यजुर्वेद - अध्याय 9/ मन्त्र 33
ऋषिः - तापस ऋषिः
देवता - मित्रादयो मन्त्रोक्ता देवताः
छन्दः - कृति,
स्वरः - निषादः
97
मि॒त्रो नवा॑क्षरेण त्रि॒वृत॒ꣳ स्तोम॒मुद॑जय॒त् तमुज्जे॑षं॒ वरु॑णो॒ दशा॑क्षरेण वि॒राज॒मुद॑जय॒त् तामुज्जे॑ष॒मिन्द्र॒ऽएका॑दशाक्षरेण त्रि॒ष्टुभ॒मुद॑जय॒त् तामुज्जे॑षं॒ विश्वे॑ दे॒वा द्वाद॑शाक्षरेण॒ जग॑ती॒मुद॑जयँ॒स्तामुज्जे॑षम्॥३३॥
स्वर सहित पद पाठमि॒त्रः। नवा॑क्षरे॒णेति॒ नव॑ऽअक्षरेण। त्रि॒वृत॒मिति॒ त्रि॒ऽवृत॑म्। स्तोम॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। तम्। उत्। जे॒ष॒म्। वरु॑णः। दशा॑क्षरे॒णेति॒ दश॑ऽअक्षरेण। वि॒राज॒मिति॒ वि॒ऽराज॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म्। इन्द्रः॑। एका॑दशाक्षरे॒णेत्येका॑दशऽअक्षरेण। त्रि॒ष्टुभ॑म्। त्रि॒स्तुभ॒मिति॑ त्रि॒ऽस्तुभ॑म्। उत्। अ॒ज॒य॒त्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म्। विश्वे॑। दे॒वाः। द्वाद॑शाक्षरे॒णेति॒ द्वाद॑शऽअक्षरेण। जग॑तीम्। उत्। अ॒ज॒य॒न्। ताम्। उत्। जे॒ष॒म् ॥३३॥
स्वर रहित मन्त्र
मित्रो नवाक्षरेण त्रिवृतँ स्तोममुदजयत्तमुज्जेषँवरुणो दशाक्षरेण विराजमुदजयत्तामुज्जेषमिन्द्र ऽएकादशाक्षरेण त्रिष्टुभमुदजयत्तामुज्जेषँविश्वे देवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुदजयँस्तामुज्जेषम् ॥
स्वर रहित पद पाठ
मित्रः। नवाक्षरेणेति नवऽअक्षरेण। त्रिवृतमिति त्रिऽवृतम्। स्तोमम्। उत्। अजयत्। तम्। उत्। जेषम्। वरुणः। दशाक्षरेणेति दशऽअक्षरेण। विराजमिति विऽराजम्। उत्। अजयत्। ताम्। उत्। जेषम्। इन्द्रः। एकादशाक्षरेणेत्येकादशऽअक्षरेण। त्रिष्टुभम्। त्रिस्तुभमिति त्रिऽस्तुभम्। उत्। अजयत्। ताम्। उत्। जेषम्। विश्वे। देवाः। द्वादशाक्षरेणेति द्वादशऽअक्षरेण। जगतीम्। उत्। अजयन्। ताम्। उत्। जेषम्॥३३॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
राज्ञः सत्याचाराऽनुकरणं प्रजया प्रजयाश्च राज्ञा कार्य्यमित्याह॥
अन्वयः
हे राजन्! मित्रो भवान् यथा नवाक्षरेण छन्दसा यं त्रिवृतं स्तोममुदजयत्, तथा तमहमप्युज्जेषम्। हे प्रशंसनीय सभेश! वरुणो भवान् यथा दशाक्षरेण छन्दसा यां विराजमुदजयत्, तथाहमप्युज्जेषम्। हे परमैश्वर्यप्रदेन्द्रो भवान् यथैकादशाक्षरेण यां त्रिष्टुभमुदजयत् तथा तामहमप्युज्जेषम्। हे सभाजना विश्वे देवाः! भवन्तो यथा द्वादशाक्षरेण यां जगतीमुदजयँस्तामहमप्युज्जेषम्॥३३॥
पदार्थः
(मित्रः) सर्वस्य सुहृत् (नवाक्षरेण) याजुष्या बृहत्या (त्रिवृतम्) कर्मोपासनाज्ञानयुक्तम् (स्तोमम्) स्तोतुं योग्यम् (उत्) (अजयत्) (तम्) (उत्) (जेषम्) (वरुणः) श्रेष्ठः (दशाक्षरेण) याजुष्या पङ्क्त्या (विराजम्) विराट्छन्दोवाच्यम् (उत्) (अजयत्) (ताम्) (उत्) (जेषम्) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (एकादशाक्षरेण) आसुर्य्या पङ्क्त्या (त्रिष्टुभम्) त्रिष्टुप्छन्दोवाच्यम् (उत्) (अजयन्) (ताम्) (उत्) (जेषम्) (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (द्वादशाक्षरेण) साम्न्या गायत्र्या (जगतीम्) एतच्छन्दोऽभिहितां नीतिम् (उत्) (अजयन्) (ताम्) (उत्) (जेषम्)॥३३॥
