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यजुर्वेद अध्याय - 9

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  • यजुर्वेद - अध्याय 9/ मन्त्र 5
    ऋषिः - बृहस्पतिर्ऋषिः देवता - सविता देवता छन्दः - भूरिक अष्टि, स्वरः - मध्यमः
    98

    इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ऽसि वाज॒सास्त्वया॒यं वाज॑ꣳ सेत्। वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒वे मा॒तरं॑ म॒हीमदि॑तिं॒ नाम॒ वच॑सा करामहे। यस्या॑मि॒दं विश्वं॒ भुव॑नमावि॒वेश॒ तस्यां॑ नो दे॒वः स॑वि॒ता धर्म॑ साविषत्॥५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्र॑स्य। वज्रः॑। अ॒सि॒। वा॒ज॒सा इति॑ वाज॒ऽसाः। त्वया॑। अ॒यम्। वाज॑म्। से॒त्। वाज॑स्य। नु। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। मा॒तर॑म्। म॒हीम्। अदि॑तिम्। नाम॑। वचसा॑। क॒रा॒म॒हे॒। यस्या॑म्। इ॒दम्। विश्व॑म्। भुव॑नम्। आ॒वि॒वेशत्या॑ऽवि॒वेश॑। तस्या॑म्। नः॒। दे॒वः। स॒वि॒ता। धर्म॑। सा॒वि॒ष॒त् ॥५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रस्य वज्रोसि वाजसास्त्वयायँ सेत् । वाजस्य नु प्रसवे मातरम्महीमदितिन्नाम वचसा करामहे । यस्यामिदँ विश्वं भुवनमाविवेश तस्यान्नो देवः सविता धर्म साविषत् ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रस्य। वज्रः। असि। वाजसा इति वाजऽसाः। त्वया। अयम्। वाजम्। सेत्। वाजस्य। नु। प्रसव इति प्रऽसवे। मातरम्। महीम्। अदितिम्। नाम। वचसा। करामहे। यस्याम्। इदम्। विश्वम्। भुवनम्। आविवेशत्याऽविवेश। तस्याम्। नः। देवः। सविता। धर्म। साविषत्॥५॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 9; मन्त्र » 5
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    संस्कृत (2)

    विषयः

    अथ किमर्थः सेनापतिरत्र प्रार्थनीय इत्याह॥

    अन्वयः

    हे वीर! यस्यां त्वमिन्द्रस्य वाजसा वज्रोऽसि, तेन त्वया सहाऽयं वाजं सेद्, यत्रेदं विश्वं भुवनमाविवेमश यत्र देवः सविता नो धर्म साविषत्, तस्यां नाम वाजस्य प्रसवे मातरमदितिं महीं वचसा नु करामहे॥५॥

    पदार्थः

    (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्ययुक्तस्य राज्ञः पुरुषः (वज्रः) वज्र इव शत्रुच्छेदकः (असि) भवसि (वाजसाः) यो वाजान् सङ्ग्रामान् विभजति सः (त्वया) रक्षकेण सेनापतिना सह (अयम्) जनः (वाजम्) सङ्ग्रामम् (सेत्) सिनुयात्, अत्र सिञ् बन्धन इत्यस्माल्लङि विकरणलुग[भावश्च (वाजस्य) सङ्ग्रामस्य (नु) क्षिप्रम् (प्रसवे) ऐश्वर्य्ये (मातरम्) मान्यप्रदाम् (महीम्) पृथिवीम् (अदितिम्) अखण्डिताम् (नाम) प्रसिद्धौ (वचसा) वेदोक्तन्यायोपदेशकवचनेन (करामहे) कुर्य्याम, अत्र लेटि व्यत्ययेन शप् अथवा भ्वादिर्मन्तव्यः (यस्याम्) पृथिव्याम् (इदम्) प्रत्ययालम्बनम् (विश्वम्) सर्वम् (भुवनम्) जगत् (आविवेश) आविष्टमस्ति (तस्याम्) (नः) अस्माकम् (देवः) सर्वप्रकाशकः (सविता) सकलजगदुत्पादकः (धर्म) धारणम् (साविषत्) सवेत्। अत्र सिब्बहुलं णिद॰। (अष्टा॰भा॰वा॰३।१।३४) इति सिपि वृद्धिः। अयं मन्त्रः (शत॰५। १। ४। ३-४) व्याख्यातः॥५॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः! येयं भूमिर्भूतानां सौभाग्यजननी मातृवत् पालिकाऽऽधारभूता प्रसिद्धास्ति, तां विद्यान्यायधर्मयोगेन राज्याय यूयं सेवध्वम्॥५॥

