Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 34
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    64

    यत्र॑ दे॒वाश्च॑ मनु॒ष्याश्चा॒रा नाभा॑विव श्रि॒ताः। अ॒पां त्वा॒ पुष्पं॑ पृच्छामि॒ यत्र॒ तन्मा॒यया॑ हि॒तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत्र॑ । दे॒वा: । च॒ । म॒नु॒ष्या᳡: । च॒ । अ॒रा: । नाभौ॑ऽइव । श्रि॒ता: । अ॒पाम् । त्वा॒ । पुष्प॑म् । पृ॒च्छा॒मि॒ । यत्र॑ । तत् । मा॒यया॑ । हि॒तम् ॥८.३४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्र देवाश्च मनुष्याश्चारा नाभाविव श्रिताः। अपां त्वा पुष्पं पृच्छामि यत्र तन्मायया हितम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत्र । देवा: । च । मनुष्या: । च । अरा: । नाभौऽइव । श्रिता: । अपाम् । त्वा । पुष्पम् । पृच्छामि । यत्र । तत् । मायया । हितम् ॥८.३४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 34
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्र) जिस [तन्मात्राओं के विकास] में (देवाः) दिव्य लोक वा पदार्थ (च) और (मनुष्याः) मनुष्य (च) भी (श्रिताः) आश्रित हैं, (इव) जैसे (नाभौ) [पहिये की] नाभि में (अराः) अरे [लगे होते हैं]। [हे विद्वान् !] (त्वा) तुझ से (अपाम्) व्यापक तन्मात्राओं के (पुष्पम्) पुष्प [फूल, विकास] को (पृच्छामि) पूछता हूँ, (यत्र) जिस [विकास] में (तत्) वह ब्रह्म (मायया) बुद्धि के साथ (हितम्) स्थित है ॥३४॥

    भावार्थ

    मनुष्य उस ब्रह्म का निश्चय करे, जो अन्तर्यामी होकर व्यापक सूक्ष्म तन्मात्राओं में चेष्टा देकर संयोग द्वारा स्थूल लोक और मनुष्य आदि के शरीर रचता है ॥३४॥

    टिप्पणी

    ३४−(यत्र) यस्मिन् पुष्पे (देवाः) दिव्यलोकाः पदार्था वा (च) (मनुष्याः) (च) (अराः) चक्रस्य नाभिनेम्योर्मध्यस्थानि काष्ठानि (नाभौ) चक्रमध्ये (इव) यथा (श्रिताः) स्थिताः (अपाम्) आपः=व्यापिकास्तन्मात्राः-दयानन्दभाष्ये, यजु० २७।२५। व्यापिकानां तन्मात्राणाम् (त्वा) विद्वांसम् (पुष्पम्) पुष्प विकाशे-अच्। विकाशम्। प्रादुर्भावम् (पृच्छामि) अहं जिज्ञासे (यत्र) यस्मिन् पुष्पे (तत्) प्रसिद्धं ब्रह्म (मायया) प्रज्ञया निघ० ३।९। (हितम्) धृतम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    अपां पुष्पम्

    पदार्थ

    १. (यत्र) = जिस प्रभु में (देवाः च मनुष्याः च) = देव और मनुष्य (श्रिता:) = उस प्रकार आश्रित हैं, (इव) = जैसे (नाभौ अरा:) = नाभि में आरे प्रतिष्ठित होते हैं। मैं उस (अपां पुष्पम्) = [आपो नारा इति प्रोक्ता:] नर-समूहों का पोषण करनेवाले प्रभु को (त्वा पृच्छामि) = तुझसे पूछता हूँ [शिष्य के नाते आचार्य से पूछता हूँ]। उस प्रभु को पूछता है. (यत्र) = जिनमें मायया हितम्-प्रकृति से धारण किया गया (तत्) = वह संसार आश्रित है।

    भावार्थ

    प्रभु में ही सब देव व मनुष्य आश्रित हैं। वे ही नर-समूहों का पोषण करनेवाले हैं। प्रभु में ही यह माया से धारण किया गया संसार आश्रित है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (यत्र) जिसमें (देवाः च) देव और (मनुष्याः च) मनुष्य (श्रिताः) आश्रय पाए हुए हैं (इव) जैसे कि (अराः) अरा [Spokes] (नाभौ) रथ की नाभि में आश्रय पाते हैं। (अपाम् पुष्पम्) जलों के उस पुष्प को (त्वा) तुझ से (पृच्छामि) मैं पूछता हूं (यत्र) जिस में कि (तत्) वह ब्रह्म (मायया) प्रज्ञा सहित (हितम्) निहित है, स्थित है।

