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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 4
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    178

    द्वाद॑श प्र॒धय॑श्च॒क्रमेकं॒ त्रीणि॒ नभ्या॑नि॒ क उ॒ तच्चि॑केत। तत्राह॑ता॒स्त्रीणि॑ श॒तानि॑ श॒ङ्कवः॑ ष॒ष्टिश्च॒ खीला॒ अवि॑चाचला॒ ये ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    द्वाद॑श । प्र॒ऽधय॑: । च॒क्रम् । एक॑म् । त्रीणि॑ । नभ्या॑नि । क: । ऊं॒ इति॑ । तत् । चि॒के॒त॒ । तत्र॑ । आऽह॑ता: । त्रीणि॑ । श॒तानि॑ । श॒ङ्कव॑: । ष॒ष्टि: । च॒ । खीला॑: । अवि॑ऽचाचला: । ये ॥८.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तत्राहतास्त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश्च खीला अविचाचला ये ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    द्वादश । प्रऽधय: । चक्रम् । एकम् । त्रीणि । नभ्यानि । क: । ऊं इति । तत् । चिकेत । तत्र । आऽहता: । त्रीणि । शतानि । शङ्कव: । षष्टि: । च । खीला: । अविऽचाचला: । ये ॥८.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 4
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    हिन्दी (3)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (द्वादश) बारह (प्रधयः) प्रधि [पुट्ठी अर्थात् महीने], (एकम् चक्रम्) एक पहिया [वर्ष], (त्रीणि) तीन (नभ्यानि) नाभि के अङ्ग [ग्रीष्म, वर्षा और शीत] हैं, (कः उ) किसने ही (तत्) इस [मर्म] को (चिकेत) जाना है। (तत्र) उस [पहिये, वर्ष] में (त्रीणि) तीन (शतानि) सौ (च) और (षष्टिः) साठ (शङ्कवः) शङ्क [काँटे] और (खीलाः) खीले [बड़े-छोटे दिन] (आहताः) लगे हुए हैं, (ये) जो (अविचाचलाः) टेढ़े होकर विचल नहीं होते ॥४॥

    भावार्थ

    जैसे परमेश्वर ने अपने-अपने प्रयोजन के लिये वर्ष के महीने, ऋतुएँ और दिन आदि बनाये हैं, वैसे ही मनुष्य यान, विमान नौका आदि में कलायन्त्र आदि लगाकर जाना-आना आदि व्यवहार किया करें ॥४॥ यह मन्त्र भेद से ऋग्वेद में है−म० १। सू० १६४। म–० ४८, और निरुक्त ४।२७। में भी व्याख्यात है ॥

    टिप्पणी

    ४−(द्वादश) (प्रधयः) प्रधितुल्यमासाः (चक्रम्) रथचक्रवद्वर्षकालः (एकम्) (त्रीणि) (नभ्यानि) रथनाभिभवानि अङ्गानि। ग्रीष्मवर्षाशीतरूपाणि (कः) विद्वान् (उ) एव (तत्) (चिकेत) ज्ञातवान् (तत्र) चक्रे (वर्षे (आहताः) हन हिंसागत्योः-क्त। आगताः। स्थापिताः (त्रीणि) (शतानि) (शङ्कवः) खरुशङ्कुपीयु०। उ० १।३६। शकि त्रासे शङ्कायां च-कु। कीलाः (षष्टिः) (च) (खीलाः) कील बन्धने-क, कस्य खः। अल्पशङ्कवः (अविचाचलाः) नित्यं कौटिल्ये गतौ। पा० ३।१।२३। अ+वि+चल गतौ-यङ् अच्। अकुटिलगतयः (ये) ॥

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    विषय

    प्रभु का कालचक्र

    पदार्थ

    १. प्रभु-निर्मित कालचक्र का (एकं चक्रम्) = संवत्सररूप एक चक्र है। इसकी (द्वादश प्रधयः) = बारह मासरूपी बारह प्रधियाँ [पुट्टियाँ] हैं। (त्रीणि नभ्यानि) = 'सरदी, गरमी व वर्षा' रूप तीन ऋतुएँ-इस चक्र में तीन नाभियाँ हैं। (तत् कः उ चिकेत्) = उस कालचक्र के रहस्य को कोई विरला ही जान पाता है। २. (तत्र) = उस कालचक्र में (त्रीणी शतानि) = तीन सौ (शंकव:) = बड़े दिनरूप खुंटे, (च) = तथा (षष्टिः खीला:) = साठ छोटे दिनरूप कील (आहता:) = जड़े हुए हैं आहत[लगे हुए] हैं। (ये) = जो शंकु और खील (अ-विचाचला:) = अकुटिल गतिवाले हैं, सदा ठीक गति से चलनेवाले हैं।

