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अथर्ववेद के काण्ड - 12 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 23
    ऋषिः - कश्यपः देवता - वशा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वशा गौ सूक्त
    60

    य ए॒वं वि॒दुषे॑ऽद॒त्त्वाथा॒न्येभ्यो॒ दद॑द्व॒शाम्। दु॒र्गा तस्मा॑ अधि॒ष्ठाने॑ पृथि॒वी स॒हदे॑वता ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । ए॒वम् । वि॒दुषे॑ । अद॑त्त्वा । अथ॑ । अ॒न्येभ्य॑: । दद॑त् । व॒शाम् । दु॒:ऽगा । तस्मै॑ । अ॒धि॒ऽस्थाने॑ । पृ॒थि॒वी । स॒हऽदे॑वता ॥४.२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य एवं विदुषेऽदत्त्वाथान्येभ्यो ददद्वशाम्। दुर्गा तस्मा अधिष्ठाने पृथिवी सहदेवता ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । एवम् । विदुषे । अदत्त्वा । अथ । अन्येभ्य: । ददत् । वशाम् । दु:ऽगा । तस्मै । अधिऽस्थाने । पृथिवी । सहऽदेवता ॥४.२३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 4; मन्त्र » 23
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो पुरुष (एवम्) इस प्रकार (विदुषे) विद्वान् को (अदत्वा) न देकर (अथ) फिर (अन्येभ्यः) दूसरों [दुर्बलेन्द्रियों] को (वशाम्) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (ददत्) देता हुआ है। (तस्मै) उस पुरुष के लिये (अधिष्ठाने) प्रभाव के बीच (सहदेवता) देवताओं विद्वानों सहित (पृथिवी) पृथिवी (दुर्गा) दुर्गम [कठिन] होती है ॥२३॥

    भावार्थ

    जो पुरुष अधिकारी ब्रह्मचारियों का अनादर करके दुर्बलेन्द्रिय लम्पटों को वेदविद्या का अधिकार देता है, वह न तो पृथिवी का राज्य कर सकता है और न विद्वानों में आदर पा सकता है ॥२३॥

    टिप्पणी

    २३−(यः) (एवम्) ईदृग्विधम् (विदुषे) ज्ञानिने (अदत्वा) (अध) पुनः (अन्येभ्यः) दुर्बलेन्द्रियेभ्यः (ददत्) प्रयच्छन् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (दुर्गा) दुष्प्राप्या (तस्मै) अविदुषे (अधिष्ठाने) प्राधान्ये (पृथिवी) (सहदेवता) विद्वद्भिः सहिता ॥

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    विषय

    तस्मै पृथिवी दुर्गा

    पदार्थ

    १. (अथ) = अब (यः) = जो (एवम्) = इसप्रकार [मधुरता से] (विदुषे) = एक विद्वान् के लिए समझदार के लिए (वशाम्) = कमनीय वेदवाणी को (अदत्त्वा) = न देकर (अन्येभ्यः) = अन्य पुरुषों के लिए, धन आदि के प्रलोभन से प्रेरित होकर, (ददत्) = देता हुआ होता है, (तस्मै) = उसके लिए यहाँ (अधिष्ठाने) = घर में यह (पृथिवी) = पृथिवी (सहदेवता) = सब अग्नि, जल, वायु आदि देवों के साथ दुर्गा-दुःख देनेवाली [दुः गमयति] होती है।

    भावार्थ

    वेदवाणी का यदि धन के बदले विक्रय किया जाता है और एक विद्वान् के लिए इसे प्रास नहीं कराया जाता तो यह पृथिवी, अन्य सब देवों के साथ, उसके लिए कष्टप्रद हो जाती है, अर्थात् वह वेदवाणी का विक्रेता आधिदैविक आपत्तियों का शिकार होता है।

     

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    भाषार्थ

    (यः) जो राजा (एवं विदुषे) इस प्रकार के ज्ञानी को (अदत्त्वा) न दे कर (अथ) फिर (अन्येभ्यः) अन्यों को (वशाम्) वेदवाणी के प्रचार की स्वतन्त्रता (ददद्) प्रदान करता है, (तस्मै) उस के लिये (सहदेवता) देवताओं सहित (पृथिवी) पृथिवी, (अधिष्ठाने) राजा के निज निवास स्थान में, (दुर्गा) दुःख पहुंचाती है।

    टिप्पणी

    [यदि राजा विद्वान् ब्रह्मज्ञ तथा वेदज्ञ को वेदप्रचार की स्वतन्त्रता न दे कर अन्यों को स्वतन्त्रता देता है, तो मानो पृथिवी के वासी निज नेताओं के साथ मिल कर उसे उसके निवास स्थान पर जा कर कष्ट पहुंचाते हैं]।

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    विषय

    ‘वशा’ शक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    जो स्वामी (एवं विदुषः) इस प्रकार के उत्तम विद्वान् को वशा का (अदत्वा) दान न करके (अन्येभ्यः) औरों को (वशाम्) वशा का (ददद्) दान कर देता है तो (तस्मा अधिष्ठाने) उसके स्थान में (सहदेवता) उसके साथ की जोड़ की देवता (पृथिवी) पृथिवी भी (तस्मै दुर्गा) उसके लिये दुःखप्रद हो जाती है।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘अन्यस्मै ददद’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कश्यप ऋषिः। मन्त्रोक्ता वशा देवता। वशा सूक्तम्। १-६, ८-१९, २१-३१, ३३-४१, ४३–५३ अनुष्टुभः, ७ भुरिग्, २० विराड्, ३३ उष्णिग्, बृहती गर्भा, ४२ बृहतीगर्भा। त्रिपञ्चाशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vasha

    Meaning

    If a person, community or ruler gives the gift of Vasha, freedom of speech, to others than the learned, having refused it to the dedicated and learned, then it is difficult for them to realise the gifts of earth including those of other divinities of nature and humanity in the house.

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    Translation

    Whoever, not having giver her to one who knoweth thus, then shall give the cow to others, hard to go upon for him in his station is the earth with its deity.

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    Translation

    From him does not give the cow to man of knowledge and learning and gives her to others else, the earth, with other natural and spiritual force become the, resort of miseries.

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    Translation

    Whoso imparts this beautiful Vedic knowledge not to the learned but to the ignorant, Earth, with the sages, is hard for him to win and rest upon.

    Footnote

    He who gives Vedic knowledge not to the deserving, but to the undeserving, can occupy no position of influence in the world, nor can he command respect from the learned.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २३−(यः) (एवम्) ईदृग्विधम् (विदुषे) ज्ञानिने (अदत्वा) (अध) पुनः (अन्येभ्यः) दुर्बलेन्द्रियेभ्यः (ददत्) प्रयच्छन् (वशाम्) कमनीयां वेदवाणीम् (दुर्गा) दुष्प्राप्या (तस्मै) अविदुषे (अधिष्ठाने) प्राधान्ये (पृथिवी) (सहदेवता) विद्वद्भिः सहिता ॥

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