यजुर्वेद - अध्याय 9/ मन्त्र 31
ऋषिः - तापस ऋषिः
देवता - अग्न्यादयो मन्त्रोक्ता देवताः
छन्दः - स्वराट अति धृति,
स्वरः - षड्जः
102
अ॒ग्निरेका॑क्षरणे प्रा॒णमुद॑जय॒त् तमुज्जे॑षम॒श्विनौ॒ द्व्यक्षरेण द्वि॒पदो॑ मनु॒ष्यानुद॑जयतां॒ तानुज्जे॑षं॒ विष्णु॒स्त्र्यक्षरेण॒ त्रील्ँलो॒कानुद॑जय॒त् तानुज्जे॑षं॒ꣳ सोम॒श्चतु॑रक्षरेण॒ चतु॑ष्पदः प॒शूनुद॑जय॒त् तानुज्जे॑षम्॥३१॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्निः। एका॑क्षरे॒णेत्येक॑ऽअक्षरेण। प्रा॒णम्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। अ॒श्विनौ॑। द्व्य॑क्षरे॒णेति॒ द्विऽअ॑क्षरेण। द्वि॒पद॑ इति॒ द्वि॒ऽपदः॑। म॒नु॒ष्या᳖न्। उत्। अ॒ज॒य॒ता॒म्। तान्। उत्। जे॒ष॒म्। विष्णुः॑। त्र्य॑क्षरे॒णेति॒ त्रिऽअ॑क्षरेण। त्रीन्। लो॒कान्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तान्। उत्। जे॒ष॒म्। सोमः॑। चतु॑रक्षरे॒णेति॒ चतुः॑ऽअक्षरेण। चतु॑ष्पदः। चतुः॑पद इति॒ चतुः॑ऽपदः। प॒शून्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तान्। उत्। जे॒ष॒म् ॥३१॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निरेकाक्षरेण प्राणमुदजयत्तमुज्जेषमश्विनौ द्व्यक्षरेण द्विपदो मनुष्यानुदजयतान्तानुज्जेषम् । विष्णुस्त्र्यक्षरेण त्रीँल्लोकानुदजयत्तानुज्जेषँ सोमश्चतुरक्षरेण चतुष्पदः पशूनुदजयत्तानुज्जेषम् ॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्निः। एकाक्षरेणेत्येकऽअक्षरेण। प्राणम्। उत्। अजयत्। तम्। उत्। जेषम्। अश्विनौ। द्व्यक्षरेणेति द्विऽअक्षरेण। द्विपद इति द्विऽपदः। मनुष्यान्। उत्। अजयताम्। तान्। उत्। जेषम्। विष्णुः। त्र्यक्षरेणेति त्रिऽअक्षरेण। त्रीन्। लोकान्। उत्। अजयत्। तान्। उत्। जेषम्। सोमः। चतुरक्षरेणेति चतुःऽअक्षरेण। चतुष्पदः। चतुःपद इति चतुःऽपदः। पशून्। उत्। अजयत्। तान्। उत्। जेषम्॥३१॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
राजा प्रजाः प्रजाश्च राजानं सततं वर्द्धयेयुरित्याह॥
अन्वयः
हे राजन्नग्निर्भवान् यथा एकाक्षरेण प्राणमिव यं प्रजाजनमुदजयत्, तथा तमहमप्युज्जेषम्। हे राजजनावश्विनौ! भवन्तौ यथा द्व्यक्षरेण यान् द्विपदो मनुष्यानुदजयताम्, तथा तानहमप्युज्जेषम्। हे सर्वप्रधानपुरुष! विष्णुर्भवान् यथा त्र्यक्षरेण यान् त्रींल्लोकानुदजयत् तथा तानहमप्युज्जेषम्। हे न्यायाधीश! सोमो भवान् यथा चतुरक्षरेण याँश्चतुष्पदः पशूनुदजयत्, तथा तानहमप्युज्जेषम्॥३१॥
पदार्थः
