताऽअ॒स्मभ्यं॒ मधु॑मतीर्भवन्तु व॒यꣳ रा॒ष्ट्रे जा॑गृयाम पु॒रोहि॑ताः॒ स्वाहा॑॥२३॥
स्वर सहित पद पाठवाज॑स्यः। इ॒मम्। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। सु॒षु॒वे। सु॒सु॒व॒ इति सुसुवे। अग्रे॑। सोम॑म्। राजा॑नम्। ओष॑धीषु। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। ताः। अ॒स्मभ्य॑म्। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। भ॒व॒न्तु॒। व॒यम्। रा॒ष्ट्रे। जा॒गृ॒या॒म॒। पु॒रोहि॑ता॒ इति॑ पु॒रःऽहि॑ताः। स्वाहा॑ ॥२३॥
स्वर रहित मन्त्र
वाजस्येमम्प्रसवः सुषुवे ग्रे सोमँ राजानमोषधीष्वप्सु । ताऽअस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु वयँ राष्टे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा ॥
स्वर रहित पद पाठ
वाजस्यः। इमम्। प्रसव इति प्रऽसवः। सुषुवे। सुसुव इति सुसुवे। अग्रे। सोमम्। राजानम्। ओषधीषु। अप्स्वित्यप्ऽसु। ताः। अस्मभ्यम्। मधुमतीरिति मधुऽमतीः। भवन्तु। वयम्। राष्ट्रे। जागृयाम। पुरोहिता इति पुरःऽहिताः। स्वाहा॥२३॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
पुनस्तैरत्र कथं भवितव्यमित्याह॥
अन्वयः
हे मनुष्याः! यथाऽहमग्रे प्रसवः सन् वाजस्येमं सोमं राजानं सुषुवे, यथा तद्रक्षणेन या ओषधीष्वप्स्वोषधयः सन्ति, ताः अस्मभ्यं मधुमतीर्भवन्तु। यथा स्वाहा पुरोहिता वयं राष्ट्रे सततं तथा यूयमपि वर्त्तध्वम्॥२३॥
पदार्थः
(वाजस्य) बोधस्य सकाशात् (इमम्) (प्रसवः) ऐश्वर्य्ययुक्तः (सुषुवे) प्रसुव उत्पादये (अग्रे) पूर्वम् (सोमम्) सोममिव सर्वदुःखप्रणाशकं (राजानम्) विद्यान्यायविनयैः प्रकाशमानं स्वामिनम् (ओषधीषु) पृथिवीस्थासु यवादिषु (अप्सु) जलेषु वर्त्तमानाः (ताः) (अस्मभ्यम्) (मधुमतीः) प्रशस्ता मधवो मधुरादयो गुणा विद्यन्ते यासु ताः (भवन्तु) (वयम्) अमात्यादयो भृत्याः (राष्ट्रे) राज्ये (जागृयाम) सचेतना अनलसाः सन्तो वर्त्तेमहि (पुरोहिताः) सर्वेषां हितकारिणः (स्वाहा) सत्यया क्रियया सह॥ अयं मन्त्रः (शत॰५। २। २। ५) व्याख्यातः॥२३॥
भावार्थः
शिष्टा मनुष्याः सर्वविद्याचातुर्य्यारोग्यसहितं सोम्यादिगुणालङ्कृतं राजानं संस्थाप्य तद्रक्षको वैद्य एवं प्रवर्त्तेत, यथाऽस्य शरीरे बुद्धावात्मनि च रोगावेशो न स्यात्। इत्थमेव राजवैद्यौ सर्वानमात्यादीन् भृत्यानरोगान् सम्पादयेताम्। यत एतेराज्यस्थसज्जनपालने दुष्टताडने सदा प्रयतेरन्, राजा प्रजा च पिता पुत्रवत् सदा वर्त्तेयाताम्॥२३॥
विषयः
पुनस्तैरत्र कथं भवितव्यमित्याह ।।
सपदार्थान्वयः
