Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 5 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 14
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - त्र्यवसाना षट्पदा जगती सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
    65

    क॒श्यप॒स्त्वाम॑सृजत क॒श्यप॑स्त्वा॒ समै॑रयत्। अबि॑भ॒स्त्वेन्द्रो॒ मानु॑षे॒ बिभ्र॑त्संश्रेषि॒णेज॑यत्। म॒णिं स॒हस्र॑वीर्यं॒ वर्म॑ दे॒वा अ॑कृण्वत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒श्यप॑: । त्वाम् । अ॒सृ॒ज॒त॒ । क॒श्यप॑: । त्वा॒ । सम् । ऐ॒र॒य॒त् । अबि॑भ: । त्वा॒। इन्द्र॑: । मानु॑षे । बिभ्र॑त् । स॒म्ऽश्रे॒षि॒णे । अ॒ज॒य॒त् । म॒णिम् । स॒हस्र॑ऽवीर्यम् । वर्म । दे॒वा: । अ॒कृ॒ण्व॒त॒ ॥५.१४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कश्यपस्त्वामसृजत कश्यपस्त्वा समैरयत्। अबिभस्त्वेन्द्रो मानुषे बिभ्रत्संश्रेषिणेजयत्। मणिं सहस्रवीर्यं वर्म देवा अकृण्वत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कश्यप: । त्वाम् । असृजत । कश्यप: । त्वा । सम् । ऐरयत् । अबिभ: । त्वा। इन्द्र: । मानुषे । बिभ्रत् । सम्ऽश्रेषिणे । अजयत् । मणिम् । सहस्रऽवीर्यम् । वर्म । देवा: । अकृण्वत ॥५.१४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 5; मन्त्र » 14
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    हिंसा के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मणि, नियम !] (कश्यपः) सब देखनेवाले परमेश्वर ने (त्वाम्) तुझे (असृजत) उत्पन्न किया है, (कश्यपः) सर्वदर्शी ईश्वर ने (त्वा) तुझे (सम्) यथावत् (ऐरयत्) भेजा है। (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवान् मनुष्य ने (त्वा) तुझको (मानुषे) मनुष्य [लोक] में (अबिभः) धारण किया है और उसने [तुझे] (बिभ्रत्) धारण करते हुए (संश्रेषिणे) संग्राम में (अजयत्) जय पाई है। [इसी से] (देवाः) विजय चाहनेवाले वीरों ने (सहस्रवीर्यम्) सहस्रों सामर्थ्यवाले (मणिम्) मणि [श्रेष्ठनियम] को (वर्म) कवच (अकृण्वत) बनाया है ॥१४॥

    भावार्थ

    विद्वानों ने निश्चय किया है कि जो मनुष्य परमेश्वरकृत नियमों पर श्रद्धा रखता है, वह विजयी होता है ॥१४॥

    टिप्पणी

    १४−(कश्यपः) अ० २।३३।७। पश्यकः सर्वद्रष्टा (त्वाम्) मणिम् (असृजत) उत्पादितवान् (कश्यपः) (त्वा) (सम्) सम्यक् (ऐरयत्) प्रेरितवान् (अबिभः) अ० ६।८१।३। धृतवान् (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (मानुषे) अ० ४।१४।५। मनुष्यसम्बन्धिनि लोके (बिभ्रत्) धारयन् (संश्रेषिणे) श्यास्त्या०। उ० २।४६। सम्+श्लिष संसर्गे-इनच्, लस्य रः। परस्परश्लेषणसाधने संग्रामे (अजयत्) जयं प्राप्तवान् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् (सहस्रवीर्यम्) बहुसामर्थ्यम् (वर्म) भयनिवारकं कवचम् (देवाः) विजिगीषवः। शूराः (अकृण्वत) अकुर्वन् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    'सहस्त्रवीर्यमणि' रूप कवच

    पदार्थ

    १. हे वीर्यमणे! (कश्यपः) = सर्वद्रष्टा प्रजापति ने (त्वाम् असृजत्) = तुझे उत्पन्न किया है। (कश्यपः) = वह सर्वद्रष्टा प्रजापति ही (त्वा समैरयत्) = तुझे सर्वोपकार के लिए सम्यक प्रेरित करता है। (त्वा)= तुझे (इन्द्रः अबिभः) = एक जितेन्द्रिय पुरुष अपने में धारण करता है। (मानुषे) = [मानुषेषु मध्ये-सा०] मनुष्यों में जो भी पुरुष तुझे (बिभत्) = धारण करता है, वह (संप्रेषिणे) = परस्पर संश्लेषण के स्थानभूत संग्राम में (अजयत्) = विजयी होता है। २. इसप्रकार इस स्त्राक्त्य मणि के महत्त्व को समझते हुए (देवा:) = ज्ञानी पुरुष (सहस्त्रवीर्यम् मणिम्) = इस अनन्त शक्तिशाली मणि को (वर्म अकृण्वत) = अपना कवच बनाते हैं। इस कवच से सुरक्षित हुए-हुए वे रोगादि से आक्रान्त नहीं होते।