भावार्थः
राजजनाः सर्वेषु प्राणिषु मैत्रीं विधाय सुशिक्षयोत्कृष्टान् विदुषः सम्पादयेयुर्यतस्ते ऐश्वर्य्यभागिनो भूत्वा राजभक्ता भवेयुः॥३३॥
विषयः
राज्ञः सत्याचाराऽनुकरणं प्रजया, प्रजायाश्च राज्ञा कार्य्यमित्याह ॥
सपदार्थान्वयः
हे राजन् ! मित्रः सर्वस्य सुहृत् भवान् यथा नवाक्षरेण याजुष्या बृहत्या छन्दसा यं त्रिवृत्तं कर्मोपासनाज्ञानयुक्तं स्तोमं स्तोतुं योग्यम् उदजयत्तथा तमहमप्युज्जेषम् । हे प्रशंसनीय सभेश ! वरुणः श्रेष्ठ: भवान् यथा दशाक्षरेण याजुष्या पङ्क्त्या छन्दसायां विराजं विराट्छन्दोवाच्यम् उदजयेत्तथा [ताम्] अहमप्युज्जेषम् । हे परमैश्वर्यप्रद ! इन्द्रः परमैश्वर्यवान् भवान् यथैकादशाक्षरेण आसुर्या पङ्क्त्या यां त्रिष्टुभं त्रिष्टुप्छन्दो वाच्यम् उदजयत्तथा तामहमप्युज्जेषम् । हे सभाजनाः ! विश्वे सर्वेदेवाः विद्वांसः भवन्तो यथा द्वादशाक्षरेण साम्न्या गायत्र्या यांजगतीम् एतच्छन्दोऽभिहितां नीतिम् उदजयँस्तामहमप्युज्जेषम् ।। ९ । ३३ ।। [हे राजन् ! मित्रो भवान् यथा नवाक्षरेण छन्दसा यं त्रिवृत्तं स्तोममुदजयत्तथा तमहमप्युज्जेषम्]
पदार्थः
(मित्रः) सर्वस्य सुहृत् (नवाक्षरेण) याजुष्या बृहत्या (त्रिवृतम्) कर्मोपासनाज्ञानयुक्तम् (स्तोमम्) स्तोतुं योग्यम् (उत्) (अजयत्) (तम्) (उत्) (जेषम्) (वरुणः) श्रेष्ठ: (दशाक्षरेण) याजुष्या पंक्त्या (विराजम्) विराट्छन्दोवाच्यम् (उत्) (अजयत्) (ताम्) (उत्) (जेषम्) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (एकादशाक्षरेण) आसुर्य्या पंक्त्या (त्रिष्टुभम्) त्रिष्टुप्छन्दो वाच्यम् (उत्) (अजयत्) (ताम्) (उत्) (जेषम्) (विश्वे) सर्वे (देवा:) विद्वांसः (द्वादशाक्षरेण) साम्न्या गायत्र्या (जगतीम्) एतच्छन्दोऽभिहितां नीतिम् (उत्) (अजयन्) (ताम्) (उत्) (जेषम्) ॥ ३३ ॥
भावार्थः
राजजना: सर्वेषु प्राणिषु मैत्रीं विधाय सुशिक्षयोत्कृष्टान् विदुषः सम्पादयेयुर्यतस्ते ऐश्वर्यभागिनो भूत्वा राजभक्ता भवेयुः ॥९ । ३३ ॥
विशेषः
तापसः । मित्रादयो मन्त्रोक्ताः=स्पष्टम् ॥ कृतिः । निषादः ।।
हिन्दी (4)
विषय
राजा के सत्याचार के अनुसार प्रजा और प्रजा के अनुसार राजा करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे राजन्! (मित्रः) सब के हितकारी आप जैसे (नवाक्षरेण) नव अक्षर की याजुषी बृहती से जिस (त्रिवृतम्) कर्म्म, उपासना और ज्ञान के (स्तोमम्) स्तुति के योग्य को (उदजयत्) उत्तमता से जानते हो, वैसे (तम्) उसको मैं भी (उज्जेषम्) अच्छे प्रकार जानूं। हे प्रशंसा के योग्य सभेश! (वरुणः) सब प्रकार से श्रेष्ठ आप (दशाक्षरेण) दश अक्षरों की याजुषी पङ्क्ति से जिस (विराजम्) विराट् छन्द से