(अग्निः) अग्निरिव वर्त्तमानो राजा (एकाक्षरेण) ओमित्यनेन विज्ञापकेन दैव्या गायत्र्या छन्दसा (प्राणम्) शरीरस्थं वायुमिव प्रजाजनम् (उत्) उत्कृष्टया नीत्या (अजयत्) जयेदुत्कर्षेत् (तम्) (उत्) (जेषम्) जयेयमुत्कर्षेयम् (अश्विनौ) सूर्याचन्द्रमसाविव राजराजपुरुषौ (द्व्यक्षरेण) दैव्या उष्णिहा (द्विपदः) (मनुष्यान्) मननशीलान् (उत्) (अजयताम्) (तान्) (उत्) (जेषम्) (विष्णुः) परमेश्वर इव न्यायकारी (त्र्यक्षरेण) दैव्याऽनुष्टुभा (त्रीन्) जन्मस्थाननामवाच्यान् (लोकान्) दर्शनीयान् (उत्) (अजयत्) (तान्) (उत्) (जेषम्) (सोमः) ऐश्वर्य्यमिच्छुः (चतुरक्षरेण) दैव्या बृहत्या (चतुष्पदः) (पशून्) हरिणादीनारण्यान् (उत्) (अजयत्) (तान्) (उत्) (जेषम्)। अयं मन्त्रः (शत॰५। २। २। १७) व्याख्यातः॥३१॥
भावार्थः
यदि राजा सर्वान् प्रजाजनानुन्नयेत् तर्हि प्रजापुरुषास्तं कथं नोन्नयेयुर्नोचेन्न॥३१॥
विषयः
राजा प्रजाः प्रजाश्च राजानं सततं वर्द्धयेयुरित्याह ।
सपदार्थान्वयः
हे राजन् ! अग्निः अग्निरिव वर्त्तमानो राजा भवान् यथा एकाक्षरेण ओमित्यनेन विज्ञापकेन दैव्या गायत्र्या छन्दसा प्राणं शरीरस्थं वायुम् इव यं प्रजाजनमुदजयद् उत्कृष्टया नीत्या जयेदुत्कर्षेत्, तथा तमहमप्युज्जेषम् उत्कृष्टया नीत्या जयेयमुत्कर्षेयम् । हे राजजनावश्विनौ ! सूर्याचन्द्रमसाविव राजराजपुरुषौ ! भवन्तौ यथा द्व्यक्षरेण दैव्या उष्णिहा यान् द्विपदो मनुष्यान् मननशीलान्उज्जयताम् उत्कृष्टया नीत्या जयतामुत्कर्षतांतथा तानहमपिउज्जेषं जयेयमुत्कर्षेयम् । हे सर्वप्रधानपुरुष ! विष्णुः परमेश्वर इव न्यायकारी भवान् यथा त्र्यक्षरेण दैव्याऽनुष्टुभा यान् त्रीन् जन्मस्थाननामवच्यान् लोकान् दर्शनीयान् उदजयत् उत्कृष्टया नीत्या जयेदुत्कर्षेत् तथा तानहमप्युज्जेषं जयेयमुत्कर्षेयम् । हे न्यायधीश ! सोमः ऐश्वर्य्यमिच्छु: भवान्यथा चतुरक्षरेण दैव्या बृहत्या याँश्चतुष्पदः पशून् हरिणादीनारण्यान् उदजयत् उत्कृष्टया नीत्या जयेदुत्कर्षेत तथा तानहमप्युज्जेषं जयेयमुत्कर्षेयम् ।। ९ । ३१ ।। [हे राजन् !.........भवान् यथा एकाक्षरेण प्राणमिव यं प्रजाजनमुदजयत्तथा तमहमप्युज्जेषम्,........ ]
पदार्थः
(अग्निः) अग्निरिव वर्त्तमानो राजा (एकाक्षरेण) ओमित्यनेन विज्ञापकेन दैव्या गायत्र्या छन्दसा (प्राणम्) शरीरस्थं वायुमिव प्रजाजनम् (उत्) उत्कृष्टया नीत्या (अजयत्) जयेदुत्कर्षेत् (तम्) (उत्) (जेषम्) जयेयमुत्कर्षेयम् (अश्विनौ) सूर्याचन्द्रमसाविव राजराजपुरुषौ (द्व्यक्षरेण) दैव्या उष्णिहा (द्विपदः) (मनुष्यान्) मननशीलान् (उत्) (अजयताम्) (तान्) (उत्) (जेषम्) (विष्णुः) परमेश्वर इव न्यायकारी (त्र्यक्षरेण) दैव्याऽनुष्टुभा (त्रीन्) जन्मस्थाननामवाच्यान् (लोकान्) दर्शनीयान् (उत्) (अजयत्) (तान्) (उत्) (जेषम्) (सोमः) ऐश्वर्य्यमिच्छु: (चतुरक्षरेण) दैव्या बृहत्या (चतुष्पदः) (पशून्) हरिणादीनारण्यान् (उत्) (अजयत्) (तान्) (उत्) (जेषम्) ॥ अयं मंत्रः शत० ५ । २ । २ । १७ व्याख्यातः ।। ३१ ॥
