अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 4/ मन्त्र 51
ये व॒शाया॒ अदा॑नाय॒ वद॑न्ति परिरा॒पिणः॑। इन्द्र॑स्य म॒न्यवे॑ जा॒ल्मा आ वृ॑श्चन्ते॒ अचि॑त्त्या ॥
स्वर सहित पद पाठये । व॒शाया॑: । अदा॑नाय । वद॑न्ति । प॒रि॒ऽरा॒पिण॑: । इन्द्र॑स्य । म॒न्यवे॑ । जा॒ल्मा: । आ । वृ॒श्च॒न्ते॒ । अचि॑त्त्या ॥४.५१॥
स्वर रहित मन्त्र
ये वशाया अदानाय वदन्ति परिरापिणः। इन्द्रस्य मन्यवे जाल्मा आ वृश्चन्ते अचित्त्या ॥
स्वर रहित पद पाठये । वशाया: । अदानाय । वदन्ति । परिऽरापिण: । इन्द्रस्य । मन्यवे । जाल्मा: । आ । वृश्चन्ते । अचित्त्या ॥४.५१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदवाणी के प्रकाश करने के श्रेष्ठ गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जो (परिरापिणः) बतबने लोग (वशायाः) कामनायोग्य [वेदवाणी] के (अदानाय) न दान करने के लिये (वदन्ति) कहते हैं। (जाल्माः) वे क्रूर (अचित्या) अज्ञान से (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान् पुरुष के (मन्यवे) क्रोध के कारण (आ) सब ओर से (वृश्चन्ते) छिन्न-भिन्न होते हैं ॥५१॥
भावार्थ
जो लोग वेदवाणी के प्रकाश रोकने के लिये दूसरों को बहकाते हैं, उन दुष्टों को प्रतापी मनुष्य नष्ट कर देवे ॥५१॥
टिप्पणी
५१−(ये) (वशायाः) कमनीयाया वेदवाण्याः (वदन्ति) (परिरापिणः) रप व्यक्तायां वाचि−णिनि। परिलपनशीलाः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतः पुरुषस्य (मन्यवे) क्रोधाय (जाल्माः) जल अपवारणे−णिच्−म प्रत्ययः। पामराः। क्रूराः (आ) समन्तात् (वृश्चन्ते) छिद्यन्ते (अचित्या) अज्ञानेन ॥
विषय
परिरापिणः
पदार्थ
१. (ये) = जो (परिरापिण:) = व्यर्थ की बातें करनेवाले लोग (वशाया:) = वेदवाणी के (अदानाय) = न देने के लिए (वदन्ति) = व्यर्थ की युक्तियों का प्रतिपादन करते हैं। वे (जाल्मा:) = असमीक्ष्यकारी लोग (अचित्या) = इस नासमझी से (इन्द्रस्य) = उस शत्रुविदारक प्रभु के (मन्यवे आवश्चन्ते) = क्रोध के लिए छिन्न-भिन्न होते हैं, अर्थात् इनपर प्रभु का कोप होता है और ये विनष्ट हो जाते हैं।
भावार्थ
वेदवाणी का प्रसार करना ही चाहिए। उसके प्रसार को रोकने के बहाने न ढूंढने चाहिएँ। ऐसा करेंगे तो हम प्रभु के कोपभाजन होंगे।
भाषार्थ
(ये) जो (परिरापिणः) सर्वत्र स्पष्ट आन्दोलनकारी लोग (वशायाः) वेदवाणी सम्बन्धी अधिकार के (अदानाय) न देने के लिये (वदन्ति) राजन्य को कहते हैं, वे (जाल्माः) जाल फैलाने वाले या जालिम (अचित्तया) निज अज्ञान के कारण (इन्द्रस्य) सम्राट् के (मन्यवे) क्रोध के लिये (आवृश्चन्ते) सब काटे जाते हैं।
टिप्पणी
[परिरापिणः=परि (सर्वत्र)+रापिणः (रप व्याक्तायां वाचि)]
विषय
‘वशा’ शक्ति का वर्णन।
भावार्थ
(ये) जो (परिरापिणः) बकवादी, बुरी सलाह देने वाले लोग (वशायाः) वशा को (अदानाय) दान न करने के लिये (वदन्ति) कहा करते हैं वे (जाल्माः) दुष्ट पुरुष (अचित्या) अपने अज्ञान या दुष्टचित्तता के कारण (इन्द्रस्य मन्यवे) इन्द के मन्यु के द्वारा (आ वृश्चन्ते) विनष्ट हो जाते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कश्यप ऋषिः। मन्त्रोक्ता वशा देवता। वशा सूक्तम्। १-६, ८-१९, २१-३१, ३३-४१, ४३–५३ अनुष्टुभः, ७ भुरिग्, २० विराड्, ३३ उष्णिग्, बृहती गर्भा, ४२ बृहतीगर्भा। त्रिपञ्चाशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Vasha
Meaning
Those talkative babblers and mischief mongers who advocate and support the denial of mother knowledge and the ban on freedom of speech, those vile fools by their own stupidity get uprooted and fall to the wrath of Indra, the ruler.
Translation
They who, wheedling; advise to the non-giving of the cow, the villains fall under the fury of Indra through ignorance.
Translation
The men of bad counsel who advise refusal of giving the cow, are miscreants and they through their foolishness become subject of the anger of Indra.
Translation
The men of evil counsel who advise refusal of the grant of Vedic knowledge miscreants, through their foolishness, are subjected to the wrath of a powerful person.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५१−(ये) (वशायाः) कमनीयाया वेदवाण्याः (वदन्ति) (परिरापिणः) रप व्यक्तायां वाचि−णिनि। परिलपनशीलाः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतः पुरुषस्य (मन्यवे) क्रोधाय (जाल्माः) जल अपवारणे−णिच्−म प्रत्ययः। पामराः। क्रूराः (आ) समन्तात् (वृश्चन्ते) छिद्यन्ते (अचित्या) अज्ञानेन ॥
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