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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 13
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    187

    प्र॒जाप॑तिश्चरति॒ गर्भे॑ अ॒न्तरदृ॑श्यमानो बहु॒धा वि जा॑यते। अ॒र्धेन॒ विश्वं॒ भुव॑नं ज॒जान॒ यद॑स्या॒र्धं क॑त॒मः स के॒तुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र॒जाऽप॑ति: । च॒र॒ति॒ । गर्भे॑ । अ॒न्त: । अदृ॑श्यमान: । ब॒हु॒ऽधा । वि । जा॒य॒ते॒ । अ॒र्धेन॑ । विश्व॑म् । भुव॑नम् । ज॒जान॑ । यत् । अ॒स्य॒ । अ॒र्धम् । क॒त॒म: । स: । के॒तु: ॥८.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते। अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रजाऽपति: । चरति । गर्भे । अन्त: । अदृश्यमान: । बहुऽधा । वि । जायते । अर्धेन । विश्वम् । भुवनम् । जजान । यत् । अस्य । अर्धम् । कतम: । स: । केतु: ॥८.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 13
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    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (प्रजापतिः) प्रजा [सब जगत्] का पालनेवाला (गर्भे) गर्भ [गर्भरूप आत्मा] के (अन्तः) भीतर (चरति) विचरता है और (अदृश्यमानः) न दीखता हुआ वह (बहुधा) बहुत प्रकार (वि जायते) विशेष करके प्रकट होता है। उसने (अर्धेन) आधे खण्ड से (विश्वम्) सब (भुवनम्) अस्तित्व [जगत्] को (जजान) उत्पन्न किया, और (यत्) जो (अस्य) इस [ब्रह्म] का (अर्धम्) [दूसरा कारणरूप] आधा है, (सः) वह (कतमः) कौन सा (केतुः) चिह्न है ॥१३॥

    भावार्थ

    परमात्मा अज्ञानियों को नहीं दीखता, उसको विवेकी जन सूक्ष्मदृष्टि से सब के भीतर व्यापक पाते हैं। उसी ईश्वर की सामर्थ्य से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और उसी की शक्ति में अनन्त कारणरूप पदार्थ वर्तमान हैं ॥१३॥ इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध यजुर्वेद में है-अ० ३१। म० १९। और तीसरा पाद ऊपर मन्त्र ७ में आ चुका है ॥

    टिप्पणी

    १३−(प्रजापतिः) जगत्पालकः परमेश्वरः (चरति) विचरति (गर्भे) गर्भरूपे जीवात्मनि (अन्तः) मध्ये (अदृश्यमानः) अनीक्ष्यमाणः (बहुधा) अनेकविधम् (वि) विशेषेण (जायते) प्रादुर्भवति (कतमः) बहूनां मध्ये कः (सः) (केतुः) ज्ञापकः। बोधः। अन्यद् गतम्−म० ७ ॥

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    विषय

    कतमः-केतुः

    पदार्थ

    १. वह (प्रजापति:) = सब प्रजाओं का रक्षक प्रभु (गर्भे अन्तः चरति) = सब पदार्थों के अन्दर गतिवाला है-सबमें व्याप्त है। (अदृश्यमानः) = न देखा जाता हुआ-इन्द्रियों का विषय न होता हुआ वह प्रभु (बहुधा विजायते) = नाना रूपों से प्रादुर्भूत होता है। सूर्य और चन्द्र में वह 'प्रभा' रूप से, अग्नि में 'तेज' रूप से, पृथिवी में 'पुण्यगन्ध' रूप से, जलों में 'रस' रूप से तथा नरों में 'पौरूष' रूप से वही प्रकट हो रहा है। २. वे प्रभु (अर्धेन) = अपने एकदेश में स्थित इस प्रकृति से (विश्वं भुवनम्) = सम्पूर्ण भुवन को (जजान) = प्रादुर्भूत करते हैं। (यत्) = जो (अस्थ) = इस प्रभु का (अर्धम्) = इस प्रकृति से ऊपर जो समृद्धरूप है (स:) = वह (कतमः) = अत्यन्त आनन्दमय व (केतुः) = प्रकाशमय [A ray of light] है।

    भावार्थ

    वह प्रभु अदृश्य होते हुए भी प्रत्येक पदार्थ में अपनी महिमा से प्रादुर्भूत हो रहे हैं। यह सारा ब्रह्माण्ड प्रभु के एकदेश में जन्म व लयवाला होता है। प्रभु का अपना समृद्धरूप आनन्द व प्रकाशमय है।

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    भाषार्थ

    (प्रजापतिः) प्रजाओं का पति (गर्भे अन्तः) ब्रह्माण्ड के गर्भ के अन्दर (चरति) विचर रहा है, (अदृश्यमानः) न दीखता हुआ वह (बहुधा) बहुत प्रकार से (वि जायते) विविध रूपों में प्रकट होता है। (अर्धेन) निज एक समृद्ध-अंश से (विश्वम्) समग्र (भुवनम्) ब्रह्माण्ड को (जजान) उस ने पैदा किया है, (यद्) जो (अस्य) इस का (अर्धम्) अवशिष्ट समृद्ध अंश है (सः) वह (कतमः१) अत्यन्त सुखस्वरूप है, (केतुः) ज्ञानस्वरूप है।