प्रतिपादित अर्थ को (उदजयत्) प्राप्त हुए हो, वैसे (ताम्) उसको मैं भी (उज्जेषम्) प्राप्त होऊं (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य्य देने वाले आप जैसे (एकादशाक्षरेण) ग्यारह अक्षरों की आसुरी पङ्क्ति से जिस (त्रिष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्दवाची को (उदजयत्) अच्छे प्रकार जानते हो, वैसे (ताम्) उसको मैं भी (उज्जेषम्) अच्छे प्रकार जानूं। हे सभ्य जनो (विश्वे) सब (देवाः) विद्वानो! आप जैसे (द्वादशाक्षरेण) बारह अक्षरों की साम्नी गायत्री से जिस (जगतीम्) जगती से कही हुई नीति का (उदजयन्) प्रचार करते हो, वैसे (ताम्) उसको मैं भी (उज्जेषम्) प्रचार करूं॥३३॥
भावार्थ
राजपुरुषों को चाहिये कि सब प्राणियों में मित्रता से अच्छे प्रकार शिक्षा कर इन प्रजाजनों को उत्तम गुणयुक्त विद्वान् करें, जिससे ये ऐश्वर्य्य के भागी होकर राजभक्त हों॥३३॥
विषय
मित्र — वरुण — इन्द्र — विश्वेदेवाः
पदार्थ
१. ( मित्रः ) = [ प्रमीतेः त्रायते ] मृत्यु से अपने को बचानेवाला ( नवाक्षरेण ) = नौ व्यापक तत्त्वों के हेतु से—[ पाँच ज्ञानेन्द्रियों व पाँच कर्मेन्द्रियों में जिह्वा के दोनों ओर होने से कुल नौ ही गिनते हैं ] इन नौ इन्द्रियों की शक्ति के हेतु से ( त्रिवृतं स्तोमम् ) = त्रिगुणित ‘सत्त्व, रज व तम्’ अथवा वात, पित्त व कफ़ इन गुणों के समुदाय को ( उदजयत् ) = जीत लेता है। ( तम् ) = उस ‘त्रिगुणित गुण समुदाय’ को मैं भी ( उज्जेषम् ) = जीतनेवाला बनूँ। ‘सत्त्व, रज व तम्’ ‘स्तोम’ इसलिए हैं कि ये परस्पर मिले होते हैं और ‘उत्तम, मध्यम, निकृष्ट’ भेद से त्रिगुणित होकर ये नौ हो जाते हैं। इनके ठीक कार्य करने पर सब इन्द्रियाँ ठीक रहती हैं। इन्द्रियों का ठीक रहना ही स्वास्थ्य है, रोगों से बचना है। एवं, ( मित्र ) = रोगों से अपने को बचानेवाला इस त्रिवृत् स्तोम को जीतने का ध्यान करता है।
२. ( वरुणः ) = श्रेष्ठ अथवा [ वारयति ] रोगों का निवारण करनेवाला, रोगों को उत्पन्न ही न होने देनेवाला ( दशाक्षरेण ) = दस व्यापक तत्त्वों के द्वारा अर्थात् ‘प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान—नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय’ इन दस प्राणशक्तियों की साधना के द्वारा ( विराजम् ) = विशिष्ट दीप्ति को ( उदजयत् ) = जीतता है ( ताम् ) = उस विशिष्ट दीप्ति को ( उज्जेषम् ) = मैं भी विजय करूँ। वस्तुतः प्राणशक्ति से ही रोग-निवारण सम्भव होता है और इस रोग-निवारण का परिणाम ‘स्वास्थ्य की दीप्ति’ है, उसे ही यहाँ ‘विराज्’ कहा गया है।