हे मनुष्याः ! यथाहमग्रे पूर्वंप्रसवः ऐश्वर्य्ययुक्तः सन् वाजस्य बोधस्य सकाशात् इमं सोमं सोममिव सर्वदुःखप्रणाशकं राजानं विद्यान्यायविनयैः प्रकाशमानं स्वामिनंसुषुवे प्रसुवे=उत्पादये-- यथा तद्रक्षणेन या ओषधीषु पृथिवीस्थासु यवादिषुअप्सु जलेषु वर्त्तमानाः ओषधयः सन्ति, ता अस्मभ्यं मधुमती: प्रशस्ता मधवः=मधुरादयो गुणा विद्यन्ते यासु ताः भवन्तु-- यथा स्वाहा सत्यया क्रियया सह पुरोहिताः सर्वेषां हितकारिणः वयम् अमात्यादयोभृत्याः राष्ट्रे राज्ये सततं जागृयाम सचेतना:=अनलसाः सन्तो वर्तेमहि, तथा यूयमपि वर्त्तध्वम् ॥ ९ । २३ ॥ [हे मनुष्या:! यथाहमग्रे.........इमं सोमं राजानं सुषुवे, यथा तद्रक्षणेन या..........ओषधयः सन्तिता अस्मस्यं मधुमतीर्भवन्तु]
पदार्थः
(वाजस्य) बोधस्य सकाशात् (इमम्) (प्रसवः) ऐश्वर्ययुक्तः (सुषुवे) प्रसुव=उत्पादये (अग्रे) पूर्वम् (सोमम्) सोममिव सर्वदुःखप्रणाशकं (राजानम्) विद्यान्यायविनयैः प्रकाशमानं स्वामिनम् (औषधीषु) पृथिवीस्थासु यवादिषु (अप्सु) जलेषु वर्त्तमानाः (ताः) (अस्मभ्यम्) (मधुमतीः) प्रशस्ता मधवो=मधुरादयो गुणा विद्यन्ते यासु ता: (भवन्तु) (वयम्) अमात्यादयो भृत्याः (राष्ट्रे) राज्ये (जागृयाम्) सचेतना=अनलसाः सन्तो वर्त्तेमहि (पुरोहिताः) सर्वेषां हितकारिणः (स्वाहा) सत्यया क्रियया सह ॥अयं मन्त्रः शत० ५ । २ । २ । ५ व्याख्यातः ॥ २३ ॥
भावार्थः
शिष्टा मनुष्याः सर्वविद्याचातुर्य्यारोग्यसहितं सौम्यादिगुणालंकृतं राजानं संस्थापयेयुः, तद्रक्षको वैद्य एवं प्रवर्त्तेत यथाऽस्य शरीरे बुद्धावात्मनि च रोगावेशो न स्यात् । [यथा.........पुरोहिता वयं राष्ट्रे सततं जागृयाम तथा यूयमपि वर्त्तध्वम्] इत्यमेव राजवैद्यो सर्वानमात्यादीन् भृत्यानरोगान् संपादयेताम्, यत एते राज्यस्य सज्जनपालने दुष्टताडने सदा प्रयतेरन् । राजा प्रजा च पितापुत्रवत् सदा वर्तेयाताम् ॥९ । २३ ।।
भावार्थ पदार्थः
सोमम्=सौम्यादिगुणालङ्कृतम् । सुषुवे=संस्थापये ॥
विशेषः
वसिष्ठः । प्रजापतिः=राजा । स्वराट् त्रिष्टुप् । धैवतः।।
हिन्दी (4)
विषय
फिर उन को इस विषय में कैसा होना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे मनुष्य लोगो! जैसे मैं (अग्रे) प्रथम (प्रसवः) ऐश्वर्य्ययुक्त होकर (वाजस्य) वैद्यकशास्त्र बोधसम्बन्धी (इमम्) इस (सोमम्) चन्द्रमा के समान सब दुःखों के नाश करनेहारे (राजानम्) विद्या न्याय और विनयों से प्रकाशमान राजा को (सुषुवे) ऐश्वर्य्ययुक्त करता हूं, जैसे उसकी रक्षा में (ओषधीषु) पृथिवी पर उत्पन्न होने वाली यव आदि ओषधियों और (अप्सु) जलों के बीच में वर्त्तमान ओषधी हैं, (ताः) वे (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (मधुमतीः) प्रशस्त मधुर वाणी वाली (भवन्तु) हों, जैसे (स्वाहा) सत्य क्रिया के साथ (पुरोहिताः) सब के हितकारी हम लोग (राष्ट्रे) राज्य में निरन्तर (जागृयाम) आलस्य छोड़ के जागते रहें, वैसे तुम भी वर्ता करो॥२३॥
भावार्थ