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    विषयः

    अथ किमर्थः सेनापतिरत्र प्रार्थनीय इत्याह ॥

    सपदार्थान्वयः

    हे वीर ! यस्यां पृथिव्यां त्वमिन्द्रस्य परमैश्वर्ययुक्तस्य राज्ञः पुरुषः [तस्य] वाजसाः यो वाजान्=संग्रामान् विभजति सः वज्रः वज्र इव शत्रुच्छेदकः असि भवसि,तेन त्वया रक्षकेण सेनापतिना सहाऽयं जनः वाजं संग्रामंसेत् सिनुयात्, -- यत्रेदं प्रत्ययालम्बनं विश्वं सर्वंभुवनं जगत् आविवेशआविष्टमस्ति, यत्र देवः सर्वप्रकाशक: सविता सकलजगदुत्पादकः नः अस्माकं धर्मं धारणंसाविषत् सवेत्,तस्यां नाम प्रसिद्धौ वाजस्य संग्रामस्य प्रसवे ऐश्वर्ये मातरं मान्यप्रदाम् अदितिम् अखण्डितां महीं पृथिवीं वचसा वेदोक्तन्यायोपदेशकवचनेन नु क्षिप्रंकरामहे कुर्य्याम ॥ ९।५ ॥ [वाजस्य प्रसवे मातरमदितिं महीं वचसा नु करामहे]

    पदार्थः

    (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्ययुक्तस्य राज्ञः पुरुषः (वज्रः) वज्र इव शत्रुच्छेदकः (असि) भवसि ( वाजसाः) यो वाजान्=संग्रामान् विभजति सः (त्वया) रक्षकेण सेनापतिना सह (अयम्) जनः (वाजम्) संग्रामम् (सेत्) सिनुयात् । अत्र सिञ् बन्धन इत्यस्माल्लङि विकरणलुगडभावश्च (वाजस्य) संग्रामस्य(नु) क्षिप्रम् (प्रसवे) ऐश्वर्य्ये (मातरम्) मान्यप्रदाम् (महीम् ) पृथिवीम् (अदितिम्) अखण्डिताम् (नाम) प्रसिद्धौ (वचसा) वेदोक्तन्यायोपदेशकवचनेन (करामहे) कुर्य्याम । अत्र लेटि व्यत्ययेन शप् अथवा भ्वानिर्मन्तव्यः (यस्याम्) पृथिव्याम् (इदम्) प्रत्ययालम्बनम् (विश्वम्) सर्वम् (भुवनम्) जगत् (आविवेश) आविष्टमस्ति (तस्याम्) (नः) अस्माकम् (देव:) सर्वप्रकाशकः (सविता) सकलजगदुत्पादक: (धर्म) धारणम् (साविषत्) सवेत् । अत्र सिब्बहुलं णिद् ॥ अ० ३ । १ । ३४ भा० वा० ॥ इति सिपि वृद्धिः ॥ अयं मन्त्रः शत० ५ । १ । ४ । ३-४ व्याख्यातः ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः ॥ हे मनुष्याः ! येयं भूमिर्भूतानां सौभाग्यजननी, मातृवत्पालिकाऽऽधारभूता प्रसिद्धास्ति, तां विद्यान्यायधर्मयोगेन राज्याय यूयं सेवध्वम् ॥ ९ । ५ ॥

    विशेषः

    बृहस्पतिः । सविता=सकलजगदुत्पाकईश्वरः।। भुरिगष्टिः । मध्यमः ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    अब किसलिये सेनापति की प्रार्थना यहां करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

