अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 25
ऋषिः - कुत्सः
देवता - आत्मा
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
152
बाला॒देक॑मणीय॒स्कमु॒तैकं॒ नेव॑ दृश्यते। ततः॒ परि॑ष्वजीयसी दे॒वता॒ सा मम॑ प्रि॒या ॥
स्वर सहित पद पाठबाला॑त् । एक॑म् । अ॒णी॒य॒:ऽकम् । उ॒त । एक॑म् । नऽइ॑व । दृ॒श्य॒ते॒ । तत॑: । परि॑ऽस्वजीयसी । दे॒वता॑ । सा । मम॑ । प्रि॒या ॥८.२५॥
स्वर रहित मन्त्र
बालादेकमणीयस्कमुतैकं नेव दृश्यते। ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया ॥
स्वर रहित पद पाठबालात् । एकम् । अणीय:ऽकम् । उत । एकम् । नऽइव । दृश्यते । तत: । परिऽस्वजीयसी । देवता । सा । मम । प्रिया ॥८.२५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।
पदार्थ
(एकम्) एक वस्तु (बालात्) बाल [केश] से (अणीयस्कम्) अधिक सूक्ष्म है, (उत) और (एकम्) एक वस्तु (नेव) नहीं भी (दृश्यते) दीखती है। (ततः) उस [बड़ी सूक्ष्म वस्तु] से (परिष्वजीयसी) अधिक चिपटनेवाला (सा) वह (देवता) देवता [परमेश्वर] (मम प्रिया) मेरा प्रिय है ॥२५॥
भावार्थ
परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होकर प्राणियों के भीतर रमकर उनको बल देता है, इसी से वह सब प्राणियों का प्रिय है ॥२५॥
टिप्पणी
२५−(बालात्) केशात् (एकम्) वस्तुमात्रम् (अणीयस्कम्) अनुतरम् (उत) अपि (एकम्) (नेव) इव अवधारणे। नैव (दृश्यते) अवलोक्यते (ततः) तस्मात् सूक्ष्मवस्तुसकाशात् (परिष्वजीयसी) परि+ष्वञ्ज आलिङ्गने−तृच्, ईयसुन्, ङीप्। तुरिष्ठेमेयःसु। पा० ६।४।१५४। तृचो लोपः। अधिकतरा परिष्वङ्क्त्री। आलिङ्गनशीला (देवता) देवः परमात्मा (सा) (मम) (प्रिया) हिता ॥
विषय
एक अणु, दूसरी अदृश्य-सी तथा तीसरी इनमें व्याप्त [तीन सत्ताएँ]
पदार्थ
१. (एकम्) = एक पुरुष [जीवात्मा] (बालात् अणीयस्कम्) = बाल से भी अत्यन्त सूक्ष्म [अणुपरिमाण] है ['बालानशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्याय कल्पते'-श्वे०] (उत) = और (एकम्) = प्रकृति (न इव दृश्यते) = नहीं-सी दिखती-सत्त्व, रज, तम की साम्यावस्थारूप वह प्रकृति भी अव्यक्त-सी रहती है। २. (ततः) = उन दोनों से भी सूक्ष्मतम (परिष्वजीयसी) = आलिंगन करती हुई-सर्वत्र व्याप्त होती हुई (देवता) = देवता है-प्रभु है। (सा मम प्रिया) = वही मेरी प्रीति का कारण बनती है। जब मैं प्रकृति से ऊपर उठकर उस देवता के सम्पर्क में आता हूँ तब एक अवर्णनीय आनन्द का अनुभव करता हूँ।
भावार्थ
आत्मा बाल से सूक्ष्मतर अणुपरिमाणवाला है। प्रकृति भी आँखों का विषय न बनती हुई अव्यक्त है। इनके अन्दर व्याप्त इनका आलिंगन करनेवाले देवता प्रभु हैं। वे ही मेरी प्रीति का कारण बनते हैं।
भाषार्थ
(एकम्) एक वस्तु जो कि (बालात्) बाल से (अणीयस्कम्) सूक्ष्म है, (उत) तथा (एकम्) एक वस्तु जो कि (न इव) न के सदृश (दृश्यते) दीखती है [वैसी वह] (देवता) देवता है। वह देवता (परिष्वजीयसी) सबको आलिङ्गन किये हुए है, (ततः) इसलिये (सा) वह (मम प्रिया) मेरी प्यारी है।
टिप्पणी
[पारमेश्वरी दिव्या माता बाल से भी सूक्ष्म है, तथा वह "न" के सदृश दीखती है, अनुभूत तो होती है परन्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। परन्तु उसने माता की तरह सब का आलिङ्गन किया हुआ है, अतः सर्वप्रिया वह माता, मुझे प्रिय है]।
विषय
ज्येष्ठ ब्रह्म का वर्णन।
भावार्थ