    टिप्पणी

    [प्रजापतिः, देखो १०।७।४०, ४१। वि जायते = प्रजापतिरूप, पितृरूप, मातृरूप, बन्धुरूप आदि रूपों में वह प्रकट हो रहा है। अर्धेन, देखो (मन्त्र ७)। परमेश्वर के अङ्ग, कल्पनामात्र हैं, यथा "एकपाद्, त्रिपाद्, चतुष्पाद्” आदि। कतमः = "कम सुखनाम" (निघं० ३।६) + तमप्। केतुः = कित् संज्ञाने यथा “चिकेत”। तथा “केतुः प्रज्ञानाम" (निघं० ३।९)। अथवा कतमः = कौन सा वह है? वह प्रज्ञामय है। प्रज्ञानस्वरूप है।] [१. अथवा "प्रकृति, जीव, ब्रह्म" में से वह कौन सा है ? इस का उत्तर है "सः केतुः”, अर्थात् वह है "प्रज्ञास्वरूप, प्रज्ञानस्वरूप। प्रकृति और जीव प्रज्ञास्वरूप, प्रज्ञानस्वरूप नहीं है। केवल प्रजापति प्रज्ञास्वरूप, प्रज्ञानस्वरूप है।]

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    विषय

    ज्येष्ठ ब्रह्म का वर्णन।

    भावार्थ

    (गर्भे अन्तः) गर्भ के भीतर जिस प्रकार आत्मा (अदृश्यमानः) बिना दीखे ही (चरति) विचरता है और (बहुधा वि-जायते) बहुत प्रकार से नाना योनियों में नाना शरीर धारण कर उत्पन्न होता है उसी प्रकार (प्रजापतिः) प्रजा का पालक वह प्रभु (गर्भे अन्तः) इस हिरण्यगर्भ के भीतर (चरति) व्यापक है। और (अदृश्यमानः) स्वयं दृष्टिगोचर न होता हुआ भी (बहुधा) सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि रूपों में (विजायते) विविध शक्तियों के रूपों में प्रकट होता है। वह (अर्धेन) आधे, जड़ या प्रकृतिमय भाग से (विश्वं भुवनं जजान) समस्त कार्य जगत् को प्रकट करता है और (यत्) जो (अस्य) इसका (अर्धे) शेष अर्ध-आधा या परम समृद्ध रूप है (सः) वह (केतुः) ज्ञानमय पुरुष (कतमः) कौनसा है ? पता नहीं। अथवा (सः केतुः कतमः) वह ज्ञानमय पुरुष ‘क-तम’=अतिशय सुख स्वरूप है।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘अन्तर जायमानः’ इति यजु०। बहुधा प्रजायते, (तृ० च०) ‘अर्धेनेदं परि बभूव विश्वं मेतस्यार्धं किमुतञ्जनान।’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स ऋषिः। आत्मा देवता। १ उपरिष्टाद् बृहती, २ बृहतीगर्भा अनुष्टुप, ५ भुरिग् अनुष्टुप्, ७ पराबृहती, १० अनुष्टुब् गर्भा बृहती, ११ जगती, १२ पुरोबृहती त्रिष्टुब् गर्भा आर्षी पंक्तिः, १५ भुरिग् बृहती, २१, २३, २५, २९, ६, १४, १९, ३१-३३, ३७, ३८, ४१, ४३ अनुष्टुभः, २२ पुरोष्णिक्, २६ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुब्, ५७ भुरिग् बृहती, ३० भुरिक्, ३९ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप, ४२ विराड् गायत्री, ३, ४, ८, ९, १३, १६, १८, २०, २४, २८, २९, ३४, ३५, ३६, ४०, ४४ त्रिष्टुभः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    Prajapati pervades and vibrates in the vast spaces of the evolving, expansive universe, unseen, yet manifests in many ways. From and with a part of his potential, Prakrti, he creates the entire universe. What and what sort is the rest of it, what form, what identity, of all?

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    Translation

    The Lord of creation moves into the womb, unseen, he is born in various forms. With one half he creates the whole universe of his other half, what sign is there to indicate ?

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    Translation

    The Lord of Creatures exerts (His energy) with the inner-most part of the Universe (and thus) makes himself manifest in various ways (although) He is unborn (in His essence).Men devoted to the practice of spiritual communion perceive this force of His Creative agency all around them, verily all the worlds are moving within Him.

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    Translation

    God resides within the soul, Though Unseen, he exhibits Himself in various shapes like the Sun, Moon and Planets. He with one half engendered all creation. What sign is there to tell us of the other?

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(प्रजापतिः) जगत्पालकः परमेश्वरः (चरति) विचरति (गर्भे) गर्भरूपे जीवात्मनि (अन्तः) मध्ये (अदृश्यमानः) अनीक्ष्यमाणः (बहुधा) अनेकविधम् (वि) विशेषेण (जायते) प्रादुर्भवति (कतमः) बहूनां मध्ये कः (सः) (केतुः) ज्ञापकः। बोधः। अन्यद् गतम्−म० ७ ॥

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