अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 10
ऋषिः - शुक्रः
देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
56
अ॒स्मै म॒णिं वर्म॑ बध्नन्तु दे॒वा इन्द्रो॒ विष्णुः॑ सवि॒ता रु॒द्रो अ॒ग्निः। प्र॒जाप॑तिः परमे॒ष्ठी वि॒राड्वै॑श्वान॒र ऋष॑यश्च॒ सर्वे॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒स्मै । म॒णिम् । वर्म॑ । ब॒ध्न॒न्तु॒ । दे॒वा: । इन्द्र॑: । विष्णु॑: । स॒वि॒ता । रु॒द्र: । अ॒ग्नि: । प्र॒जाऽप॑ति: । प॒र॒मे॒ऽस्थी । वि॒ऽराट् । वै॒श्वा॒न॒र: । ऋष॑य: । च॒ । सर्वे॑ । ५.१०॥
स्वर रहित मन्त्र
अस्मै मणिं वर्म बध्नन्तु देवा इन्द्रो विष्णुः सविता रुद्रो अग्निः। प्रजापतिः परमेष्ठी विराड्वैश्वानर ऋषयश्च सर्वे ॥
स्वर रहित पद पाठअस्मै । मणिम् । वर्म । बध्नन्तु । देवा: । इन्द्र: । विष्णु: । सविता । रुद्र: । अग्नि: । प्रजाऽपति: । परमेऽस्थी । विऽराट् । वैश्वानर: । ऋषय: । च । सर्वे । ५.१०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
हिंसा के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(देवाः) स्तुतियोग्य पुरुष, [अर्थात्] (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला (विष्णुः) कामों में व्याप्तिवाला [मन्त्री] (सविता) प्रेरणा करनेवाला [सेनापति], (रुद्रः) ज्ञानदाता (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी आचार्य] (प्रजापतिः) प्रजापालक, (परमेष्ठी) अति श्रेष्ठ [मोक्ष] पद में रहनेवाला, (विराट्) अति प्रकाशमान, (वैश्वानरः) सब नरों का हितकारी परमेश्वर (च) और (सर्वे) सब (ऋषयः) ऋषि लोग (अस्मै) इस [शूर पुरुष] के (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियमरूप] (वर्म) कवच (बध्नन्तु) बाँधें ॥१०॥
भावार्थ
पुरुषार्थी मनुष्य विद्वानों की सम्मति और परमात्मा के श्रेष्ठ नियमों में चलकर आनन्द पावें ॥१०॥
टिप्पणी
१०−(अस्मै) पुरुषार्थिने शूराय (मणिम्) श्रेष्ठनियमरूपम् (वर्म) कवचम् (बध्नन्तु) धारयन्तु (देवाः) स्तुत्याः पुरुषाः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (विष्णुः) कर्मसु व्यापको मन्त्री (सविता) प्रेरकः सेनापतिः (रुद्रः) अ० २।२७।६। ज्ञानदाता (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी आचार्यः (प्रजापतिः) प्रजापालकः (परमेष्ठी) अ० १।७।२। अतिश्रेष्ठे मोक्षपदे स्थितः (विराट्) अ० ४।११।७। विविधं प्रकाशमानः (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। सर्वनरहितः परमेश्वरः (ऋषयः) अ० २।६।१। सन्मार्गदर्शकाः (सर्वे) समस्ताः ॥
विषय
मणिबन्धन
पदार्थ
१, (अस्मै) = इस साधक के लिए (देवा:) = सब दिव्यवृत्तियाँ (मणिम्) = वीर्यरूप मणि को (वर्म बध्नन्तु) = कवच के रूप में बाँधै। दिव्यवृत्तियों होने पर शरीर में वीर्यमणि सुरक्षित रहती है। यह रोगादि से बचानेवाले कवच की भौति काम करती है। इन दिव्यवृत्तियों का ही परिणाम 'इन्द्रः, विष्णुः, सविता, रुद्रः, अग्निः, प्रजापतिः, परमेष्ठी, विराट् और वैश्वानरः' शब्दों से अभिव्यक्त हुआ है। ये सब नाम प्रभु के हैं। इन नामों से प्रभु का स्मरण करता हुआ यह साधक (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय, (विष्णुः) = [विष् व्याप्ती] व्यापक-उदारवृत्तिवाला, (सविता) = निर्माण