३. ( इन्द्रः ) = सब इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव ( एकादशाक्षरेण ) = दस इन्द्रियाँ व ग्यारहवें मन की व्यापक शक्ति के द्वारा ( त्रिष्टुभम् ) = काम, क्रोध व लोभ के रोकने को [ स्तुभ् = stop ] ( उदजयत् ) = जीतता है, अर्थात् काम, क्रोध व लोभ को अपने में प्रवेश नहीं करने देता। ( ताम् ) = इस त्रिष्टुभ् को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीतूँ अर्थात् काम-क्रोधादि को अपने में उत्पन्न न होने दूँ। वैयक्तिक साधना के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है।
४. अब इन्द्र अर्थात् कामादि शत्रुओं का विद्रावण करनेवाला बनकर मैं ‘विश्वेदेवाः’ बनता हूँ। सब दिव्य गुणों को अपना पाता हूँ। ( द्वादशाक्षरेण ) = दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन बारह व्यापक शक्तियों के द्वारा ( जगतीम् ) = सारे लोक को ( उदजयन् ) = जीत लेते हैं, ( ताम् ) = उस जगती को ( उज्जेषम् ) = मैं भी जीतनेवाला बनूँ। मनुष्य मन को वश में करके काम-क्रोधादि को जीतकर शान्ति प्राप्त करता है और बुद्धि का सम्पादन होने पर वह सारे व्यवहार को बुद्धिपूर्वक करता हुआ सारे लोक को अनुकूल बना पाता है। ऐसा कर लेने पर उसमें सब दिव्य गुणों का वास होता है।
५. [ क ] मन्त्र के कर्तृपदों का बोध यह है कि रोगों से अपने को बचाना, अर्थात् रोगों के साथ संघर्ष करके उनपर विजय पाना आवश्यक है। [ ख ] उससे भी उत्तम यह है कि हम वरुण बनें, रोगों को आने ही न दें। [ ग ] इन उद्देश्यों से हम ( इन्द्र ) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता बनें और काम आदि आसुर वृत्तियों का विद्रावण करनेवाले हों। इन वृत्तियों को दूर करके हम [ घ ] ( विश्वेदेवाः ) = सब दिव्य गुणों को अपने में विकसित करें।
६. कर्मपदों का बोध इस रूप में है कि [ क ] परस्पर सम्बद्ध सत्त्व, रज व तम के स्तोमों को जीतकर हम [ ख ] नीरोग बनकर विशिष्ट दीप्तिवाले हों। शारीरिक दृष्टि से हम स्वास्थ्य की चमकवाले हों। [ ग ] अब काम, क्रोध व लोभ को जीतकर इन्हें अपने से पूर्णरूप से दूर करके [ घ ] सम्पूर्ण जगती के प्रिय बनें।
७. करणपदों का बोध यह है कि हम [ क ] सब इन्द्रियों के स्वास्थ्य का सम्पादन करें। [ ख ] दश प्राणों को स्वाधीन करें। [ ग ] इन्द्रियरूप घोड़ों को मनरूप लगाम द्वारा वशीभूत करके [ घ ] मनरूप लगाम को भी बुद्धिरूप सारथि द्वारा थामनेवाले हों, अर्थात् हमारे जीवनों में बुद्धि का सर्वोपरि महत्त्व हो।
भावार्थ
भावार्थ — हम क्रमशः ‘मित्र, वरुण, इन्द्र व विश्वेदेवाः’ बनने का यत्न करें।
विषय
१७प्रकार के अक्षय बलों से राष्ट्र का वशीकार ।
भावार्थ
[९] ( मित्रः ) सब का स्नेही, एवं स्नेहपान यह मुख्य प्राण ( नवा- क्षरेण ) अपने नव-द्वारों में स्थित अक्षय सामर्थ्य से ( त्रिवृतं स्तोमम् ) त्रिवृत् स्तोम अर्थात् नव द्वारों में विद्यमान नवों प्राणों को ( उद् अजयत् ) अपने वश करता है और जिस प्रकार ( मित्रः ) सर्वस्नेही तपस्वी, ब्राह्मण नवाक्षरेण ) नवों द्वारों में अक्षर अर्थात् अस्वलित रूप से विद्यमान वीर्य द्वारा ( त्रिवृतं स्तोमम् ) त्रिगुण सामर्थ्य से पालन