शिष्ट मनुष्यों की योग्य है कि सब विद्याओं को चतुराई, रोगरहित और सुन्दर गुणों में शोभायमान पुरुष को राज्यधिकार देकर, उसकी रक्षा करने वाला वैद्य ऐसा प्रयत्न करे कि जिससे इसके शरीर बुद्धि और आत्मा में रोग का आवेश न हो। इसी प्रकार राजा और वैद्य दोनों सब मन्त्री आदि भृत्यों और प्रजाजनों को रोगरहित करें। जिससे ये राज्य के सज्जनों के पालने और दुष्टों के ताड़ने में प्रयत्न करते रहें, राजा और प्रजा के पुरुष परस्पर पिता पुत्र के समान सदा वर्त्तें॥२३॥
विषय
राष्ट्र-पुरोहित
पदार्थ
१. ( इमं सोमं राजानम् ) = इस सौम्य गुणयुक्त अथवा सोमशक्ति-सम्पन्न राजा को, ( अग्रे ) = सबसे प्रथम ( ओषधीषु अप्सु ) = ओषधियों व जलों का ही खान-पान करने पर, अर्थात् भोजन में मद्य-मांसादि का प्रवेश न होने पर, ( वाजस्य ) = शक्ति व ज्ञान का ( प्रसवः ) = उत्पादन ( सुषुवे ) = ऐश्वर्ययुक्त करता है, अर्थात् सात्त्विक भोजन से सौम्यता बनी रहती है और शक्ति व ज्ञान में वृद्धि होती है।
२. ( ताः ) = वे ओषधियाँ व जल ( अस्मभ्यम् ) = हमारे लिए ( मधुमतीः ) = माधुर्यवाली ( भवन्तु ) = हों, अर्थात् इन ओषधियों व जलों के खान-पान से हमारे मनों और व्यवहार में माधुर्य हो।
३. ( वयं पुरोहिताः ) = हम पुरोहित ( राष्ट्रे ) = राष्ट्र में ( जागृयाम ) = सदा जागरूक रहें। ज्ञान-प्रकाश फैलाने का कार्य इनपर ही निर्भर है। ये सो जाएँ, तो राष्ट्र में अन्धकार-ही-अन्धकार हो जाए। एवं, ये राष्ट्र-पुरोहित वानस्पतिक भोजन करनेवाले हों, इनके व्यवहार में अत्यन्त माधुर्य हो, इनके प्रभाव से राजा व प्रजा के जीवन में भी मद्य- मांसादि का प्रवेश न हो और राजा को शक्ति व ज्ञान का ऐश्वर्य प्राप्त हो।
५. ( स्वाहा ) = इस कार्य के लिए पुरोहित स्वार्थ के त्यागवाले हों।
भावार्थ
भावार्थ — हम वानस्पतिक भोजन को ही अपनाते हुए शक्ति व ज्ञान के ऐश्वर्य का सम्पादन करनेवाले हों। हमारा व्यवहार अत्यन्त मिठास को लिये हुए हो। मांसाहार मनोवृत्ति को क्रूर बनाता है।
विषय
प्रजा की सम्पन्नता और शासकों को अप्रमाद की उपदेश ।
भावार्थ
( वाजस्य प्रसवः ) संग्राम और वीर्य का ऐश्वर्य या समृद्धि ही ( अग्रे ) सबसे प्रथम ( औषधीषु सोमम् ) औषधियों में जिस प्रकार सोम सर्वश्रेष्ट सबसे अधिक वीर्यवान् है उसी प्रकार ( अशु ) प्रजाओं में ( इमं राजा ) इस सर्वोपरि राजमान सम्राट् को ( सुषुवे ) उत्पन्न करता है । ( ताः ) वे औषधिय ( अस्मभ्यम् ) हमारे लिये ( मधुमती: ) अन्न आदि मधुर पदार्थों से सम्पन्न हों और वे प्रजाएं भी अन्न आदि ऐश्वर्य से युक्त हों और जल भी मधुरगुण से युक्त हों। ( वयम् ) हम अमात्य आदि राष्ट्र के पालक पुरुष ( राष्ट्रे ) राष्ट्र में, सब कार्यों में ( पुरोहिताः ) अग्रसर होकर, मुख्य पद पर विराजकर राष्ट्र में ( स्वाहा ) उत्तम शासन व्यवस्था सहित ( जागृयाम ) सदा जागते रहें, सदा सावधान होकर शासन करें । शत० ५ । २ । २ । ५ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
प्रजापतिर्देवता। स्वराट् त्रिष्टुप् । धैवतः ॥
