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अथर्ववेद के काण्ड - 12 के सूक्त 4 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 35
    ऋषिः - कश्यपः देवता - वशा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - वशा गौ सूक्त
    46

    पु॑रो॒डाश॑वत्सा सु॒दुघा॑ लो॒केऽस्मा॒ उप॑ तिष्ठति। सास्मै॒ सर्वा॒न्कामा॑न्व॒शा प्र॑द॒दुषे॑ दुहे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पु॒रो॒डाश॑ऽवत्सा। सु॒ऽदुघा॑ । लो॒के । अ॒स्मै॒ । उप॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । सा । अ॒स्मै॒ । सर्वा॑न् । कामा॑न् । व॒शा । प्र॒ऽद॒दुषे॑ । दु॒हे॒ ॥४.३५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोकेऽस्मा उप तिष्ठति। सास्मै सर्वान्कामान्वशा प्रददुषे दुहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पुरोडाशऽवत्सा। सुऽदुघा । लोके । अस्मै । उप । तिष्ठति । सा । अस्मै । सर्वान् । कामान् । वशा । प्रऽददुषे । दुहे ॥४.३५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 4; मन्त्र » 35
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (पुरोडाशवत्सा) बढ़कर दान करने [वा उत्तम अन्न पाने] के लिये उपदेश करनेवाली, (सुदुघा) सुन्दर रीति से पूर्ण करनेवाली (वशा) वशा [कामनायोग्य वेदवाणी] (लोके) संसार में (अस्मै) उस पुरुष के लिये (उप तिष्ठति) उपस्थित होती है। (सा) वह (अस्मै) इस (प्रददुषे) बड़े दानी के लिये (सर्वान्) सब (कामान्) श्रेष्ठ कामनाएँ (दुहे) पूरी करती है ॥३५॥

    भावार्थ

    मनुष्य सब गुणों की खान वेदविद्या के अभ्यास और प्रकाश से धार्मिक होकर अपनी सब कामनाएँ पूरी करता है ॥३५॥

    टिप्पणी

    ३५−(पुरोडाशवत्सा) पुरो अप्रे दाश्यते दीयते, दाशृ दाने−घञ्+वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। वद व्यक्तायां वाचि−स, टाप्। पुरोडाशाय उत्तमदानाय परिपक्वान्नाय वा वदत्युपदिशति या सा (सुदुघा) अ० ७।७३।७। यथाविधि पूरयित्री। कामदा (लोके) संसारे (अस्मै) पुरुषाय (उपतिष्ठति) उपस्थिता भवति (सा) (अस्मै) (सर्वान्) (कामान्) श्रेष्ठाभिलाषान् (वशा) (प्रददुषे) प्रकर्षेण दत्तवते (दुहे) दुग्धे। प्रपूरयति ॥

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    विषय

    पुरोडाशवत्सा

    पदार्थ

    १. 'पुरः दाशति' आगे देता है, इसी से यह 'पुरोडाश' कहलाता है। यह पुरोडाश है प्रिय जिसको, ऐसी यह (पुरोडाशवत्सा) = आगे और आगे देनेवाले को प्यार करनेवाली यह वशा [वेदवाणी] (अस्मै) = इस पुरोडाश के लिए (लोके) = इस लोक में (सुदुघा) = उत्तम ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाली होती हुई (उपतिष्ठति) = उपस्थित होती है। २. उसके समीप उपस्थित होकर सा वशा-वह कमनीया वेदवाणी (अस्मै प्रददुषे) = इस वेदवाणी को औरों को देनेवाले के लिए (सर्वान् कामान्) = सब इष्ट पदार्थों को (दूहे) = प्रपूरित करती है।

    भावार्थ

    वेदज्ञान को प्राप्त करके उस ज्ञान को ओरों को देनेवाला व्यक्ति ही वेदवाणी का प्रिय होता है। वेदवाणी अपने इस प्रिय के लिए सब इष्ट पदार्थों को प्राप्त कराती है।