(एकम्) एक वस्तु जो (बालात्) बाल=केश से भी (अणीयस्कम्) अत्यन्त सूक्ष्म (उत एकम्) और वह भी एक हो तो वह (न इव दृश्यते) नहीं के समान दीखती है। तो फिर (ततः) जो उससे भी सूक्ष्म वस्तु के (परि-ष्वजीयसी) भीतर व्यापक अति सूक्ष्मतम (देवता) देव की जो सत्ता है (सा) वह (मम) मेरे (प्रिया) हृदय को तृप्त करती एवं प्रिय लगती है। मैं उसका उपासक हूं। जैसे श्वेताश्वतर उप० [५। ९] में— बालाग्रशत भागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ५। ७॥ बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रोऽप्यपरोऽपि दृष्टः॥ ५। ८॥ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्॥ क० उप० [ २। ६। ७ ] नैव वाचा न तपसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा॥ अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते। क० २। ६। १२॥ एक बाल को सौ हिस्सो में बांटा जाय, वह सौवां भाग जीव का परिमाण जानो। वह सूई के नोक के समान है। वह बुद्धि या आत्मा के ज्ञान गुण से देख लिया जा सकता है। इसी प्रकार सूक्ष्म परम आत्मा को भी समझो। उसका रूप दिखाई नहीं देता। उसे आंख से कोई भी नहीं देखता, न वाणी से कहा जा सकता है, न मनसे सोचा जा सकता है। केवल ‘है’ ऐसा कहने के अतिरिक्त और कुछ भी उसका जाना नहीं जा सकता। ह्विटनी ने इस मन्त्र में ‘बाल’ का अर्थ बच्चा किया है, सो उसकी बालबुद्धि पर हंसी आती है।
टिप्पणी
(प्र०) ‘आराग्रमात्रं ददृशे’ (तृ०) ‘अतः परि’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स ऋषिः। आत्मा देवता। १ उपरिष्टाद् बृहती, २ बृहतीगर्भा अनुष्टुप, ५ भुरिग् अनुष्टुप्, ७ पराबृहती, १० अनुष्टुब् गर्भा बृहती, ११ जगती, १२ पुरोबृहती त्रिष्टुब् गर्भा आर्षी पंक्तिः, १५ भुरिग् बृहती, २१, २३, २५, २९, ६, १४, १९, ३१-३३, ३७, ३८, ४१, ४३ अनुष्टुभः, २२ पुरोष्णिक्, २६ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुब्, ५७ भुरिग् बृहती, ३० भुरिक्, ३९ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप, ४२ विराड् गायत्री, ३, ४, ८, ९, १३, १६, १८, २०, २४, २८, २९, ३४, ३५, ३६, ४०, ४४ त्रिष्टुभः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jyeshtha Brahma
Meaning
Something is finer and subtler than a hair. And another something is still finer, so fine that it is hardly visible. Finer and subtler than even that, darling embraceable, is that Supreme Divinity to me, dear, inalienable. (Something finer and subtler than a hair is Prakrti which, as Prakrti, is subtler than any mutation of it in existential form. Another something which is not even visible may be interpreted as the individual soul. And the Supreme Divinity is Brahma, subtler than the subtlest. Refer Kathopanishad, 1,3, 10-11 and 2, 3, This interpretation follows from mantra 24: The uncountable gifts are gifts of Prakrti. The receiving beneficiary is the human soul in body. And the giver is the Supreme Brahma.)
Translation
There is one, that is finer even than a hair; also there is one, that is not visible at all (that is visible as if nothing). The deity, that embraces them firmly, is dear to me.
Translation
The one (i.e. the soul) is even subtler than hair (the infinitesimal of hair) and one (i.e. the matter) is invisible (in its essence) but the subtlest and the most pervading Divinity is the only object of my love and devotion.
Translation
One is yet finer than a hair, One is not even visible. Hence God, Who embraces the soul with firmer hold, is dear to me.
Footnote
The first ‘one’ refers to the soul. The second one’ refers to God*
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२५−(बालात्) केशात् (एकम्) वस्तुमात्रम् (अणीयस्कम्) अनुतरम् (उत) अपि (एकम्) (नेव) इव अवधारणे। नैव (दृश्यते) अवलोक्यते (ततः) तस्मात् सूक्ष्मवस्तुसकाशात् (परिष्वजीयसी) परि+ष्वञ्ज आलिङ्गने−तृच्, ईयसुन्, ङीप्। तुरिष्ठेमेयःसु। पा० ६।४।१५४। तृचो लोपः। अधिकतरा परिष्वङ्क्त्री। आलिङ्गनशीला (देवता) देवः परमात्मा (सा) (मम) (प्रिया) हिता ॥
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