    पदार्थ

    हे वीर पुरुष (यस्याम्) जिसमें (त्वम्) आप (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य्ययुक्त राजा के (वाजसाः) सङ्ग्रामों का विभाग करने वाले (वज्रः) वज्र के समान शत्रुओं को काटने वाले (असि) हो, उस (त्वया) रक्षक आप के साथ (अयम्) यह पुरुष (वाजम्) सङ्ग्राम का (सेत्) प्रबन्ध करे, जहां (इदम्) प्रत्यक्ष वर्त्तमान (विश्वम्) सब (भुवनम्) जगत् (आविवेश) प्रविष्ट है और जहां (देवः) सब का प्रकाशक (सविता) सब जगत् का उत्पादक परमात्मा (नः) हमारा (धर्म्म) धारण (साविषत्) करे, (तस्याम्) उसमें (नाम) प्रसिद्ध (वाजस्य) सङ्ग्राम के (प्रसवे) ऐश्वर्य्य में (मातरम्) मान्य देनेहारी (अदितिम्) अखण्डित (महीम्) पृथिवी को (वचसा) वेदोक्त न्याय के उपदेशरूप वचन से हम लोग (नु) शीघ्र (करामहे) ग्रहण करें॥५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो यह भूमि प्राणियों के लिये सौभाग्य के उत्पन्न, माता के समान रक्षा और सब को धारण करनेहारी प्रसिद्ध है, उसका विद्या, न्याय और धर्म्म के योग से राज्य के लिये तुम लोग सेवन करो॥५॥

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    विषय

    सेनापति व सम्प्रदाय-विहीन राज्य [Secular State]

    पदार्थ

    गत मन्त्रों में राष्ट्र के अन्दर की सुव्यवस्था का चित्रण है। उस सुव्यवस्था से प्रजाओं के जीवन भद्र से युक्त तथा अभद्र से वियुक्त हुए हैं। प्रस्तुत मन्त्र में बाह्य आक्रमण से राष्ट्र की रक्षा का विधान है। यह रक्षा का कार्य सेनापति पर निर्भर करता है, अतः सेनापति से कहते हैं कि— २. ( इन्द्रस्य वज्रः असि ) = तू राष्ट्र के ऐश्वर्य को बढ़ानेवाले राजा का वज्र है। वज्र की तरह शत्रुओं का छेदन करनेवाला है। 

    ३. ( वाजसाः ) = [ वाजान् संग्रामान् सनोति, सन्ध्वन् = win ] तू संग्रामों को विजय करनेवाला है। ( अयम् ) = यह राजा ( त्वया ) = तेरे द्वारा ( वाजम् ) = संग्राम का ( सेत् ) = [ सिनुयात् ] प्रबन्ध करनेवाला हो, अर्थात् युद्ध का सारा प्रबन्ध आपके द्वारा ही राजा से किया जाए [ षिञ् बन्धने ]। 

    ४. ( वाजस्य ) = संग्राम के ( प्रसवे ) = उत्पन्न होने पर ( नु ) = अब ( वचसा ) = वेदोपदिष्ट निर्देशों के अनुसार ( मातरं महीम् ) = हम अपनी मातृभूमि को ( अदितिम् नाम ) = निश्चय से अखण्डित ( करामहे ) = करते हैं, अर्थात् अधिक-से-अधिक त्याग करके अपनी मातृभूमि को शत्रु द्वारा छिन्न-भिन्न नहीं होने देते। 

    ५. हमारा राष्ट्र ऐसा है कि ( यस्याम् ) = जिसमें ( इदम् ) = ये ( विश्वं भुवनम् ) = सब लोक ( आविवेश ) = प्रविष्ट हुए हैं, अर्थात् हमारे राष्ट्र में अन्य राष्ट्रों के लोगों को भी रहने की पूरी सुविधा है। ‘यहाँ धर्मविशेष के माननेवाले लोग ही रह सकें’, ऐसी बात नहीं है। यह राष्ट्र सभी मत वालों व सभी देशवालों को रहने की सुविधा प्राप्त कराता है। 

    ६. ( तस्याम् ) = सबको निवास देनेवाली मातृभूमि में ( सविता देवः ) = सबका प्रेरक प्रभु ( धर्म ) = धारणात्मक कर्मों को ( साविषत् ) = प्रेरित करे। धारणात्मक कर्मों को करना ही हमारा धर्म हो। हम निर्माण को धर्म समझें, तोड़-फोड़ को अधर्म। ‘घर्म’ पाठ हो तो अर्थ होगा यज्ञों को प्रेरित करे। हम यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहें।

    भावार्थ

    भावार्थ — सेनापति शत्रुओं के आक्रमण से राष्ट्र की रक्षा करे। युद्ध उपस्थित होने पर हम अपने राष्ट्र को खण्डित न होने दें। हमारे राष्ट्र में सभी के लिए स्थान हो और निर्माणत्मक कर्मों को ही हम धर्म समझें।