करता है या जिस प्रकार ( मित्रः ) सब का स्नेही परमेश्वर ( नवाक्षरेण ) अपने अक्षय नव प्रकार के सामर्थ्यों से अष्ट वसु और नव कुमार एवं नवधा देवसर्गों को ( उत् अजयत् ) रचता और वश करता है उसी प्रकार मैं ( मित्र: ) समस्त प्रजा का मित्र राष्ट्रपति राजा ( नव-अक्षरेण ) अपने नवों प्रकार के अक्षय कोशों से ( त्रिवृतं स्तोमम् ) मौल, भृत्य और मित्र बल तीनों को ( उत् जेषम् ) वश करूं ॥
[१०] (वरुणः ) वरुण सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर जिस प्रकार ( विराजम् ) विराट् प्रकृति को ( दशाक्षरेण ) पांच स्थूल और पांच सूक्ष्म भूतों द्वारा विभक्त करके उसे अपने ( उद् अजयत् ) वश में रखता है या ( वरुणः ) समस्त अंगों के वरण करने में समर्थ योगी अपने दशविध प्राण-बल से अपने ( विराजम् ) विविध प्रकाशमान् चिति शक्ति पर वश करता है या जिस प्रकार 'वरुण' मुख्य प्राण दशविध इन्द्रियों से विराट्=अन्न को अपने भीतर ग्रहण करता है उसी प्रकार मैं विजिगीषु ( वरुणः ) सब से श्रेष्ठ प्रजा द्वारा राजा वरा जाकर ( दश अक्षरेण ) अपने दसों प्रकार के दशावरा परिषद् के सदस्यों द्वारा ही ( विराजम् ) विविध ऐश्वयों से प्रकाशमान या राजा रहित राज्यव्यवस्था को या पृथिवी को ( उत् जेषम् ). वश करूं ॥
[११] ( इन्दः ) इन्द्र, ऐश्वर्यवान् परमेश्वर जिस प्रकार ( एकादश अक्षरेण ) अपने ११ रुद्र रूप सामर्थ्यों से ( त्रैष्टुभम् ) त्रिलोकी को ( उत अजयत् ) वश करता है, अथवा ( इन्द्रः ) जीव जिस प्रकार दश इन्द्रिय और ११वां मन इनसे ( त्रैष्टुभम् ) तीन प्रकार से स्थित मन इन्द्रिय, शरीर को वश करता है उसी प्रकार मैं ( इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् होकर ( एकादश- अक्षरेण ) दश सदस्य और ११वां सभापति द्वारा या शत्रुओं को हरानेवाले ११ मुख्य सेनापतियों द्वारा ( त्रैष्टुभम् ) अपने मित्र, शत्रु, उदासीन इन तीन प्रकार के राजन्य बलों को ( उद् जेषम् ) वश करूं ||
१२] ( विश्वेदेवाः ) समस्त देवगण, विद्वान् और उनका स्वामी प्रजापति इसी प्रकार जैसे ( विश्वे देवाः ) समस्त देव- किरणगण और उनका पुञ्ज सूर्य ( द्वादश- अक्षरेण ) १२ अक्षय शक्ति, १२ मासों से ( जगतीम् ) जगती इस पृथिवी को अपने वश करते हैं और जिस प्रकार ( विश्वेदेवा: ) समस्त प्रागण १२ विभागों में विभक्र प्राणों द्वारा गमन- शील शरीर को वश रखती है उसी प्रकार में ( विश्वे देवा: ) समस्त राज- पुरुषों पर अधिकारस्वरूप होकर ( द्वादश-अक्षरेण ) १२ अक्षय अर्थात् प्रबल सहायकों द्वारा ( ताम् उत् जेषम् ) उस पृथिवी के ऊपर बसे वैश्यों की व्यवहार नीति को और पृथिवी को वश करूं ।
विषय
राजा के सत्याचार का अनुकरण प्रजा और प्रजा के सत्याचार का अनुकरण राजा किया करे, यह उपदेश किया है ॥
भाषार्थ