विषय
फिर मनुष्यों को इस विषय में कैसा होना चाहिये, यह उपदेश किया है ॥
भाषार्थ
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (अग्रे) पहले (प्रसवः) ऐश्वर्य से युक्त होकर (वाजस्य) ज्ञान से इस (सोमम्) सोम के समान सब दुःखों के नाशक (राजानम्) विद्या, न्याय और विनय से प्रकाशमान राजा को (सुषुवे) उत्पन्न करता हूँ-- जैसेउसकी रक्षा से जो (औषधीषु) पृथिवीस्थ यव [जौ] आदि औषधियों में एवं (अप्सु) जलों में वर्तमान औषधियाँ हैं वे हमारे लिये (मधुमती:) प्रशस्त मधुर आदि गुणों से युक्त (भवन्तु) हों-- जैसे(स्वाहा) सत्याचरण से (पुरोहिताः) सबके हितकारी (वयम्) हम मन्त्री आदि सेवक लोग (राष्ट्रे) राज्य में सदा (जागृयाम) पुरुषार्थी होकर वर्ताव कर, वैसे तुम प्रजा जन भी वर्ताव किया करो ॥ ९। २३ ॥
भावार्थ
शिष्ट जन सब विद्याओं में चतुर,आरोग्यवान्, सौम्यता आदि गुणों से अलंकृत पुरुष को राजा बनावें और उसका रक्षक वैद्य ऐसा यत्न करे कि जिससे राजा के शरीर, बुद्धि और आत्मा में कोई रोग प्रवेश न कर सके। इसी प्रकार राजा और वैद्य दोनों अपने सब मन्त्रियों तथा भृत्यों को निरोग करें, जिससे ये लोग राज्य के सज्जनों का पालन और दुष्टों के ताड़न में सदा प्रयत्नशील रहें। राजा और प्रजा सदा पिता पुत्र के समान वर्ताव करें ॥ ९। २३ ॥
प्रमाणार्थ
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । २ । २ । ५) में की गई है ॥९ । २३ ॥
भाष्यसार
मनुष्य कैसे हों--शिष्टजनों का कर्तव्य है कि वे प्रथम ऐश्वर्य-सम्पन्न हों तथा अपने ज्ञान से सब विद्याओं में चतुर, आरोग्यवान्, सोम के समान सब दुःखों के नाशक एवं सोम्यता आदि गुणों से अलङ्कृत, विद्या, न्याय, विनय आदि गुणों से प्रकाशमान पुरुष को राजा बनावें। उसकी रक्षा में एक वैद्य को नियुक्त करें जो पृथिवीस्थ और जलस्थ औषधियों का ज्ञाता हो। वह प्रशस्त मधुर आदि गुणों से युक्त औषधियों से ऐसा प्रयत्न करे कि जिससे राजा के शरीर, बुद्धि और आत्मा में कोई रोग प्रवेश न कर सके। राजा और वैद्य मिलकर ऐसा प्रयत्न करें कि जिससे सबके हितकारी मन्त्री आदि राजा के सेवक लोग सदा नीरोग रहें। जिससे वे सदा आलस्य रहित (पुरुषार्थी) होकर सज्जनों का पालन और दुष्टों का ताड़न करते रहें। राजा और प्रजा परस्पर पिता-पुत्र के समान वर्ताव करें ॥ ९। २३॥
मराठी (2)
भावार्थ
सभ्य माणसांनी सर्व विद्यांमध्ये चतुर रोगरहित सुंदर गुणांनी युक्त अशा पुरुषाला राज्याधिकार द्यावा व त्याचे शरीर, बुद्धी, आत्मा रोगरहित व्हावेत असा वैद्याने प्रयत्न करावा. त्याप्रमाणेच राजा व वैद्य यांनी मंत्री, नोकर व प्रजा यांनाही रोगरहित करावे. ज्यामुळे त्यांना राज्यातील सज्जनांचे पालन व दुष्टांचे ताडन करण्याचा प्रयत्न करता येईल. राजा व प्रजा यांनी परस्पर पिता व पुत्र याप्रमाणे व्यवहार करावा.