    टिप्पणी

    [देवाः = सूर्यादि देव (यजु० १४।२०)। अपां पुष्पम् = कमल। यह जलों में पैदा होता है और जलों का पुष्प है। इसे मन्त्र ४३ में पुण्डरीक कहा है। मन्त्र ४३ में पुण्डरीक द्वारा हृदय-कमल१ का वर्णन हुआ है। इसमें ब्रह्म निज प्रज्ञा सहित स्थित है। शरीर में कई क्रियाएं अनिच्छापूर्वक हो रही है, यथा श्वास प्रश्वास, रक्त का संचार, भुक्तान्न का परिपाक आदि। ब्रह्म निजप्रज्ञा द्वारा इन क्रियाओं को करता रहता है। अतः हृदय में ब्रह्म मायासहित स्थित है। माया प्रज्ञानाम (निघं० ३।९)]।[१. आपः का अर्थ "रक्त" भी होता है। यथा (अथर्व० १०।२।११)। अतः “अपां पुष्पम्"= रक्त सम्बन्धी पुष्प=हृदय। अथवा आपः = प्रकृति, इसका पुष्प= विकसित जगत्। “पुष्प विकसने” (दिवादिः)।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ज्येष्ठ ब्रह्म का वर्णन।

    भावार्थ

    (यत्र) जिसमें (देवा: च) देव और (मनुष्याः च) मनुष्य सब (नाभौ अराः इव) नाभि या धुरा में अरों के समान (श्रिताः) आश्रित हैं। हे विद्वन् ! (त्वा) तुझ से मैं (अपां पुष्पं पृच्छामि) अपः समस्त जगत् के मूल प्रकृति के परिमाणुओं के अथवा समस्त कर्मों और ज्ञानों के ‘पुष्प’ अर्थात् पुष्ट करके जगत् रूप में व्यक्त करने वाले प्रकाशक या जगत् रूप कार्य फल के मूलभूत पुष्प=परम कारण ब्रह्म को पूछता हूं (यत्र) जिससे (तत्) वह जगत् रूप फल (मायया) माया प्रकृति के सूक्ष्म रूप में (हितम्) विद्यमान रहता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स ऋषिः। आत्मा देवता। १ उपरिष्टाद् बृहती, २ बृहतीगर्भा अनुष्टुप, ५ भुरिग् अनुष्टुप्, ७ पराबृहती, १० अनुष्टुब् गर्भा बृहती, ११ जगती, १२ पुरोबृहती त्रिष्टुब् गर्भा आर्षी पंक्तिः, १५ भुरिग् बृहती, २१, २३, २५, २९, ६, १४, १९, ३१-३३, ३७, ३८, ४१, ४३ अनुष्टुभः, २२ पुरोष्णिक्, २६ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुब्, ५७ भुरिग् बृहती, ३० भुरिक्, ३९ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप, ४२ विराड् गायत्री, ३, ४, ८, ९, १३, १६, १८, २०, २४, २८, २९, ३४, ३५, ३६, ४०, ४४ त्रिष्टुभः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    Wherein the Devas, divine powers of nature, and human beings stay in their place and function like spokes of a wheel fixed in the nave, that same central core, bloom of the dynamics of existence, abiding with its mysterious power within its mysterious manifestations, I ask of you.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Wherein the enlightened ones and the human beings are set “like spokes in the nave - I ask you that flower of waters and "where that has been placed enveloped ‘in illusion (māyayā hitam).

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    I ask you, O learned man! about that flower of the atoms(the world) wherein all the mighty forces of nature and mon are arranged like the spokes fitted in the nave and wherein that Supreme Being with the wisdom is hidden.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    In Whom the sages and ordinary mortals reside, as spokes are fastened j in the nave, of thee, O learned person, I ask of God, the most efficient Cause : of the universe, where He dwells in subtle Matter.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३४−(यत्र) यस्मिन् पुष्पे (देवाः) दिव्यलोकाः पदार्था वा (च) (मनुष्याः) (च) (अराः) चक्रस्य नाभिनेम्योर्मध्यस्थानि काष्ठानि (नाभौ) चक्रमध्ये (इव) यथा (श्रिताः) स्थिताः (अपाम्) आपः=व्यापिकास्तन्मात्राः-दयानन्दभाष्ये, यजु० २७।२५। व्यापिकानां तन्मात्राणाम् (त्वा) विद्वांसम् (पुष्पम्) पुष्प विकाशे-अच्। विकाशम्। प्रादुर्भावम् (पृच्छामि) अहं जिज्ञासे (यत्र) यस्मिन् पुष्पे (तत्) प्रसिद्धं ब्रह्म (मायया) प्रज्ञया निघ० ३।९। (हितम्) धृतम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top