भावार्थः
यदि राजा सर्वान् प्रजाजनानुन्नयेत्तर्हि प्रजापुरुषास्तं कथं नोन्नयेयुर्नोचेन्न ॥ ९ । ३१ ।।
विशेषः
तापसः । अग्न्यादयो मन्त्रोक्ताः=राजादयः ॥ अत्यष्टि: । गान्धारः ।।
हिन्दी (4)
विषय
राजा प्रजाओं को और प्रजा राजा को निरन्तर बढ़ाया करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥
पदार्थ
हे राजन्! (अग्निः) अग्नि के समान वर्त्तमान आप जैसे (एकाक्षरेण) चितानेहारी एक अक्षर की दैवी गायत्री छन्द से (प्राणम्) शरीर में स्थित वायु के समान प्रजाजनों को (उत्) (अजयत्) उत्तम करे वैसे (उत्) उत्तम नीति से (तम्) उसको मैं भी (उत्) (जेषम्) उत्तम करूं। हे राजप्रजाजनो! (अश्विनौ) सूर्य्य और चन्द्रमा के समान आप जैसे (द्व्यक्षरेण) दो अक्षर की दैवी उष्णिक् छन्द से जिन (द्विपदः) दो पैर वाले (मनुष्यान्) मननशील मनुष्यों को (उज्जयताम्) उत्तम करो, वैसे (तान्) उन को मंै भी (उज्जेषम्) उत्तम करूं। हे सर्वप्रधान पुरुष! (विष्णुः) परमेश्वर के समान न्यायकारी आप जैसे (त्र्यक्षरेण) तीन अक्षर की दैवी अनुष्टप् छन्द से जिन (त्रीन्) जन्म, स्थान और नामवाची (लोकान्) देखने योग्य लोकों को (उदजयत्) उत्तम करते हो, वैसे (तान्) उनको मैं भी (उज्जेषम्) उत्तम करूं। हे (सोमः) ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले न्यायाधीश! आप जैसे (चतुरक्षरेण) चार अक्षर के दैवी बृहती छन्द से (चतुष्पदः) चौपाये (पशून्) हिरणादि पशुओं को (उदजयत्) उत्तम करते हो, वैसे (तान्) उनको मैं भी (उज्जेषम्) उत्तम करूं॥३१॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सब प्रजाओं को अच्छे प्रकार बढ़ावे तो उसको भी प्रजाजन क्यो न बढ़ावें और जो ऐसा न करे तो उसको प्रजा भी कभी न बढ़ावे॥३१॥
विषय
‘अग्निः, अश्विनौ, विष्णुः, सोमः’ उज्जिति = उत्कृष्ट विजय
पदार्थ
१. ( अग्निः ) = [ अग्रेणीः ] आगे बढ़ने की मनोवृत्तिवाला—सारे राष्ट्र का सञ्चालक राजा ( एकाक्षेरण ) = [ व्याहरन् ] ‘ओम्’ इस अद्वितीय अक्षर के जप से ( प्राणम् ) = प्राण को ( उदजयत् ) = जीतता है। ( तम् ) = उस प्राण को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीतूँ। ‘ओम्’ के जप से मनुष्य वासनाओं से बचा रहता है और वासनाओं का शिकार न होने से इसकी प्राणशक्ति ठीक बनी रहती है। यही ‘एक अक्षर से प्राणों का विजय’ है। आगे बढ़ने की वृत्तिवाले ‘अग्नि’ के लिए यह आवश्यक है। बिना प्रणव-जप के किसी भी प्रकार की उन्नति सम्भव नहीं।