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    विषय

    संग्राम विजयी पुरुष की सर्वोपरि पदप्राप्ति ।

    भावार्थ

    हे वीर पुरुष ! तू ( इन्द्रस्य ) ऐश्वर्यवान् राजा का (वज्रः ) शत्रु निवारक वज्र या खड्ग के समान शत्रु का नाशक ( असि ) हैं | तू ( वाजसाः ) संग्रामों का पूर्ण अनुभवी है । ( त्वया ) तेरे द्वारा ( अयम् ) यह राजा ( वाजम् ) संग्राम को विजय ( सेतू) करे। (तु) शीघ्र ही ( वाजस्य सवे ) वीर्य के या युद्ध के ऐश्वर्यजनक कार्य में ( महीम् ) बड़ी (अदितिम् ) अखण्डित, अविनाशी ( मातरम् ) भूमि माता को हम ( वचसा ) अपनी आज्ञा से ( नाम ) अपने अधीन वश ( करामहे ) करें (यस्याम् ) जिसमें (इदं) यह ( विश्वं भुवनम् ) समस्त संसार ( आविवेश ) स्थित है । ( तस्याम् ) उसमें ( सविताः ) सब अधिकारियों का प्रेरक प्रवर्तक और उत्पादक ( देवः ) देव, राजा ( नः ) हमारे लिये ( धर्म ) धर्म, धारण या राष्ट्र व्यवस्था को ( साविषत् ) चलावे । अथवा ( यस्याम् इदं भुवनं अविवेश ) जिसमें यह समस्त विश्व स्थित है उसमें सर्वो- त्पादक परमेश्वर (धर्म) हमारे पालन पोषण की सुव्यवस्था करे || शत ५।१।४ । ३, ४ ॥ 
    रथपक्ष में - हे रथ ! तू इन्द्र का संग्रामगामी वज्र है। तुझ से वह संग्राम में जावे । ( भ्राजाय प्रसवे ) ऐश्वर्य के लाभ के लिये हम अखण्ड पृथिवी को ( वचसा नाम करामहे ) अपनी आज्ञा से वश करें । इत्यादि पूर्ववत् । 

    टिप्पणी

     ५ - ० साविषक्' इति काण्व ० । 

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सविता देवता । भुरिग् ऋष्टिः । मध्यमः ॥ 

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    विषय

    अब किसलिये सेनापति से प्रार्थना करनी चाहिये, यहाँ यह उपदेश किया है ॥

    भाषार्थ

    हे वीर सेनापते ! (यस्याम्) जिस पृथिवी पर आप (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य से युक्त राजपुरुष के, (वाजसाः) संग्रामों का विभाजन करने वाले (वज्रः) वज्र के समान शत्रुओं के छेदक (असि) हो, उस (त्वया) आप रक्षक सेनापति के साथ (अयम्) यह राजपुरुष (वाजम्) संग्राम का (सेतु) प्रबन्ध करे। और-- जिस पृथिवी पर (इदम्) यह सुख का आश्रय (विश्वम्) सब (भुवनम्) जगत् (आविवेश) विस्तृत है, और जिस पृथिवी पर (देवः) सबका प्रकाशक (सविता) सकल जगत् का उत्पादक ईश्वर (नः) हमारे (धर्म) धर्म को (साविषत्) पैदा करता है, (तस्याम्) उस (नाम) प्रसिद्ध भूमि पर (वाजस्य) संग्राम के (प्रसवे) ऐश्वर्य के निमित्त (मातरम्) माननीय (अदितिम्) अखण्डित (महीम्) पृथिवी को (वचसा) वेदोक्त न्याय का उपदेश करने वाले वचन से (नु) शीघ्र (करामहे) हम संयुक्त करें ॥ ९ । ५॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ हे मनुष्यो! जो यह भूमि प्राणियों के सौभाग्य को पैदा करने वाली, माता के समान पालक, सबकी आधारभूत प्रसिद्ध है उसका विद्या, न्याय, और धर्मपूर्वक राज्य के लिये सेवन करो॥ ९ । ५॥

    प्रमाणार्थ

    (सेतु) सिनुयात् । यहाँ बन्धन अर्थ वाली 'सिञ्' धातु से लङ् लकार में विकरण-प्रत्यय का लुक और अट् का अभाव है। (करामहे) यहाँ लेट् लकार में व्यत्यय से 'शप्' है अथवा 'कृ' धातु का भ्वादि में पाठ मान लेना चाहिए। (साविषत्) यहाँ'सिब्बहुलं णित्०' (अ०३ । १ । ३४) इस भाष्य वार्तिक से ‘सिप्' के णित् होने से वृद्धि है । इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५। १ । ४। ३-४ ) में की गई है ॥९। ५॥