    भावार्थ

    प्रभु ने इस वीर्यमणि को जन्म दिया है, प्रभु ने सर्वोपकार के लिए इसे हममें स्थापित किया है। जितेन्द्रिय पुरुष इसे धारण करता है। इसका धारक संग्राम में विजयी बनता है। यह 'सहलवीर्य मणि' देवों का कवच है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (कश्यपः) सबद्रष्टा परमेश्वर ने [हे मणि ! सेनाध्यक्षरत्न] (त्वा) तुझे (असृजत) सृष्टा है, (कश्यपः) सर्वद्रष्टा परमेश्वर ने तुझे (त्वा) तुझे (सम् ऐरयत्) सम्यक्तया [सर्वोपकार के लिये] प्रेरित किया है। (इन्द्र) सम्राट् ने (मानुषे) मनुष्य प्रजा की [सुरक्षा के निमित्त] (अविभः) तेरा धारण किया है (बिभ्रत्) और धारण करते हुए इन्द्र ने (संश्रेषिण१) युद्ध में, संग्राम में (अजयत्) विजय पाई है। (देवाः) विजिगीषुओं ने (सहस्रवीर्यम्) विविध वीरता से युक्त (मणिम्) सेनाध्यक्षरत्न को (वर्म) अपना कवच (अकृण्वत) किया है।

    टिप्पणी

    [कश्यपः = पश्यकः, आद्यन्तविपर्यासः = सर्वद्रष्टा सर्बज्ञ परमेश्वर। परमेश्वर ने सृष्टि के सर्जनकाल में, वेदविधि द्वारा शासन में सेनाध्यक्ष को भी अविभाज्य अंगरूप में घोषित किया है, प्रजा के उपकार के निमित्त। इसे साम्राज्याधिपति भी धारण कर संग्राम में विजय पाता है। विजिगीषुओं ने सेनाध्यक्ष को निज और राष्ट्र की कवच माना है]| [१. जहां सेनाओं का परस्पर श्लेष होता है, मेल तथा दहन होता है; श्लिष श्लेषणे (चुरादिः), तथा श्लिषु दाहे (भ्वादिः)=संग्राम।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Pratisara Mani

    Meaning

    Distinction of eminence, warrior wearer of the distinction, Kashyapa, lord of universal vision, created you, Kashyapa, lord of imagination inspired you. Fearless Indra, world ruler, bore you for humanity and thereby wins the battles of humanity against inhuman challenges. Indeed the divinities of nature and brilliancies of humanity have made this distinction of a hundred virile powers as the protective armour of life and humanity.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Kašyapa (seer of reality) has bestowed you. Kasyapa has stirred you to action. The resplendent self puts you on; putting you on among men, he wins in the battles. The enlightened ones have made this blessing an armour with thousands of protective powers.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    This Mani to be awarded is full of multifarious might and the man of merit and knowledge make it their armor. O man ! You have been created by All-seeing God, you are sent in this world by All-seeing Lord, the mighty king has chosen you from the crowd of men as he has become victorious in the battle having you in his side. (Hence you are decorated with this Mani).

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O excellent Vedic law, God formed and fashioned thee. An intelligent person has followed thee in this world, and acting upon thy behests has overcome the struggles of life. The sages have made the Vedic law of boundless might, a coat of mail!

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १४−(कश्यपः) अ० २।३३।७। पश्यकः सर्वद्रष्टा (त्वाम्) मणिम् (असृजत) उत्पादितवान् (कश्यपः) (त्वा) (सम्) सम्यक् (ऐरयत्) प्रेरितवान् (अबिभः) अ० ६।८१।३। धृतवान् (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् पुरुषः (मानुषे) अ० ४।१४।५। मनुष्यसम्बन्धिनि लोके (बिभ्रत्) धारयन् (संश्रेषिणे) श्यास्त्या०। उ० २।४६। सम्+श्लिष संसर्गे-इनच्, लस्य रः। परस्परश्लेषणसाधने संग्रामे (अजयत्) जयं प्राप्तवान् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् (सहस्रवीर्यम्) बहुसामर्थ्यम् (वर्म) भयनिवारकं कवचम् (देवाः) विजिगीषवः। शूराः (अकृण्वत) अकुर्वन् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top