२. ( अश्विनौ ) = प्राण और अपान ( द्व्यक्षरेण ) = दो व्यापक सिद्धान्तों से [ अश् व्याप्तौ ], अर्थात् विद्या और श्रद्धा से ( द्विपदः मनुष्यान् ) = दो पाँववाले मनुष्यों को [ पद् गतौ ]—द्विविध गतिवाले मनुष्यों को ( उदजयताम् ) = उन्नत करते हैं—उत्कृष्ट विजयवाला करते हैं। ( तान् उज्जेषम् ) = मैं इन मनुष्यों को जीत जाऊँ, अर्थात् श्रद्धा व विद्या-सम्पन्न पुरुषों में मेरा स्थान प्रमुख हो।
३. ‘ओम्’ का जप करनेवाला विषयों में न फँसकर प्राणशक्ति का विजय करता है तथा प्राणापान की साधना करनेवाला श्रद्धा व विद्या-सम्पन्न होकर ‘अभ्युदय व निःश्रेयस’ दोनों को सिद्ध करनेवाले मनुष्यों को जीत जाता है, अर्थात् उनका अग्रणी बनता है। अब यह ‘विष्णुः’ [ विष्लृ = व्याप्तौ ] व्यापक उन्नति करनेवाला बनता है और ( त्रि अक्षरेण ) = तीन व्यापक तत्त्वों के द्वारा मस्तिष्क में ‘प्रज्ञा’, मन में ‘उत्साह’ और शरीर में ‘बल’ के द्वारा यह ( त्रीन् लोकान् ) = तीनों लोकों को ( उदजयत् ) = जीतता है। आध्यात्म में ये तीन लोक ‘शरीर, मन और बुद्धि’ हैं। ( तान् उज्जेषम् ) = मैं भी इन तीनों लोकों का विजय करनेवाला बनूँ। मेरा शरीर बल-सम्पन्न हो तो मन उत्साहमय हो और मस्तिष्क प्रज्ञा से पूर्ण हो।
४. इस व्यापक उन्नति को करनेवाला मैं ( सोमः ) = सौम्य स्वभाववाला—विनीत बनूँ। यह सोम ( चतुरक्षरेण ) = ‘साम, दाम, भेद व दण्ड’ इन चार व्यापक सिद्धान्तों के द्वारा( चतुष्पदः पशून् ) = चार पाँववाले, चारों ओर भटकनेवाले पशुओं को भी ( उदजयत् ) = जीत जाता है। ( तान् उज्जेषम् ) = मैं भी इनको जीतनेवाला बनूँ। सोम होता हुआ मैं सभी का विजेता होऊँ। विजय के लिए मैं क्रमशः ‘साम, दान, भेद व दण्ड’ इन उपायों का प्रयोग करूँ।
५. यहाँ मन्त्र में चारों वाक्यों के कर्तृपदों का क्रम यह है—‘अग्नि, अश्विनौ, विष्णु, सोम’। एक वाक्य में कहें तो अर्थ यह होगा कि ‘आगे बढ़नेवाला [ अग्नि ] प्राणापान की [ अश्विनौ ] साधना करता है और शरीर, मन व मस्तिष्क सभी दृष्टिकोणों से व्यापक उन्नति करता हुआ यह [ विष्णु ] अधिक-से-अधिक विनीत [ सोम ] होता है।
६. मन्त्र के करणपदों का क्रम यह है ‘एकाक्षरेण—द्व्यक्षरेण—त्र्यक्षरेण—चतुरक्षरेण’ इनके अर्थ एक वाक्य में इस प्रकार होंगे कि—मनुष्य एकाक्षर ‘ओम्’ का सतत जप करता हुआ द्व्याक्षर ‘श्रद्धा व विद्या’ को विकसित करने के लिए यत्नशील हो। ‘इसका मस्तिष्क प्रज्ञा से परिपूर्ण हो तो इसका हृदय सदा उत्साहमय हो और शरीर में यह बल-सम्पन्न हो। इस प्रकार निज जीवन को उन्नत बनाकर यह अपने व्यावहारिक जीवन में ‘साम, दाम, भेद व दण्ड’ का ठीक प्रयोग करता हुआ सभी को अपने वश में करनेवाला हो।