विषय
पुनश्च, मनुष्यांनी कसे असावे, कसे वागावे, याविषयी पुढील मंत्रात उपदेश केला आहे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (राजवैद्याचे वचन प्रजाजनांप्रति) हे मनुष्यांनो, (राष्ट्राचे नागरिकहो), मी (एक राजवैद्य) (अग्रे) सर्वप्रथम (प्रसव:) ऐश्वर्यसंपन्न होऊन (वाजस्य) वैद्यकशास्त्रासंबंधी ज्ञानाचा लाभ (इमम्) या (सोमम्) चंद्राप्रमाणे दु:खनाशक (राजानम्) विद्या, न्याय, विनय आदी गुणांनी संपन्न अशा या राजाला (सुसुवे) ऐश्वर्ययुक्त करतो आणि त्यांच्या सुरक्षेकरिता, (उत्तम आरोग्याकरिता) (औषधी षु) पृथ्वीवर उत्पन्न होणार्या यव आदी औषधींद्वारे आणि (अप्सु) जलात विद्यमान औषधींद्वारे आणि (अप्सु) जलात विद्यमान औषधींद्वारे (राजाला नीरोग ठेवतो) त्याप्रमाणे (ता:) त्या औषधी (अस्मभ्यम्) आमच्याकरिता, (सर्व नागरिकांकरिता) (मधुमती:) प्रभावशाली मधुर वुणवती (भवन्तु) व्हाव्यात. अशा प्रकारे नीरोग व शक्तिसंपन्न होऊन आम्ही (स्वाहा) सत्य व प्रामाणिकपणे आचरण करीत (पुरोहिता:) सर्वांचे हितकारी होऊन (राष्ट्रे) आमच्या राज्यात निरंतर (जागृयाम) आलस्य त्यागून सदैव सावध राहून जागत आहोत, तसेच तुम्ही इतर सर्व नागरिकांनी देखील राष्ट्ररक्षेत सदैव जागृत रहावे, (आमच्याप्रमाणे सदैव सावध असावे) ॥23॥
भावार्थ
भावार्थ - सभ्य, विवेकी मनुष्यांसाठी उचित आहे की त्यांनी सर्व विद्याविशारद, नीरोग आणि सद्गुणांनी शोभायमान अशा मनुष्याला राज्याधिकार द्यावा. त्या राजाच्या प्रकृतीची काळजी घेणार्या वैद्याने असे यत्न करावेत की ज्यायोगे राजाची शरीर, बुद्धी आणि आत्म्यात रोग वा औदासीन्य येऊ नये. याचप्रकारे राजा आणि वैद्य यांनी सर्व मंत्री, सेवक आणि प्रजाजन, यांना रोगरहित करावे की ज्यामुळे हे सर्व जण राज्यातील सज्जनांच्या पालन कार्यात आणि दुर्जनांना दंडित करण्यात सतत प्रयत्नशील राहतील. राजा, आणि प्रजाजन यांचे नाते पिता-पुत्रांप्रमाणे असावे (राजाने प्रजेस पुत्रा प्रमाणे व प्रजेने राजाला पित्याप्रमाणे मानावे) ॥23॥
इंग्लिश (3)
Meaning
I, being First and Affluent, lend wisdom and prosperity to this king, the driver of all miseries and shining with knowledge, justice and humility. May the medicines produced on the earth or grown in water, be highly efficacious for us. May we, the ministers, act tactfully for the betterment of the State, remaining alert, and always keeping the interests of the government foremost.