    भाष्यसार

    १. सेनापति से प्रार्थना--हे वीर सेनापते ! आप इस पृथिवी पर परम ऐश्वर्य से युक्त राजा के पुरुषों के लिये संग्राम का विभाजन करने वाले हो, वज्र के समान शत्रुओं का छेदन करने वाले हो, इसलिये मैं सैनिक आपके साथ संग्राम का सेवन करूँ। जिस पृथ्वी पर सुख का अवलम्बभूत यह सब जगत् विस्तृत है, जिस पर सबका प्रकाशक, सकल जगत् का उत्पादक ईश्वर हमारे लिये वेद-धर्म को उत्पन्न करता है, उस पृथिवी पर संग्राम के ऐश्वर्य के निमित्त आप से प्रार्थना करते हैं। आप और हम प्रजाजन मिलकर प्राणियों के सौभाग्य को उत्पन्न करने वाली, माता के समान पालक, सबका आधारभूत इस अखण्ड पृथिवी को विद्या, न्याय तथा धर्म के योग से राज्य के लिये सेवन करें । २. अलङ्कार--मन्त्र में उपमा वाचक शब्द लुप्त है अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है । उपमा यह है कि राजपुरुष वीर सेनापति के समान संग्राम का सेवन करें । राज्य के लिये पृथिवी का सेवन करें ॥ ९। ५ ॥

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! ही भूमी सौभाग्यशालिनी मातेसमान प्राण्यांचे रक्षण करून सर्वांना धारण करणारी आहे. विद्या, न्याय व धर्म यांच्याद्वारे तिचा राज्यासाठी यथायोग्य उपयोग करून घ्या.

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    विषय

    सेनापतीची प्रार्थना कोणत्या हेतूसाठी करावी, पुढील मंत्रात हा विषय वर्णित आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - हे वीर पुरुष सेनापती, (यस्थाम्) ज्या राज्यात वा भूमीवर (त्वम्) आपण (इन्दुस्थ) परमैश्वर्यशाली राजासाठी (वाजसा) संग्रामाचे विविध विभाग करता (व्यूहरचना, सैन्यसंचालन, आदेश आदी रणनीतीचा उपयोग करता) आणि (वज्र:) वज्राप्रमाणे संहारक शत्रूंचा देखील विनाश करणारे (असि) आहात, अशा (त्वया) आपणांसारख्या रक्षकास प्राप्त करून (अयझ्) या परुषाने (अधीन सैन्याधिकारी) (वाजम्) युद्धाचे (सेतू) संचालन करावे. (इदम्) प्रत्यक्ष विद्यमान (विश्वम्) सर्व (भुवनम्) जगात जो (आविवेश) प्रविष्ट वा व्याप्त आहे, तो (देव:) सर्वप्रकाशक (सविता) सर्वोत्पादक परमेश्वर (न:) आम्हाला (प्रजाजनांना) (धर्म्म) धारण (सविषत्) करो (आमचे रक्षण-पालन करो) (तस्थाम्) त्या भूमीमध्ये (नाम) प्रसिद्ध (वाजस्थ) युद्धाद्वारे प्राप्त केलेल्या (प्रसने) ऐश्वर्यामध्ये वा संपत्तीप्राप्त करून (मातरम्) माता वा आम्हांस मान-सम्मान देणारी (अदितिम्) अखंड अशा (महीम्) पृथ्वीला (वा या राज्याला) आम्ही (प्रजाजनांनी) (वचसा) वेदावत न्याय आणि उपदेशाप्रमाणे (तु) शीघ्रमेव (करामहे) ग्रहण करावे (वैदिक आज्ञेप्रमाणे न्याय व शासन-नियम स्वीकारावेत) ॥5॥

    भावार्थ

    भावार्थ - या मंत्रात वाचकलूप्तोपमा अलंकार आहे. हे मनुष्यांनो, ही भूमी (मातृभूमी वा राष्ट्र) प्राणिमात्रासाठी जन्म देणार्‍या मातेप्रमाणे सुख-समाधान देते, सर्वांचे रक्षण करून सर्वांचे धारण म्हणजे पालन करते. त्या भूमीमध्ये तुम्ही विद्या, न्याय आणि धर्माच्या आधारें यथोचित सुखाचा उपभोग घ्या. ॥5॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    O commander of the army thou art the thunderbolt of the king, who, expert in battles, wins the war, with thy assistance, May we speedily bring under us, according to Vedic justice, the vast, undivided, honour-giving land ; on which the whole mankind is settled. May God, the Illuminator of all, and generator of the universe sustain us on it.

