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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 33
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    68

    अ॑पू॒र्वेणे॑षि॒ता वाच॒स्ता व॑दन्ति यथाय॒थम्। वद॑न्ती॒र्यत्र॒ गच्छ॑न्ति॒ तदा॑हु॒र्ब्राह्म॑णं म॒हत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒पू॒र्वेण॑ । इ॒षि॒ता: । वाच॑: । ता: । व॒द॒न्ति॒ । ता: । व॒द॒न्ति॒ । य॒था॒ऽय॒थम् । वद॑न्ती: । यत्र॑ । गच्छ॑न्ति । तत् । आ॒हु॒: । ब्रा॒ह्म॑णम् । म॒हत् ॥८.३३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्। वदन्तीर्यत्र गच्छन्ति तदाहुर्ब्राह्मणं महत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपूर्वेण । इषिता: । वाच: । ता: । वदन्ति । ता: । वदन्ति । यथाऽयथम् । वदन्ती: । यत्र । गच्छन्ति । तत् । आहु: । ब्राह्मणम् । महत् ॥८.३३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 33
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (अपूर्वेण) अपूर्व [कारणरहित परमात्मा करके] (इषिताः) भेजी हुई (ताः) वे (वाचः) वाचाएँ (यथायथम्) जैसे का तैसा (वदन्ति) बोलती हैं। (वदन्तीः) बोलती हुई वे [वाचाएँ] (यत्र) जहाँ (गच्छन्ति) पहुँचती हैं, (तत्) उसको (महत्) बड़ा (ब्राह्मणम्) ब्रह्मज्ञान (आहुः) वे [विद्वान्] बताते हैं ॥३३॥

    भावार्थ

    कारणशून्य परमात्मा ने वेद द्वारा सत्य धर्म का उपदेश किया है, और वे वेदवाणी परमात्मा का ही यथावत् ज्ञान जनाती हैं ॥३३॥

    टिप्पणी

    ३३−(अपूर्वेण) कारणशून्येन परमात्मा (इषिताः) प्रेरिताः (वाचः) वेदवाण्यः (ताः) प्रसिद्धाः (वदन्ति) कथयन्ति (यथायथम्) यथार्थम् (वदन्तीः) ज्ञापयन्तीः (यत्र) (गच्छन्ति) प्राप्नुवन्ति (तत्) (आहुः) ब्रुवन्ति (ब्राह्मणम्) म० २०। ब्रह्मज्ञानम् (महत्) बहु ॥

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    पदार्थ

    शब्दार्थ = ( अपूर्वेण ) = जिससे पूर्व कोई नहीं है सबका मूल कारण जो परमात्मा उससे  ( इषिताः ) = प्रेरित  ( वाचः ) = वेदवाणी है  ( यथायथम् ) = यथायोग्य अर्थात् यथार्थ बात को  ( ता: ) = वे  ( वदन्ति ) = कहती हैं ।  ( वदन्तीः ) = निरूपण करनेवाली वेदवाणियाँ  ( यत्र गच्छन्ति ) = जो-जो निरूपण करती हैं  ( तत् महत् ) = उस बड़े  ( ब्राह्मणम् ) = ब्रह्म को  ( आहुः ) = निरूपण करती हैं ।
     

    भावार्थ

    भावार्थ = परमात्मा सबका कारण और अनादि है। उससे पहले कोई भी न था। उस दयामय परमात्मा ने हम पर कृपा करके यथार्थ अर्थ के निरूपण करनेवाले-वेद प्रकट किये । वह वैदिक ज्ञान जहाँ-जहाँ प्रचार को प्राप्त हुआ उस-उस देश के पुरुषों को आस्तिक धार्मिक और ज्ञानी बना दिया। उन ज्ञानी पुरुषों ने ही यथाशक्ति वैदिक सभ्यता फैलाई । जिस सभ्यता का कुछ-कुछ प्रतिभास यूरोप, अमरीका, भारत आदि देशों में दिखाई देता है। यदि उन देशों में वैदिक ज्ञान पूरा-पूरा फैल जाए तो वे सब मनुष्य पूरे धार्मिक, आस्तिक और ज्ञानी बनकर अपने देशों का उद्धार कर सकें ।

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    विषय

    वेदों का अन्तिम प्रतिपाद्य विषय 'महद् ब्रह्म'

    पदार्थ

    १. (अपूर्वेण) = उस अपूर्व-कारणरहित प्रभु से [सदा से विद्यमान प्रभु से] (वाचः इषिता:) = ये वेदवाणियाँ प्रेरित की गई हैं। प्रभु ने इन्हें 'अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिराः' नामक ऋषियों के हृदयों में स्थापित किया है। (ता:) = वे वेदवाणियाँ (यथायथं वदन्ति) = सब पदार्थों का यथार्थ ज्ञान देती हैं-सब पदार्थों का ठीक-ठाक प्रतिपादन करती हैं। २. (वदन्ती:) = सब पदार्थों का ज्ञान देती हुई ये वेदवाणियाँ यन्त्र (गच्छन्ति) = अन्ततः जहाँ ये पहुँचती हैं (तत्) = उसी को (महत् ब्राह्मण आहुः) = महान् ब्राह्मण-महनीय जानी-ज्ञानस्वरूप प्रभु कहते हैं, अर्थात् इन वाणियों का अन्तिम प्रतिपाद्य विषय वे प्रभु ही हैं। ('सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति') तथा ('ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्') । सब ऋचाएँ अन्ततः प्रभु का ही प्रतिपादन करती हैं।