कार्यों में प्रवृत्त, (रुद्रः) = रोगों को दूर भगानेवाला, (अग्नि:) = अग्नणी-अपने को आगे-और-आगे ले-चलनेवाला, (प्रजापति:) = प्रजा के रक्षण में तत्पर, (परमेष्ठी) = परम स्थान में स्थित-तम व रज से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में स्थित, (विराट्) = विशिष्ट दीप्सिवाला व (वैश्वानरः) = सब मनुष्यों के हित में प्रवृत्त होता है। ये सब दिव्यवृत्तियाँ शरीर में वीर्यरूप मणि को कवचरूप में बाँधनेवाली बनती हैं। २. (च) = और (सर्वे ऋषयः) = सब ऋषि भी इस साधक के लिए इस वीर्यमणि को कवचरूप में बाँधनेवाले हों। 'ऋषि' तत्त्वद्रष्टा पुरुष हैं। ये उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कराते हुए वृत्तियों के सुन्दर निर्माण के द्वारा वीर्य का रक्षण करानेवाले होते हैं।
भावार्थ
हम दिव्य वृत्तियोंवाले व उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त करनेवाले बनकर वीर्यरूप मणि को शरीर में कवच के रूप में धारण करें। ये कवच हमें रोगों व वासनारूप शत्रुओं के आक्रमण से बचाएगा।
भाषार्थ
(अस्मै) इस राष्ट्रपति राजा के लिये (इन्द्रः) इन्द्र (विष्णुः) विष्णु, (सविता) सविता (रुद्रः) रुद्र (अग्निः) अग्नि (प्रजापतिः) प्रजापति (परमेष्ठी) परमेष्ठी, (विराट्) विराट्, (वैश्वानरः) और वैश्वानर (देवाः) ये देव, (च) और (सर्व) सब (ऋषयः) ऋषि (मणिम्) सेनाध्यक्षरूपी पुरुषरत्न को सुदृढरूप में (बध्नन्तु) सम्बद्ध करें।
टिप्पणी
[मन्त्र में साम्राज्य के घटक प्रत्येक राष्ट्र के राष्ट्रपति राजा और सेनाध्यक्ष के पारस्परिक सम्बन्ध को सुदृढ़ करने के निमित्त साम्राज्य के अधिकारियों तथा साम्राज्य के ऋषियों का सम्मेलन करने का विधान हुआ है, और इस सम्मेलन में परमेश्वर की कृपा का आह्वान किया है। प्रजापति परमेष्ठी, विराट, वैश्वानर, ये नाम परमेश्वर के हैं। और अवशिष्ट नाम साम्राज्य के अधिकारियों के लिये हैं। तथा ऋषि आमन्त्रित हैं, आशीर्वाद तथा परामर्श के लिये। इन्द्र है सम्राट् (यजु० ८।३७)। विष्णु से अभिप्रेत यदि “सूर्य" हो तो यह "चक्षुषाम् अधिपतिः” (अथर्व० ५।२४।९) अर्थात् गुप्तचरों का राज्याधिकारी१ है। सविता है वित्ताधिकारी (मन्त्र ५)। रुद्र है पशुपतिः, पशुओं का अधिकारी, जैसे कि "य ईशे पशुपतिः पशूनाम् (अथर्व० २।३४।१)। इसकी व्याख्या में सायणाचार्य लिखते हैं कि "यः पशुपतिः पशूनां पालयिता, रुद्रः। साम्राज्य के पशुओं का संवर्धन, उत्तम बैलों तथा गौओं का उत्पादन आदि कर्म रुद्र के हैं। अग्नि है अग्रणी प्रधानमन्त्री। यह सब व्याख्या केवल आधिभौतिक व्याख्या की दृष्टि से है]। [१. यथा “चारचक्षुः= राजा, चारचक्षुर्महीपतिः (मनुस्मृति ९।२५६), तथा "चारैः पश्यन्ति राजानः" कामन्दक। इन्हें "स्पशाः" भी कहते हैं (अथर्व० ४।१६।४)। अथवा विष्णु है यज्ञ। अतः राष्ट्र के यज्ञकर्मों का अधिकारी।]
विषय
शत्रुनाशक सेनापति की नियुक्ति।
भावार्थ