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    Meaning

    You are the thunder-bolt of lightning for the enemy. This man, the commander/ruler would plan and win the battle with you, the thunderous hero. In the business of the battle we sing songs of praise, in noble words, in honour of the mother, the great earth, one and indivisible. On the earth where this whole world finds its haven and home, on that same earth, we pray, Lord Savita, creator of the world, may establish the rule of universal Dharma for us.

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    Translation

    You are the adamantine weapon of the resplendent Lord. May this sacrificer (the king), the winner of strength; obtain power from you. (1) At the impulsion of bestower of power, we praise the mother earth, aditi (indivisible) by name. On this earth, where all this life has been accommodated, may the Creator God, provide shelter to us. (2)

    Notes

    Here begin the formulas for the chariot-racing which is a characteristic and important part of the Vajapeya. The sacrificer takes the chariot down from its carrier-stand and draws to the altar. Vajrah, adamantine weapon; thunder-bolt. Vajasah, bestower of strength or power. Vi$vam bhuvanam, all this life. Gharmam, shelter.

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    बंगाली (1)

    विषय

    অথ কিমর্থঃ সেনাপতিরত্র প্রার্থনীয় ইত্যাহ ॥
    এখন কীজন্য সেনাপতির প্রার্থনা এখানে করা উচিত, এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥

    पदार्थ

    পদার্থঃ- হে বীর পুরুষ (য়স্যাম) যাহাতে (ত্বম্) আপনি (ইন্দ্রস্য) পরম ঐশ্বর্য্যযুক্ত রাজার (বাজসাঃ) সংগ্রামের বিভাগকারী (বজ্রঃ) বজ্র সমান শত্রুদিগকে কর্ত্তনকারী (অসি) হন্ সেই (ত্বয়া) রক্ষক আপনার সহ (অয়ম্) এই পুরুষ (বাজম্) সংগ্রামের (সেৎ) ব্যবস্থা করিবে যেখানে (ইদম্) প্রত্যক্ষ বর্ত্তমান (বিশ্বম্) সকল (ভূবনম্) জগৎ (আবিবেশ) প্রবিষ্ট এবং যেখানে (দেবঃ) সকলের প্রকাশক (সবিতা) সকল জগতের উৎপাদক পরমাত্মা (নঃ) আমাদের (ধর্ম্ম) ধারণ (সাবিষৎ) করেন (তস্যাম্) তাহাতে (নাম) বিখ্যাত (বাজস্য) সংগ্রামের (প্রসবে) ঐশ্বর্য্যে (মাতরম্) মান্যতা প্রদানকারী (আদিতিম্) অখন্ডিত (মহীম্) পৃথিবীকে (বচসা) বেদোক্ত ন্যায়ের উপদেশরূপ বচন দ্বারা আমরা (নু) শীঘ্র (করামহে) গ্রহণ করি ॥ ৫ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । হে মনুষ্যগণ ! এই যে ভূমি প্রাণিদিগের জন্য সৌভাগ্য-উৎপন্ন মাতা সম রক্ষা এবং সকলকে ধারণকারী প্রসিদ্ধ তাহার বিদ্যা ন্যায় ও ধর্ম্মের যোগ দ্বারা রাজ্যের জন্য তোমরা সেবন কর ॥ ৫ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    ইন্দ্র॑স্য॒ বজ্রো॑ऽসি বাজ॒সাস্ত্বয়া॒য়ং বাজ॑ꣳ সেৎ । বাজ॑স্য॒ নু প্র॑স॒বে মা॒তরং॑ ম॒হীমদি॑তিং॒ নাম॒ বচ॑সা করামহে । য়স্যা॑মি॒দং বিশ্বং॒ ভুব॑নমাবি॒বেশ॒ তস্যাং॑ নো দে॒বঃ স॑বি॒তা ধর্ম॑ সাবিষৎ ॥ ৫ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ইন্দ্রস্যেত্যস্য বৃহস্পতির্ঋষিঃ । সবিতা দেবতা । ভুরিগষ্টিশ্ছন্দঃ ।
    মধ্যমঃ স্বরঃ ॥

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