७. मन्त्र के कर्मपदों का क्रम यह है ‘प्राणम्—द्विपदो मनुष्यान्—त्रीन् लोकान्—चतुष्पदः पशून्’ इनका अभिप्राय यह है कि हम प्राण का विजय करें। प्राणों की साधना करके मस्तिष्क में विद्या तथा हृदय में श्रद्धा का विकास करें तब अभ्युदय व निःश्रेयस को सिद्ध करनेवाले मनुष्यों को जीत जाएँगे। इस विद्या व श्रद्धा का परिणाम हमारे जीवन पर यह होगा कि हमारा शरीर सबल होगा, हृदय सोत्साह तथा मस्तिष्क सप्रज्ञ [ बुद्धियुक्त ]। इस प्रकार त्रिविध उन्नति करके हम तीनों लोकों का विजय कर रहे होंगे। यह विजय हमें इस योग्य बनाएगी कि हम चतुष्पद पशुओं पर भी सामादि उपायों द्वारा विजय पाएँगें।
भावार्थ
भावार्थ — हमारा जीवन क्रमशः उन्नति करता हुआ विजयी और विजयी ही बनता चले।
विषय
१७प्रकार के अक्षय बलों से राष्ट्र का वशीकार ।
भावार्थ
[१] ( अग्निः ) अग्नि, जिस प्रकार जीव, परमेश्वर ( एका- क्षरेख ) एक अक्षर ओंकार के बल से और एकमात्र वायु की अक्षय शक्ति से ( प्राणम् ) प्राण और महाप्राण वायु को ( उद् अजयत् ) अपने वश करता है, उसी प्रकार मैं राजा स्वयं ( अग्नि: ) अग्नि के समान शत्रुओं को संतापकारी और अग्रणी होकर ( एकाक्षरेण ) अपने क्षेण होनेवाले, अपार बल से ( तम् प्राणम् ) उस प्राण को, प्रजा के जीवना- धार अन्न को ( उत् जेषम् ) अपने वश करूं ।
[ २ ] ( अश्विनौ ) अश्विन् दिन और रात्रि, सूर्य और चन्द्र, माता और पिता दोनों अपने ( द्वयक्षरे ) दो प्रकार का अक्षय बल, प्रकाश, अन्धकार या श्रम और विश्राम, ताप और शीतलता, पराक्रम और प्रेम से ( द्विपद : मनुष्यान् ) दोपाये मनुष्यों को ( उद् अजयताम् ) अपने वश करते हैं उसी प्रकार में राजा दिन रात्रि, सूर्य चन्द्र और माता पिता के समान होकर ( द्विपदः मनुष्यान् ) दो पाये मनुष्यों को काम और आरम्भ, तीव्रता और सौम्यता, पराक्रम और प्रेम इन दो दो प्रकार के अनश्वर सामर्थ्य से ( उत् जेषम् ) अपने वश करूं और उनको उन्नत करूं ।
३] ( विष्णुः ) व्यापक प्रकाशवाला सूर्य जिस प्रकार ( अन्तरेण ) अपने तीन प्रकार के आदित्य, विद्युत् और अग्नि इन अक्षय बलों या तेजों से ( त्रीन् लोकान् ) तीनों लोकों को ( उद् अजयत् ) अपने वश कर रहा है उसी प्रकार मैं भी अपने तीन प्रकार के प्रज्ञा, उत्साह और बल इन तीन अक्षय सामर्थ्यों से ( तान् त्रीन् लोकान् ) उन उत्तम, मध्यम और निकृष्ट तीनों प्रकार के लोकों को ( उत् जेषम् ) वश करूं ।
[ ४ ] सोमः ) सोम परमेश्वर जिस प्रकार ( चतुरक्षरेण ) अपनेः चार अक्षय दत्त या अ, उ, म् और अमात्र इन चार अक्षरों से ( चतुष्पदः ) चार चरणों वाले एवं जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय इन चार स्वरूप या चार स्थिति वाले ( पशून् साक्षात् द्रष्टा जीवात्माओं को ( उत् अजयत् ). अपने वश करता है उसी प्रकार मैं ( सोमः ) सर्वैश्वर्यवान् सबका प्रेरक होकर ( चतुरक्षरेण ) अपने चार अक्षय बल, चतुरग्ङ सेना या साम, दान. भेद और दण्ड इन चार उपायों द्वारा ( तान् पशून् ) उन पशुओं आदि को ऐश्वयों को या पशुओं के समान प्राणोप्रजीवी प्रजापुरुषों को ( उतु जेषम् ) विजय करूं ॥ शत० ५ । २ । २ । १७ ।।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
