अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 46
वि॑लि॒प्ती या बृ॑हस्प॒तेऽथो॑ सू॒तव॑शा व॒शा। तस्या॒ नाश्नी॑या॒दब्रा॑ह्मणो॒ य आ॒शंसे॑त॒ भूत्या॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठवि॒ऽलि॒प्ती । या । बृ॒ह॒स्प॒ते॒ । अथो॒ इति॑ । सू॒तऽव॑शा । व॒शा । तस्या॑: । न । अ॒श्नी॒या॒त्। अब्रा॑ह्मण: । य: । आ॒ऽशंसे॑त । भूत्या॑म् ॥४.४६॥
स्वर रहित मन्त्र
विलिप्ती या बृहस्पतेऽथो सूतवशा वशा। तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम् ॥
स्वर रहित पद पाठविऽलिप्ती । या । बृहस्पते । अथो इति । सूतऽवशा । वशा । तस्या: । न । अश्नीयात्। अब्राह्मण: । य: । आऽशंसेत । भूत्याम् ॥४.४६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थ
“(बृहस्पते) हे बड़ी वेदवाणियों के रक्षक ! (या) जो (विलिप्ती) विशेष वृद्धिवाली (अथो) और भी (सूतवशा) उत्पन्न जगत् को वश में करनेवाली (वशा) कामनायोग्य [वेदवाणी] है। (तस्याः) उस [वेदवाणी] का (न अश्नीयात्) वह भोग [अनुभव] नहीं कर सकता, (यः) जो (अब्राह्मणः) अब्रह्मचारी [ब्रह्मचर्य न रखनेवाला पुरुष] (भूत्याम्) ऐश्वर्य में (आशंसेत) इच्छा करे” ॥४६॥
भावार्थ
संसार का हित करनेवाली वेदवाणी को मनुष्य विना ब्रह्मचर्य कभी नहीं पा सकता और न ऐश्वर्यवान् हो सकता है। यह गत मन्त्र का उत्तर है ॥४६॥ इस मन्त्र का मिलान ऊपर मन्त्र ४४ से करो ॥
टिप्पणी
४६−(विलिप्ती) म० ४१। विशेषवृद्धियुक्ता (अथो) अपि च। अन्यत् पूर्ववत्−म० ४४ ॥
विषय
सूतवशा वशा
पदार्थ
१. हे (बृहस्पते) = ज्ञानिन्! (वशा) = जो वेदवाणी (विलिप्ती) = हमारी शक्तियों का विशेषरूप से उपचय करनेवाली है और जो (सूतवशा) = अपने जीवन का नियन्त्रण करनेवाले के वश में होती है, (तस्याः) = उस वेदवाणी का वह (अब्राह्मण:) = अब्रह्मचारी (न अश्नीयात्) = नहीं उपभोग कर पाता, (यः) = जोकि (भूत्यां आशंसेत) = ऐश्वर्य में इच्छावाला होता है। धन की ओर झुकाव हो जाने पर मनुष्य वेदवाणी को नहीं प्राप्त करता। यह वेदवाणी हमारी शक्तियों का उपचय करती है और उसी को प्रास होती है जोकि अपना नियन्त्रण करनेवाला बनता है।
भावार्थ
धनासक्त अब्राह्मण इस वेदवाणी को नहीं प्राप्त करता। यह शक्तियों का उपचय करनेवाली वेदवाणी नियनता को ही प्राप्त होती है।
भाषार्थ
४६।। अर्थ देखो (मन्त्र ४४)। (तस्याः नाश्नीयात् अब्राह्मणः) अब्राह्मण उस का भोग न करें। अब्राह्मण=जोकि वेदवेत्ता नहीं।
विषय
‘वशा’ शक्ति का वर्णन।
भावार्थ
हे (बृहस्पते) बृहस्पते ! (या) जो विलिप्ती और (सूतवशा वशा) सूतवशा और दशा है इत्यादि व्याख्या देखो [ मन्त्र सं० ४३ ]।
टिप्पणी
‘प्रिलुप्तिं बृहस्पतये याचस्सूत’ (तृ०) ‘तासाम्’ इति पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कश्यप ऋषिः। मन्त्रोक्ता वशा देवता। वशा सूक्तम्। १-६, ८-१९, २१-३१, ३३-४१, ४३–५३ अनुष्टुभः, ७ भुरिग्, २० विराड्, ३३ उष्णिग्, बृहती गर्भा, ४२ बृहतीगर्भा। त्रिपञ्चाशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Vasha
Meaning
O Brhaspati, master, guardian and promoter of knowledge and freedom for life in existence, Vilipti, consecrated but obscured knowledge and freedom unpolluted by hate and attachment, Sutavasha, controller of passions and appetites of men, and Vasha, knowledge and freedom self-disciplined by law and enlightened culture, these are the kinds of knowledge, freedom and values which men indifferent to Divinity and divine values but merged into pleasures of mundane materiality do not and cannot taste and enjoy.
Translation
She that is vilipti, O Brhaspati, further the cow that has given birth to (such) a cow -- of that one a non-Brahman who should hope for prosperity may not partake.
Translation
O Brihaspati Abrahmana desiring power and eminence should not eat milk of those which are among Vilipti, Sutvasha and Vasha.
Translation
O learned person, the guardian of Vedic knowledge, a man who is not a Brahmchari, and longs for prosperity, cannot utilise the beautiful knowledge of the Vedas, which is highly developed, and controls the created world!
Footnote
This verse is the answer to the question raised in the previous verse.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४६−(विलिप्ती) म० ४१। विशेषवृद्धियुक्ता (अथो) अपि च। अन्यत् पूर्ववत्−म० ४४ ॥
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