    भावार्थ

    प्रभु का बनाया हुआ कालचक्र सचमुच अद्भुत ही है।

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    भाषार्थ

    (द्वादश) १२ (प्रधयः) पुट्ठियां (चक्रम् एकम्) एक चक्र (त्रीणि) तीन (नभ्यानि) नाभि के हिस्से (क, उ तत्, चिकेत) कौन उसे जानता है। (तत्र) उस चक्र में (त्रीणि शतानि) तीन सौ (शङ्कवः) शङ्कु (आहताः) हैं, (षष्टिः, च) और साठ (खीलाः) कील हैं (ये) जो कि (अविचाचलाः) विचलित नहीं होते [स्थिर रहते हैं]।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में वर्ष का वर्णन हुआ है। वर्ष के १२ मास है १२ प्रधियां पुट्टियां (Fellies)। वर्ष एक चक्र है, पहिया है, जिसकी परिधि १२ प्रधियों से निर्मित हुई है। तीन नभ्य हैं ग्रीष्म, वर्षा, शरद्। ये तीन एक वर्ष के नभ्य है। पहिए के१ तीन नभ्य विचाराधीन हैं। तीन सौ और साठ शङ्कु और खील है = वर्ष के ३६० दिन। प्रत्येक मास तीस दिनों के हिसाब से। पहिए के दण्डे जो नाभि और परिधि में लगे रहते हैं उन्हें भी सम्भवतः ३६० कहा है। ये ३६० दिन विचलित नहीं होते, यह संख्या वर्ष के निर्माण में स्थिर रहती है। राशिचक्र (Zodiac) को भी ३६० अंशों में बाण्टा जाता है। ३०० को शङ्कु, और ६० को खील कहा है। एक ऋतु दो मासों की होती है, और प्रत्येक मास ३० दिनों का। सम्भवतः ऋतु के निर्माण सम्बन्ध में ६० खीलों का वर्णन पृथक् रूप में किया हो, प्रत्येक ऋतु ६० दिनों की होती है। मन्त्र में "क उ तच्चिकेत" में "कः" पद द्व्यर्थक है। कः = कौन, तथा कः = प्रजापति परमेश्वर। अतः यह भी सूचित कर दिया है कि "प्रजापति परमेश्वर" उसे जानता है। यथा "कस्मै देवाय हविषा विधेम" में दो अर्थ किये जाते हैं, (१) किस देव के लिये, (२) प्रजापति देव के लिये हवि द्वारा हम परिचर्या करें] [१. सम्भवतः पहिये की नाभि का भी निर्माण तीन प्रधियों द्वारा अभिप्रेत हो जिन्हें कि त्रीणि नभ्यानि= नाभौ भवानि, नाभौ हितानि वा।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    One is the wheel, twelve segments of the felly, three segments of the nave. Who would know that wheel of existence? Three hundred and sixty are the spokes fixed therein, and as many spikes, all fixed and firm, immovable. He, Brahma, would know that.

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    Translation

    The fellies are twelve; the wheel is one, the navés are three; who knows of it ? Three hundred and sixty spokes have been fixed therein; the nails that are immoveable as well as moveable.

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    Translation

    Who does comprehend the twelve tires the one wheel and three naves? Three hundred spokes have been hammered thereupon and sixty pins are set firmly in their places. [N.B.: Here in the verse the year of twelve month has been mysteriously described. The year is a wheel which possesses three naves, the rainy season, autumn and spring. Three hundred and sixty nights and days pass in one complete year.]

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    Translation

    One is the wheel, the tires are twelve in number, the naves are three. What man hath understood it? Three hundred and sixty spokes and three hundred and sixty pins have been hammered thereupon, which are firmly set in their places.

    Footnote

    Soul has been compared to the year, one wheel. Twelve tires: Twelve months. Three naves: Three seasons, Summer, Rains, and Winter. 360 spokes are 360 days. 3:0 pins are 360 nights in the year. Similarly, the solitary soul is equipped with twelve breaths, three attributes of Satva, Rajsa, Tamsa. 720 spokes and pins are the 720 arteries of the body.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(द्वादश) (प्रधयः) प्रधितुल्यमासाः (चक्रम्) रथचक्रवद्वर्षकालः (एकम्) (त्रीणि) (नभ्यानि) रथनाभिभवानि अङ्गानि। ग्रीष्मवर्षाशीतरूपाणि (कः) विद्वान् (उ) एव (तत्) (चिकेत) ज्ञातवान् (तत्र) चक्रे (वर्षे (आहताः) हन हिंसागत्योः-क्त। आगताः। स्थापिताः (त्रीणि) (शतानि) (शङ्कवः) खरुशङ्कुपीयु०। उ० १।३६। शकि त्रासे शङ्कायां च-कु। कीलाः (षष्टिः) (च) (खीलाः) कील बन्धने-क, कस्य खः। अल्पशङ्कवः (अविचाचलाः) नित्यं कौटिल्ये गतौ। पा० ३।१।२३। अ+वि+चल गतौ-यङ् अच्। अकुटिलगतयः (ये) ॥

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