तापस ऋषिः । अग्न्यादयो मन्त्रोक्ताः देवताः । अत्यष्टिः । गान्धारः ॥
विषय
राजा प्रजा को और प्रजा राजा को निरन्तर बढ़ाया करें, इस विषय का उपदेश किया है ॥
भाषार्थ
हे राजन् ! (अग्निः) आप अग्नि के समान हो, जैसे आप (एकाक्षरेण) 'ओम्' इस ईश्वर के ज्ञापक एकाक्षर शब्द से एवं इस दैवी गायत्री छन्द के समान (प्राणम्) शरीरस्थ प्राण-वायु के समान जिस प्रजाजन को (उदजयत्) उत्कृष्ट नीति से ऊँचा उठाते हो, वैसे उसे मैं भी (उज्जेषम्) उत्कृष्ट नीति से ऊँचा उठाऊँ । हे (अश्विनौ) सूर्य और चन्द्रमा के समान राजा और राजपुरुषो ! आप जैसे--(द्य् क्षरेण) दैवी उष्णिक् छन्द के समान जिन (द्विपदः) दो पैरों वाले (मनुष्यान्) मननशील मनुष्यों को (उज्जयताम्) ऊँचा उठाते हो वैसे उन्हें मैं भी (उज्जेषम्) ऊँचा उठाऊँ। हे सर्वप्रधान पुरुष ! (विष्णुः) आप परमेश्वर के समान न्यायकारी हो, सो आप जैसे (त्र्यक्षरेण) दैवी अनुष्टुप् छन्द के समान जिन (त्रीन्) नाम, जन्म, स्थान रूप (लोकान्) दर्शनीय लोकों को (उदजयत्) उन्नत करते हो वैसे उन्हें मैं भी (उज्जेषम्) उन्नत करूँ। हे न्यायाधीश ! (सोमः) आप ऐश्वर्य के इच्छुक हो सो आप जैसे (चतुरक्षरेण) दैवी बृहती छन्द के समान जिन (चतुष्पदः) चार पैरों वाले हरिण आदि आरण्य पशुओं को (उदजयत्) बढ़ाते हो, वैसे उन्हें मैं भी (उज्जेषम्) बढ़ाऊँ ॥ ९। ३१॥
भावार्थ
यदि राजा सब प्रजाजनों की उन्नति चाहे तो प्रजाजन भी उसे क्यों न बढ़ावें। यदि राजा उन्नति न चाहे तो प्रजा भी उसको न बढ़ावे ॥ ९ । ३१ ॥
प्रमाणार्थ
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५।२। २। १७) में की गई है ॥९ । ३१ ॥
भाष्यसार
राजा और प्रजा परस्पर को बढ़ावें--राजा अग्नि के समान बढ़ने वाला होता है वह एक अक्षर वाले दैवी गायत्री नामक 'ओम्' इस छन्द के दृष्टान्त से शरीरस्थ एक प्राण के समान प्रजाजन को उत्तम नीति से उन्नत करे, उसे बढ़ावे वैसे प्रजाजन भी राजा को उन्नत किया करे। राजा और राजपुरुष 'अश्विनौ' हैं, सूर्य और चन्द्र के समान उन्नत हैं। वे दोनों दो अक्षरों वाले दैवी उष्णिक् छन्द के समान दो चरणों वाले मनुष्यों को उत्तम नीति से उन्नत करें प्रजाजन भी उन्हें उन्नत किया करें॥
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्या राजामुळे प्रजेची सर्व प्रकारे उन्नती होते त्याला प्रजा मान्यता देते व जो राजा असे वागत नाही त्याला प्रजा कधीच मान देत नाही.