    भावार्थ

    अपूर्व प्रभु से प्रेरित ये वेदवाणियाँ सत्यज्ञान देती हुई अन्तत: प्रभु में विश्रान्त होती हैं।

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    भाषार्थ

    (अपूर्वेणः) अनादि परमेश्वर द्वारा (इषिताः) भेजी हुई (वाचः) वेदवाणियां हैं। (ताः) वे वेदवाणियां (यथायथम्) तत्त्वों को यथार्थ रूप में (वदन्तिः) प्रकट करती हैं। (वदन्तीः) प्रकट करती हुई (यत्र) जहां (गच्छन्ति) चली जाती हैं (तत्) उसे (आहुः) कहते हैं (महत् ब्राह्मणम्) महत् ब्रह्म या महत्-ब्रह्मवेत्ता, वेदवेत्ता।

    टिप्पणी

    [मन्त्र ३२ में "काव्यम्" कहा है। उसे ही मन्त्र ३३ में "वाचः" कहा है। परमेश्वर इन्हें मनुष्योपकारार्थ भेजता है। ये वस्तुओं का यथार्थ वर्णन करती हैं, और प्रलय में महत्-ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाती है। ब्राह्मणम् = ब्रह्म+अण् (स्वार्थे)। अथवा ब्रह्म = वेद। अतः वेदवेत्ता]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    Words inspired and revealed by ancient, eternal, unprecedented Brahma speak of Divinity and its powers and infinite potential as they are. And speaking, expressive and meaningful, where they ultimately retire, that they say is Supreme Brahma, highest of all.

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    Translation

    Those voices are inspired by the unpreceded one; these tell correctly as it is. Telling so where they go, that they call the great Lord supreme.

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    Translation

    The voices that are inspired by the Supreme Spirit before whom anything of the world was not, describe the things as they are. These voices describing the things in their fittest manner go whitherward that is called the Divinity. The revealer of the vedic speeches, by the seers.

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    Translation

    The Vedic verses revealed by God, preceded by none, speak nothing but Truth. Whither they go and speak, they say ‘God is great.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३३−(अपूर्वेण) कारणशून्येन परमात्मा (इषिताः) प्रेरिताः (वाचः) वेदवाण्यः (ताः) प्रसिद्धाः (वदन्ति) कथयन्ति (यथायथम्) यथार्थम् (वदन्तीः) ज्ञापयन्तीः (यत्र) (गच्छन्ति) प्राप्नुवन्ति (तत्) (आहुः) ब्रुवन्ति (ब्राह्मणम्) म० २०। ब्रह्मज्ञानम् (महत्) बहु ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    অপূর্বেণেষিতা বাচস্তা বদন্তি য়থায়থম্।

    বদন্তীর্য়ত্র গচ্ছন্তি তদাহুর্ব্রাহ্মণং মহৎ ।।৩১।।

    (অথর্ব ১০।৮।৩৩)

    পদার্থঃ (অপূর্বেণ) যাঁর পূর্বে কেউ নেই, সবকিছুর মূল কারণ যে পরমাত্মা, তাঁর থেকে (ইষিতাঃ) প্রেরিত (বাচঃ) যে বেদবাণী, (তাঃ) তা (য়থা য়থম্) যথাযোগ্য অর্থাৎ যথার্থ কথা (বদন্তি) বলে। (বদন্তীঃ) সমস্ত জ্ঞান প্রকাশকারী বেদবাণী (য়ত্র গচ্ছন্তি) যেখানে যেখানে পৌঁছায়, (তৎ মহৎ) সেখানে সর্বদাই সেই মহান (ব্রাহ্মণম্) ব্রহ্মকে (আহুঃ) নিরূপণ করে। 

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ পরমাত্মা সকলের কারণ আর অনাদি।  তাঁর আগে কেউ ছিল না। সেই দয়াময় পরমাত্মা আমাদের প্রতি কৃপা করে যথার্থ  নিরূপণকারী বেদ প্রকট করেছেন। সেই বৈদিক জ্ঞান যেখানে যেখানে প্রচার হয়েছে, সেই সেই দেশের পুরুষদের ধার্মিক আর জ্ঞানী বানিয়েছে। সেই জ্ঞানী পুরুষগণই যথাশক্তি বৈদিক সভ্যতা ছড়িয়েছেন ।।৩১।।

     

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