Meaning
This illustrious creator of the food of yajna, the Sun, first generated the shining soma, vitality, in the herbs and waters. May these waters and herbs be honey- sweet invigorating for us and we remain wakeful and watchful in the front ranks of the realm with noble speech and virtuous acts.
Translation
Long long ago, the impulsion of produced this blissful plant, the king, in waters and in the medicinal herbs. May those herbs be sweet as honey for us. Stationed in forefront, may we always be active and alert for our nation. Svaha. (1)
Notes
Here are three kandikas beginning with 'Vajasya--prasavah'; these are calied 'vajaprasaviya furtherers of strength; with these the sacrificer makes oblations of milk, rice and other grains collected in a vessel of Udumbara wood.
बंगाली (1)
विषय
পুনস্তৈরত্র কথং ভবিতব্যমিত্যাহ ॥
পুনঃ তাহাদিগকে এই বিষয়ে কেমন হওয়া উচিত, এই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে মনুষ্যগণ ! যেমন আমি (অগ্রে) প্রথম (প্রসবঃ) ঐশ্বর্য্যযুক্ত হইয়া (বাজস্য) বৈদ্যক শাস্ত্র বোধ সম্পর্কীয় (ইমম্) এই (সোমম্) চন্দ্র সমান সর্ব দুঃখ বিনাশক (রাজনম্) বিদ্যা, ন্যায় এবং বিনয় দ্বারা প্রকাশমান রাজাকে (সুসুবে) ঐশ্বর্য্যযুক্ত করি । যেমন তাহার রক্ষায় (ওষধীষু) পৃথিবীর উপর উৎপন্ন হওয়া যবাদি ওষধিসকল এবং (অপ্সু) জলের মধ্যে বর্ত্তমান ওষধী (তাঃ) সেইগুলি (অস্যম্ভম্) আমাদের জন্য (মধুমতীঃ) প্রশস্ত মধুর গুণ যুক্তা (ভবন্তু) হউক । যেমন (স্বাহা) সত্য ক্রিয়া সহ (পুরোহিতাঃ) সকলের হিতকারী আমরা (রাষ্ট্রে) রাজ্যে নিরন্তর (জাগৃয়াম) আলস্য ত্যাগ করিয়া জাগিতে থাকি সেইরূপ তোমরাও ব্যবহার কর ॥ ২৩ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- শিষ্ট মনুষ্যদিগের উচিত যে, সকল বিদ্যার চাতুর্য্য রোগরহিত ও সুন্দর গুণে শোভায়মান পুরুষকে রাজ্যাধিকার প্রদান করিয়া তাহার রক্ষাকারী বৈদ্য এমন প্রচেষ্টা করিবে যাহাতে ইহার শরীর, বুদ্ধি ও আত্মায় রোগের আবেশ না থাকে । এই ভাবে রাজা ও বৈদ্য উভয়ে সকল মন্ত্রী আদি ভৃত্য ও প্রজাদিগকে রোগরহিত করিবে । যাহাতে ইহারা রাজ্যের সজ্জনদিগকে পালন এবং দুষ্টের তাড়না করিতে চেষ্টা করিতে থাকে, রাজা ও প্রজার পুরুষ পরস্পর পিতা পূত্রের ন্যায় ব্যবহার করিবে ॥ ২৩ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
বাজ॑স্যে॒মং প্র॑স॒বঃ সু॑ষু॒বেऽগ্রে॒ সোম॒ꣳ রাজা॑ন॒মোষ॑ধীষ্ব॒প্সু । তাऽঅ॒স্মভ্যং॒ মধু॑মতীর্ভবন্তু ব॒য়ꣳ রা॒ষ্ট্রে জা॑গৃয়াম পু॒রোহি॑তাঃ॒ স্বাহা॑ ॥ ২৩ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
বাজস্যেত্যস্য বসিষ্ঠ ঋষিঃ । প্রজাপতির্দেবতা । স্বরাট্ ত্রিষ্টুপ্ ছন্দঃ ।
ধৈবতঃ স্বরঃ ॥
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