विषय
राजाने प्रजेला आणि प्रजेने राजाला सतत निरंतर उत्कर्षाकडे न्यावे -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (एक विद्वान प्रजाजन आपल्या राजास म्हणत आहे) हे राजन्, (अग्नि:) अग्नीप्रमाणे तेजस्वी असलेले आपण ज्याप्रमाणे (एकाक्षरेण) जागृत करणारा एकाक्षणी जो गायत्री छंद आहे, त्याद्वारे (प्राणम्) शरीरात जसे प्राण तसे जो मंत्र प्रजाजनांना (उत्) (जेषम्) उत्तमप्रकारे (अजयत्) उत्सषप्रित नेतो, त्याप्रमाणे (तम्) त्या गायत्री मंत्राला मी देखील (उत्) (जेषम्) स्वत: आपल्या उत्कर्षासाठी धारण करतो. हे राजन् आणि हे प्रजाजनहो, (अश्विनौ) ज्याप्रमाणे सूर्य आणि चंद्रासम आपण (प्रजेला मुखदायक असून) (द़ृयक्षरेण) दोन अक्षरी दैवी उष्णिक् छंदाद्वारे (द्विपद:) दो पाय असणारे प्राणी म्हणजे (मनुष्यान्) मननशील प्राण्यांना (उज्जयताम्) उत्तम करता (श्रेष्ठ मनुष्य बनवता), त्याप्रमाणे मी देखील (तान्) त्यांना (उज्जेषम्) अधिक श्रेष्ठ बनवावे. हे सर्वप्रमुख पुरुष, (राजा) (विष्णु:) परमेश्वराप्रमाणे न्यायकारी आपण (त्र्यक्षरेण) तीन अक्षरी दैवीय अनुष्टुप् छंदाद्वारे (त्रीन्) जन्म, स्थान आणि नाम वाचक आणि (लोकान्) दर्शनीय लोकांना (स्थानांना) (उदजयत्) उत्तम करता, (अधिक प्रेक्षणीय करता) त्याप्रमाणे मी देखील (तान्) त्या स्थानांना (उज्जेषम्) अधिक सुंदर व प्रेक्षणीय करावे. (हे) सोम) ऐश्वर्याची कामना करणारे आपण ज्याप्रमाणे (चतुरक्षरेण) चार अक्षरी दैवी बृहती छंदाद्वारे (चतुष्पदे) हरण आदी वन्य पशूंना (उदयजत्) उत्तम करता (त्यांचे संरक्षण करून वृद्धीसाठी यत्न करता) त्याप्रमाणे मी देखील (तान्) त्या वन्य पशूंच्या वृद्धीसाठी (उज्जेयम्) अधिक यत्न करावे. (वेदातील गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप् आणि बृहतीछंद प्रजेत अनुक्रमे प्राणशक्ती, श्रेष्ठत्व, सौंदर्य आणि व्यन्य पशूं यांचा उत्कर्ष घडवितात) ॥31॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जो राजा सर्वदृष्ट्या प्रजेची उन्नती, प्रगती करतो, प्रजाजनांनी देखील आपल्या त्या राजाला सर्वप्रकारे सहकार्य द्यावे. जर राजा याविरूद्ध वागत असेल, तर त्यास सहकार्य देऊ नये. ॥31॥
टिप्पणी
(टीप : मूळ हिंदी भाष्यात या मंत्रातील ‘चतुरक्षेण’ ‘चतुष्पदे’ हे दोन शब्द तसेच त्यांचा अर्थ द्यायचा राहून गेला आहे. तो अर्थ संस्कृत भाष्याच्या आधारे मराठी अनुवादात चिन्हांकित स्थानावर लिहिला आहे)
इंग्लिश (3)
Meaning
O King, just as thou, with the monosyllabic Om elevatest thy subjects, so may I elevate them. Just as the King and his men like the sun and moon, with dissyllabic metre, elevate bipeds, so may I elevate them. Just as the just King, with trisyllabic metre elevates the three worlds, so may I elevate them. Just as a King desirous for prosperity, with quadrisyllable metre subdues the four-footed cattle, so may I subdue them.
Meaning
Agni, with one akshara, syllable, Om and Gayatri verse conquered prana, vitality. So should I win that. (The ruler, bright as Agni, should win the heart of the people with good policies and advance them. So should the people support him). The Ashwinis, sun and moon, with two-syllabic Ushnik verse, conquered the bipeds, humans. So should I win them. (The ruler and his officers should help and support the people. So should the people support them). The Ashwinis, sun and moon, with two-syllabic Ushnik verse, conquered the bipeds, humans. So should I win them. (The ruler and his officers should help and support the people. So should the people support them). The Ashwinis, sun and moon, with two-syllabic Ushnik verse, conquered the bipeds, humans. So should I win them. (The ruler and his officers should help and support the people. So should the people support them). Soma, with four-syllabic Brihati verse conquered the quadrupeds, animals. So should I win them (the ruler, eager for honour, should protect and promote the animals, wild as well as domestic. So should the people).