हे राजन् ! आप (मित्र:) सब प्राणियों के मित्र हो, सो आप जैसे (नवाक्षरेण) नौ अक्षरों वाले याजुषी बृहती छन्द से जिस (त्रिवृत्तम्) कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों से युक्त (स्तोमम्) स्तुति योग्य विद्वान् को (उदजयत्) उत्कृष्ट करते हो (तम्) उसे मैं भी (उज्जेषम्) उत्कृष्ट करूँ। हे प्रशंसा के योग्य सभापते ! आप (वरुण:) श्रेष्ठ हो, सो आप जैसे (दशाक्षरेण) दस अक्षरों वाले याजुषी पंक्ति छन्द से तथा (विराजम्) विराट् छन्द से प्रतिपादित जिस नीति को (उदजयत्) उत्कृष्ट करते हो [ताम्] उसे मैं भी (उज्जेषम्) उत्कृष्ट करूँ । हे परम ऐश्वर्य के दाता राजन् ! आप (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान हो, सो आप जैसे (एकादशाक्षरेण) ग्यारह अक्षरों वाले आसुर्य पंक्ति छन्द से, तथा (त्रिष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्द से प्रतिपादित जिस नीति को (उदजयत्) उत्कृष्ट करते हो (ताम्) उसे मैं भी (उज्जेषम्) उत्कृष्ट करूँ । हे सभासदो ! आप (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् हो, सो आप लोग जैसे (द्वादशाक्षरेण)बारह अक्षरों वाले साम्नी गायत्री छन्द से तथा(जगतीम्) जगती छन्द से प्रतिपादित जिस नीति को (उदजयत्) उत्कृष्ट बनाते हो (ताम्) उसे मैं भी (उज्जेषम्) उत्कृष्ट बनाऊँ ॥ ९ । ३३ ॥
भावार्थ
राजपुरुष सब प्राणियों से मैत्री करके उत्तम शिक्षा के द्वारा उत्कृष्ट विद्वानों को तैयार करें, जिससे वे लोग ऐश्वर्य सम्पन्न होकर राजा के भक्त बनें ॥ ९ । ३३॥
भाष्यसार
राजा और प्रजा परस्पर सत्याचरण का अनुकरण करें--राजा सबका मित्र है। वह नौ अक्षरों वाले याजुषी बृहती छन्द से कर्म, उपासना और ज्ञान से युक्त विद्वान् को स्तुति के योग्य बनाता है, वैसे प्रजाजन भी राजा का अनुकरण किया करें। सभापति राजा प्रशंसा के योग्य एवं श्रेष्ठ (वरुण) है। वह दस अक्षरों वाली याजुषी पंक्ति छन्द के दृष्टान्त से जिस विराट् छन्द से प्रतिपादित राजनीति की उन्नत करता है, वैसे प्रजाजन भी राजा का अनुकरण किया करें। राजा स्वयं परम ऐश्वर्यवान् तथा परम ऐश्वर्य को देने वाला (इन्द्र) है । वह ग्यारह अक्षरों वाली आसुरी पंक्ति छन्द के दृष्टान्त से त्रिष्टुप छन्द से प्रतिपादित राजनीति को उन्नत करता है, वैसे प्रजाजन भी राजा का अनुकरण किया करें । सब विद्वान लोग सभ्य हों, और वे बारह अक्षरों वाली साम्नी गायत्री छन्द के दृष्टान्त से जगती छन्द से प्रतिपादित राजनीति को उन्नत करें वैसे प्रजाजन भी सभ्य विद्वानों का अनुकरण किया करें। राजपुरुष सब प्रजाजनों के साथ मैत्री करें और उन्हें उत्तम शिक्षा के द्वारा विद्वान् बनावें, जिससे वे ऐश्वर्य का सेवन करने वाले होकर राजभक्त रहें ॥९ । ३३ ॥
मराठी (2)
भावार्थ
राजपुरुषांनी सर्व प्राण्यांशी मैत्री करावी. चांगल्या प्रकारे शिक्षण देऊन प्रजेला उत्तम गुणांनी युक्त करावे व विद्वान बनवावे. त्यामुळे ते ऐश्वर्यसंपन्न बनून राजभक्त होतील.