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    भाषार्थ

    (पुरोडाशवत्सा) पुरोडाशवत्सवाली, (सुदुघा) सुगमता से दुही जाने वाली (वशा) वेदवाणी (लोके) लोक में (अस्मै) इस राजा के लिये (उप तिष्ठति) उपस्थित होती है। वह (अस्मै) इस राजा के लिये, (प्रददुषे) जिसने कि वेदवाणी के प्रचार की स्वतन्त्रता दी हैं- (सर्वान् कामान्) सब कामनाओं का (दुहे) दोहन करती है।

    टिप्पणी

    [सुदुघा गौ, बछड़े के सम्पर्क से, दूध देती है। मन्त्र में पुरोडाश को वशा का बछड़ा कहा है अर्थात् चावल की पीठी से कछुए के आकार में बनाए गए भटूरे को वत्स कहा है। पुरोडाश=Sacrificial cake। इस से प्रतीत होता है कि मन्त्र में "वशा" पद गोपशु वाचक नहीं। गोपशु का वत्स चार टांगों वाला प्राणी होता है, पुरोडाश नहीं। इसलिये मन्त्र में "वशा" पद वेदवाणी का वाचक है न कि गोपशु का। "लोके" का भी अभिप्राय है - इस लोक में, राजा के राज्य में। जो राजा निजराज्य में वेदप्रचार की स्वीकृति देता है उस के राज्य में सब कामनाएँ सफल हो जाती हैं। वेदवाणीरूपी वशा सब कामनाओं का दोहन करती है, केवल दूध का ही नहीं]।

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    विषय

    ‘वशा’ शक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    (पुरोडाशवत्सा) ‘पुरोडाश’ को बछड़ा बना कर (सुदुघा) उत्तम रीति से बहुत फल देने वाली ‘वशा’ (लोके) लोक में (अस्मै) इस राजा के लिये (उपतिष्ठति) आ उपस्थित होती है (सा वशा) वह ‘वशा’ (अस्मै प्रददुषे) इस अपने दान करने वाले को (सर्वान् कामान् दुहे) समस्त कामना करने योग्य फलों को उत्पन्न करती और सब मनोरथ पूर्ण करती है।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘लोकेऽस्यापे’ (तृ०) ‘सहस्मै सर्वान् कामान् महे’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कश्यप ऋषिः। मन्त्रोक्ता वशा देवता। वशा सूक्तम्। १-६, ८-१९, २१-३१, ३३-४१, ४३–५३ अनुष्टुभः, ७ भुरिग्, २० विराड्, ३३ उष्णिग्, बृहती गर्भा, ४२ बृहतीगर्भा। त्रिपञ्चाशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vasha

    Meaning

    Mother Vasha whose gift is food for life and yajna, who is generous and abundant in milk, stands by this humanity in the world. For one who supports and expands this mother knowledge and freedom of speech for the rightful seekers, she brings streams and showers of the nectar milk of life and fulfils all his desires.

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    Translation

    With the sacrificial cake as calf, milking well, she draws near to him in the world; she yeilds to him all his desires - (namely), the cow to him who has presented her.

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    Translation

    The cow, Purodasha is like whose can and is yielder of good milk is to be had in other life by the giver of gift. She fulfills his all desires and hopes (concerned with her).

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    Translation

    This Vedic knowledge the preacher of vast charity, the bearer of the fruits of actions, comes nigh to him in this world. To him who gives it as a gift, it grants every hope and wish.

    Footnote

    First him refers to the charitable person, who does not withhold the grant of Vedic knowledge.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३५−(पुरोडाशवत्सा) पुरो अप्रे दाश्यते दीयते, दाशृ दाने−घञ्+वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। वद व्यक्तायां वाचि−स, टाप्। पुरोडाशाय उत्तमदानाय परिपक्वान्नाय वा वदत्युपदिशति या सा (सुदुघा) अ० ७।७३।७। यथाविधि पूरयित्री। कामदा (लोके) संसारे (अस्मै) पुरुषाय (उपतिष्ठति) उपस्थिता भवति (सा) (अस्मै) (सर्वान्) (कामान्) श्रेष्ठाभिलाषान् (वशा) (प्रददुषे) प्रकर्षेण दत्तवते (दुहे) दुग्धे। प्रपूरयति ॥

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