Translation
Agni (fire) conquered the vital breath with the onesyllable metre; may I conquer the same. (1) Asvinau (the twins divine) conquered men with two-syllable metre; may I conquer those. (2) Visnu (the sun) conquered the three worlds with three-syllable metre; may I conquer those. (3) Soma (the moon) conquered quadruped animals with four-syllable metre; may I conquer those. (4)
Notes
Here are the ujjitis, the Victory formulas which are to be recited by the sacrificer. Udajayat, conquered well. Uijesam, may I conquer.
बंगाली (1)
विषय
রাজা প্রজাঃ প্রজাশ্চ রাজানং সততং বর্দ্ধয়েয়ুরিত্যাহ ॥
রাজা প্রজাদিগকে এবং প্রজা রাজাকে নিরন্তর বৃদ্ধি করিতে থাকিবে । এই বিষয়ের উপদেশ পরবর্ত্তী মন্ত্রে করা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে রাজন্ ! (অগ্নিঃ) অগ্নির সমান বর্ত্তমান আপনি যেরূপ (একাক্ষরেণ) জাগ্রতময়ী এক অক্ষরের দৈবী গায়ত্রী ছন্দ দ্বারা (প্রাণম্) শরীরে স্থিত বায়ুসমান প্রজাগণকে (উত) (জেষম্) উত্তম নীতি দ্বারা (অজয়ৎ) উত্তম করেন সেইরূপ (তম্) তাহাকে আমিও (উৎ) (জেষম্) উত্তম করি । হে রাজ প্রজাগণ । (অশ্বিনৌ) সূর্য্য ও চন্দ্রের সমান আপনারা যেরূপ (দ্ব্যক্ষরেণ) দুই অক্ষরের দৈবী উষ্ণিক্ ছন্দ দ্বারা যে (দ্বিপদঃ) দুই পদযুক্ত (মনুষ্যান্) মননশীল মনুষ্যদিগকে (উজ্জয়তাম) উত্তম করেন সেইরূপ (তান্) তাহাদিগকে অমিও (উজ্জেষম্) উত্তম করি । হে সর্বপ্রধান পুরুষ ! (বিষ্ণুঃ) পরমেশ্বরের সমান ন্যায়কারী আপনারা যেরূপ (ত্র্যক্ষরেণ) তিন অক্ষরের দৈবী অনুষ্টপ্ ছন্দ দ্বারা যে (ত্রীণ্) জন্ম, স্থান ও নামবাচী (লোকান্) দেখিবার যোগ্য লোকসমূহকে (উদজয়েৎ) উত্তম করেন সেইরূপ (তান্) তাহাদিগকে আমিও (উজ্জেষম্) উত্তম করি । হে (সোম) ঐশ্বর্য্যের আকাঙ্ক্ষাকারী ন্যায়াধীশ । আপনি যেরূপ (পশূন্) হরিণাদি পশুসকলকে (উদজয়ৎ) উত্তম করেন সেরূপ (তান্) তাহাদিগকে আমিও (উজ্জেয়ম্) উত্তম করি ॥ ৩১ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে রাজা সব প্রজাদিগকে উত্তম প্রকার বৃদ্ধি করায় তাহা হইলে তাহাকেও প্রজাগণ কেন বৃদ্ধি করাইবে না এবং এইরূপ যে করিবে না তাহাকেও প্রজারা কখনও বৃদ্ধি করাইবে না ॥ ৩১ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
অ॒গ্নিরেকা॑ক্ষরেণ প্রা॒ণমুদ॑জয়॒ৎ তমুজ্জে॑ষম॒শ্বিনৌ॒ দ্ব্য᳖ক্ষরেণ দ্বি॒পদো॑ মনু॒ষ্যা᳕নুদ॑জয়তাং॒ তানুজ্জে॑ষং॒ বিষ্ণু॒স্ত্র্য᳖ক্ষরেণ॒ ত্রীল্ঁলো॒কানুদ॑জয়॒ৎ তানুজ্জে॑ষং॒ꣳ সোম॒শ্চতু॑রক্ষরেণ॒ চতু॑ষ্পদঃ প॒শূনুদ॑জয়॒ৎ তানুজ্জে॑ষম্ ॥ ৩১ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
অগ্নিরেকেত্যস্য তাপস ঋষিঃ । অগ্ন্যাদয়ো মন্ত্রোক্তা দেবতাঃ । স্বরাডতিধৃতিশ্ছন্দঃ । ষড্জঃ স্বরঃ ॥
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