विषय
प्रजेने राजाच्या सत्याचाराचे अनुकरण करावे आणि राजाने प्रजेच्या सदाचाराप्रमाणे वागावे, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (विद्वान प्रजाजन म्हणत आहे) हे राजन्, (मित्र:) सर्वांचे हितकारी आपण ज्याप्रमाणे (नवाक्षरेण) नऊ अक्षरी याजुषी बृहती छंदाद्वारे (त्रिवृतम्) कर्म, उपासना आणि ज्ञानाच्या (स्तोमम्) स्तुतियोग्य वा उपयुक्त अशा अर्थाला (उदजयत्) उत्तमप्रकारे जाणता, त्याप्रमाणे मी देखील (उज्जेषम्) उत्तमतेने जाणावे. हे प्रशंसनीय सभेष, (वरूण:) सर्वदृष्ट्या श्रेष्ठ असे आपण ज्याप्रमाणे (दशक्षरेण) दहा अक्षरी याजुषी पंक्ति नावाच्या छंदाद्वारे तसेच (विराजम्) विराट छंदाद्वारे प्रतिपादित अर्थाला (उदजयत्) जाणून घेता, त्याप्रमाणे (ताम्) त्या अर्थाला मी देखील (उज्जेषम्) प्राप्त करावे. (इन्द्र:) हे परमैश्वर्यशाली ज्याप्रमाणे आपण (एकादशाक्षरेण) अकरा अक्षरांच्या आसुरी पंक्तीद्वारे (त्रिष्टुभम्) त्रिष्टुप् छंदातील वाणी वा अर्थाला (उदजयत्) चांगल्याप्रकारे जाणता, त्याप्रमाणे मी देखील (ताम्) त्या वाणीला (उज्जेषम्) चांगल्याप्रकारे जाणता, त्याप्रमाणे मी देखील (ताम्) त्या वाणीला (उज्जेषम्) चांगल्याप्रकारे जाणावे. हे सभासदहो, हे (विश्वे) समस्त (देवा:) विद्वज्जनहो, ज्याप्रमाणे आपण (द्वादशाक्षरेण) बारा अक्षरी साम्नी गायत्रीद्वारे तसेच (जगतीम्) जगती छंदाद्वारे संगितलेल्या नीतीचा (उदस्पयत्) प्रसार करता, त्याप्रमाणे मी देखील (ताम्) त्या नीतीचा (उज्जेषम्) प्रचार-प्रसार करावा. (प्रजाजनांनीदेखील वेदांतील मंत्रात व्यक्त केलेल्या अर्थाचे अध्ययन, मनन करावे) ॥33॥
भावार्थ
भावार्थ - राजपुरुषांचे कर्तव्य आहे की सर्व प्रजाजनांमध्ये मित्रत्वभाव उत्पन्न करावा. त्यांना योग्य ते त्या संस्कारांचे शिक्षण देऊन उत्तमगुणयुक्त विद्वान करावे की ज्यामउळे ते सर्वजण ऐश्वर्यभागी होऊन राजभक्त होतील. ॥33॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O King, the friend of all, just as thou knowest, with nine-syllabic metre, Him, deserving of praise with the aid of knowledge, action and meditation; Him may I know. O praiseworthy King, just as thou, with decasyllabic metre knowest Him mentioned in virat verses, so may I also know Him. O’ giver of riches, just as thou with hendecasyllabic metre knowest Him mentioned in Trishtup verses, so may I also know Him. O 1 ye all learned persons, just as you with, dodecasyllabic metre, know the teaching conveyed in Jagati metre, so may I also know it.