(इन्द्रः) इन्द्र, (विष्णुः) विष्णु, (सविता) सविता, (रुद्रः) रुद्र, (अग्निः) अग्नि, (प्रजापति) प्रजापति, (परिमेष्ठी) परमेष्ठी, (विराट्) विराट्, (वैश्वानरः) वैश्वानर ये सब (देवाः) राष्ट्र के बड़े बड़े अधिकारी लोग और (सर्वे) सब (ऋषयः च) क्रांतदर्शी ऋषिगण (अस्मै) इस महा शूरवीर पुरुष के शरीर पर (मणिम्) शोभाजनक पदक और (वर्म) कवच को उसकी प्रतिष्ठा के निमित्त (बध्नन्तु) बांधे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शुक्र ऋषिः। कृत्यादूषणमुत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ६, उपरिष्टाद् बृहती। २ त्रिपाद विराड् गायत्री। ३ चतुष्पाद् भुरिग् जगती। ७, ८ ककुम्मत्यौ। ५ संस्तारपंक्तिर्भुरिक्। ९ पुरस्कृतिर्जगती। १० त्रिष्टुप्। २१ विराटत्रिष्टुप्। ११ पथ्या पंक्तिः। १२, १३, १६-१८ अनुष्टुप्। १४ त्र्यवसाना षट्पदा जगती। १५ पुरस्ताद बृहती। १३ जगतीगर्भा त्रिष्टुप्। २० विराड् गर्भा आस्तारपंक्तिः। २२ त्र्यवसाना सप्तपदा विराड् गर्भा भुरिक् शक्वरी। द्वाविंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Pratisara Mani
Meaning
This jewel armour of strength and courage, moral and spiritual integrity, both individual and social, may the Divinities, Indra, lord omnipotent, Vishnu, lord omnipresent, Savita, lord creator and inspirer, Rudra, lord of love and justice and dispensation, Agni, lord of light and leadership, Prajapati, lord protector and sustainer of created beings, Parameshthi, lord supreme, Virat, cosmic spirit of the universe, Vaishvanara, lord of humanity, and all saints, seers and sages award to this heroic soul.
Translation
May the enlightened ones, the resplendent Lord, the omnipresent Lord, the impeller Lord, the terrible-punisher, the adorable Lord, the Lord of creatures the Lord staying in the highest abode, the Lord in His majesty (Virat), the benefactor of all men, and all the seers, put this blessing as an armour on this (sacrificer).
Translation
May the King, priest, commanding officer the man desencing justice, learned adviser, the chief of the public welfare, and the head of the circles, most brilliant learned person, leader of the administrative units, and other learned people and the seers bind this medal on this man of merit as an armor.
Translation
May venerable persons, dignified king, prudent minister, benevolent general, imparter of knowledge precocious preceptor, nourisher of the people, seeker after salvation, sublime Refulgent God, and all the sages, determine an excellent principle as an armour for this heroic person.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१०−(अस्मै) पुरुषार्थिने शूराय (मणिम्) श्रेष्ठनियमरूपम् (वर्म) कवचम् (बध्नन्तु) धारयन्तु (देवाः) स्तुत्याः पुरुषाः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (विष्णुः) कर्मसु व्यापको मन्त्री (सविता) प्रेरकः सेनापतिः (रुद्रः) अ० २।२७।६। ज्ञानदाता (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी आचार्यः (प्रजापतिः) प्रजापालकः (परमेष्ठी) अ० १।७।२। अतिश्रेष्ठे मोक्षपदे स्थितः (विराट्) अ० ४।११।७। विविधं प्रकाशमानः (वैश्वानरः) अ० १।१०।४। सर्वनरहितः परमेश्वरः (ऋषयः) अ० २।६।१। सन्मार्गदर्शकाः (सर्वे) समस्ताः ॥
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