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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 13
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - चतुष्पदा भुरिग्जगती सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
    61

    नैनं॑ घ्नन्त्यप्स॒रसो॒ न ग॑न्ध॒र्वा न मर्त्याः॑। सर्वा॒ दिशो॒ वि रा॑जति॒ यो बिभ॑र्ती॒मं म॒णिम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । ए॒न॒म् । घ्न॒न्ति॒ । अ॒प्स॒रस॑: । न । ग॒न्ध॒र्वा: । न । मर्त्या॑: । सर्वा॑: । दिश॑: । वि । रा॒ज॒ति॒ । य: । बिभ॑र्ति । इ॒मम् । म॒णिम् ॥५.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नैनं घ्नन्त्यप्सरसो न गन्धर्वा न मर्त्याः। सर्वा दिशो वि राजति यो बिभर्तीमं मणिम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । एनम् । घ्नन्ति । अप्सरस: । न । गन्धर्वा: । न । मर्त्या: । सर्वा: । दिश: । वि । राजति । य: । बिभर्ति । इमम् । मणिम् ॥५.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 5; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    हिंसा के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (एनम्) उस पुरुष को (न) न तो (अप्सरसः) अप्सराएँ [आकाश में चलनेवाली बिजुलियाँ], (न)(गन्धर्वाः) गन्धर्व [पृथिवी धारण करनेवाले मेघ] और (न)(मर्त्याः) मनुष्य (घ्नन्ति) मारते हैं। वह (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाओं पर (वि राजति) शासन करता है, (यः) जो (इमम्) इस [वेद रूप] (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] को (बिभर्ति) रखता है ॥१३॥

    भावार्थ

    आत्मज्ञानी पुरुषार्थी पुरुष विज्ञान द्वारा सर्वत्र राज्य करता है ॥१३॥

    टिप्पणी

    १३−(न) निषेधे (एनम्) आत्मज्ञानिनम् (घ्नन्ति) मारयन्ति (अप्सरसः) अ० ४।७।२। आकाशे सरणशीला विद्युतः (न) (गन्धर्वाः) अ० २।१।२। पृथिवीधारका मेघाः (न) (मर्त्याः) मनुष्याः (सर्वाः) (दिशः) (वि राजति) विविधं शास्ति। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥

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    विषय

    न अप्सरसः, न गन्धर्वाः, न मर्त्याः

    पदार्थ

    १. (यः) = जो (इमं मणिं बिभर्ति) = इस वीर्यरूपमणि को धारण करता है, (एनम्) = इसे (अप्सरस:) = [अप्सु सरन्ति] यज्ञादि कर्मों में गतिवाले कर्मकाण्डी (न घ्नन्ति) = [हन् to conquer] पराजित नहीं कर पाते, अर्थात् यह यज्ञों में उनसे पीछे नहीं रहता। (न गन्धर्वा:) = ज्ञान की वाणियों को धारण करनेवाले ज्ञानी भी इसे पराजित नहीं कर पाते। यह ज्ञानियों में अग्रभाग में स्थित होता है। २. इसी प्रकार इस वीर्यरूप मणि के धारक को (न मर्त्याः) = सामान्य धनार्जन में प्रवृत्त मनुष्य भी पराजित नहीं कर पाते। यह वीर्य-रक्षण उसे यज्ञादि कर्म करने, ज्ञानोपार्जन व धनार्जन में क्षमता प्रदान करता है। इसप्रकार यह वीर्य-रक्षक पुरुष (सर्वाः दिशः विराजति) = सब दिशाओं में शोभावाला होता है।

    भावार्थ

    वीर्य का धारण मनुष्य को सब क्षेत्रों में विजयी बनाता है।

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    भाषार्थ

    (यः) जो राष्ट्रपति राजा (इमम्) इस (मणिम्) सेनाध्यक्षरूपी पुरुषरत्न का (बिभर्ति) धारण और पोषण करता है, (एनम्) इसका (न अप्सरसः) न तो अन्तरिक्ष विहारिणी शत्रु शक्तियां, (न)(गन्धर्वाः) पृथिवी का धारण करने वाले अन्य राजा और (न मर्त्याः) न साधारण प्रजाजन (घ्नन्ति) हनन करते हैं। वह (सर्वाः दिशः) सब दिशाओं पर (वि राजति) राज्य करता है।

    टिप्पणी

    [अप्सरसः= अप्सारिण्यः, अप्सु सारिण्यः। आपोऽन्तरिक्षनाम (निघं० १।२); अन्तरिक्ष में संचार करने वाली शात्रवी-सेनाएं| गन्धर्वाः= गौः पृथिवी नाम (निघं० १।१), उसका धारण करने वाले राजा]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Pratisara Mani

    Meaning

    Lightnings of the sky smite him not, rulers of the earth and the highest of mortals challenge him not, indeed the wearer of this eminence shines unique over all quarters of the earth.

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    Translation

    The Apsaras (those moving in the Clouds) do not kill him nor the Gandharvas (sustainers of our earth); nor the mortals kill him; he, who puts on this blessing, rules over all the quarters.

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    Translation

    He who is recipient of this Mani shines as King over all the regions. Neither electrical means can kill him nor the man equipped with gaseous arms and or the mortal beings.

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    Translation

    Neither women with their allurements, nor kings with their crooked policy, nor mortal beings can harm him, who follows the excellent Vedic teachings.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(न) निषेधे (एनम्) आत्मज्ञानिनम् (घ्नन्ति) मारयन्ति (अप्सरसः) अ० ४।७।२। आकाशे सरणशीला विद्युतः (न) (गन्धर्वाः) अ० २।१।२। पृथिवीधारका मेघाः (न) (मर्त्याः) मनुष्याः (सर्वाः) (दिशः) (वि राजति) विविधं शास्ति। अन्यत् पूर्ववत्-म० १२ ॥

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