Meaning
Mitra, universal friend of all, with nine-syllable yajushi brihati verse, won the three dimensional yajna of knowledge, action and worship. I too should accomplish the same. (The ruler should live an enlightened life of action and piety, and every citizen should follow the ruler and support him. )Varuna, the Supreme, worthy of choice, with the ten-syllable yajushi pankti verse, conquered the spirit and content of Virat, policy of sovereignty. I too should realize the same. (The ruler should honour the sovereignty of his office, commit himself to policies of eternal values and be the guardian of his people. The people should honour and follow him in his foot-steps. )Indra, Lord of glory, with eleven-syllable asurya pankti verse, won the spirit and content of trishtup, and I should realize the same. Indra, Lord of glory, with eleven-syllable asurya pankti verse, won the spirit and content of trishtup, and I should realize the same. (The ruler should pursue the values and policies of magnanimity and excellence, and the people should emulate and support him. )Vishve-devas, noble spirits of the world, with twelve-syllable gayatri verse, realized the spirit and content of jagati, and I should realize the same. (The ruler should commit himself to the highest policies of social life and universal good, and the people should follow and support him. )
Translation
Mitra (the friendly Lord) conquered the trivrta verse with the nine-syllable metre; may I conquer that. (1) Varuna (the venerable Lord) conquered Virat with the ten-syllable metre; may I conquer that. (2) Indra (the resplendent Lord) conquered tristubh with the eleven-syllable metre; may I conquer that. (3) Visvedevah (all the bounties of Nature) conquered jagati with the twelve syllable metre; may I conquer that. (4)
बंगाली (1)
विषय
রাজ্ঞঃ সত্যাচারাऽনুকরণং প্রজয়া প্রজয়াশ্চ রাজ্ঞা কার্য়্যমিত্যাহ ॥
রাজার সত্যাচার অনুযায়ী প্রজা এবং প্রজার অনুযায়ী রাজা করিবে । এই বিষয়কে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- হে রাজন্ ! (মিত্রঃ) সকলের হিতকারী আপনি যেরূপ (নবাক্ষরেণ) নব অক্ষরের যাজুষী বৃহতী দ্বারা যে (ত্রিবৃত্তম্) কর্ম উপাসনা ও জ্ঞানের (স্তোমম্) স্তুতিযোগ কে (উদজয়ৎ) উত্তমতাপূর্বক জানেন সেইরূপ (তম্) উহাকেও আমি (উজেষম্) সম্যক প্রকার জানি । হে প্রশংসার যোগ্য সভেশ । (বরুণঃ) সর্ব প্রকারে শ্রেষ্ঠ আপনি যেরূপ (দশাক্ষরেণ) দশ অক্ষরের যাজুষী পঙ্ক্তি দ্বারা যে (বিরাজম্) বিরাট ছন্দ দ্বারা প্রতিপাদিত অর্থকে (উদয়জৎ) প্রাপ্ত হইয়াছেন সে রূপ (তাম্) উহাকে আমিও (উজেষম্) প্রাপ্ত হই । (ইন্দ্রঃ) পরম ঐশ্বর্য্যদাতা আপনি যেরূপ (একাদশাক্ষরেণ) একাদশ অক্ষরের আসুরী পঙ্ক্তি দ্বারা যে (ত্রিষ্টুভম্) ত্রিষ্টুপ্ ছন্দবাচীকে (উদজয়ৎ) সম্যক্ প্রকার জানেন সেইরূপ (তাম্) উহাকে আমিও (উজেষম্) ভাল প্রকার জানি । হে সভ্যগণ! (বিশ্বে) সব (দেবাঃ) বিদ্বান্গণ ! আপনি যেরূপ দ্বাদশ অক্ষরের সাম্নী গায়ত্রী দ্বারা যে (জগতীম্) জগতী দ্বারা কথিত নীতির (উদজয়ৎ) প্রচার করেন সেরূপ (তাম্) উহাকে আমিও (উজেষম্) প্রচার করি ॥ ৩৩ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- রাজপুরুষদিগের উচিত সকল প্রাণীমধ্যে মিত্রতা দ্বারা উত্তম প্রকার শিক্ষা করিয়া প্রজাগণকে উত্তম গুণযুক্ত বিদ্বান্ করিবে যাহাতে ঐশ্বর্য্যের অংশগ্রহণ করিয়া রাজভক্ত হয় ॥ ৩৩ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
মি॒ত্রো নবা॑ক্ষরেণ ত্রি॒বৃত॒ꣳ স্তোম॒মুদ॑জয়॒ৎ তমুজ্জে॑ষং॒ বরু॑ণো॒ দশা॑ক্ষরেণ বি॒রাজ॒মুদ॑জয়॒ৎ তামুজ্জে॑ষ॒মিন্দ্র॒ऽএকা॑দশাক্ষরেণ ত্রি॒ষ্টুভ॒মুদ॑জয়॒ৎ তামুজ্জে॑ষং॒ বিশ্বে॑ দে॒বা দ্বাদ॑শাক্ষরেণ॒ জগ॑তী॒মুদ॑জয়ঁ॒স্তামুজ্জে॑ষম্ ॥ ৩৩ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
মিত্র ইত্যস্য তাপস ঋষিঃ । মিত্রাদয়ো মন্ত্রোক্তা দেবতাঃ । কৃতিশ্ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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