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ऋग्वेद मण्डल - 4 के सूक्त 17 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 4/ सूक्त 17/ मन्त्र 3
    ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    भि॒नद्गि॒रिं शव॑सा॒ वज्र॑मि॒ष्णन्ना॑विष्कृण्वा॒नः स॑हसा॒न ओजः॑। वधी॑द्वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः सर॒न्नापो॒ जव॑सा ह॒तवृ॑ष्णीः ॥३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भि॒नत् । गि॒रिम् । शव॑सा । वज्र॑म् । इ॒ष्णन् । आ॒विः॒ऽकृ॒ण्वा॒नः । स॒ह॒सा॒नः । ओजः॑ । वधी॑त् । वृ॒त्रम् । वज्रे॑ण । म॒न्द॒सा॒नः । सर॑न् । आपः॑ । जव॑सा । ह॒तऽवृ॑ष्णीः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भिनद्गिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः। वधीद्वृत्रं वज्रेण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः ॥३॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भिनत्। गिरिम्। शवसा। वज्रम्। इष्णन्। आविःऽकृण्वानः। सहसानः। ओजः। वधीत्। वृत्रम्। वज्रेण। मन्दसानः। सरन्। आपः। जवसा। हतऽवृष्णीः ॥३॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 4; सूक्त » 17; मन्त्र » 3
    अष्टक » 3; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे राजन् ! यथा सूर्य्यो गिरिं भिनद्वज्रेण वृत्रं वधीत् तद्धतान्मेघाद्धतवृष्णीरापो जवसा सरंस्तथैव मन्दसानः सहसान ओज आविष्कृण्वानो वज्रमिष्णञ्छवसा शत्रुसेनां विदारय च सेनया शत्रून् हत्वा रुधिराणि प्रवाहय ॥३॥

    पदार्थः

    (भिनत्) भिनत्ति विदृणाति (गिरिम्) गिरिवद्वर्त्तमानं मेघम् (शवसा) बलेन (वज्रम्) किरणमिव शस्त्रम् (इष्णन्) प्राप्नुवन् (आविष्कृण्वानः) प्राकट्यं कुर्वन् (सहसानः) सहमानः। अत्र वर्णव्यत्ययेन मस्य सः। (ओजः) पराक्रमम् (वधीत्) हन्ति (वृत्रम्) मेघम् (वज्रेण) किरणेन (मन्दसानः) आनन्दन् (सरन्) गच्छन्ति। अत्राडभावः (आपः) जलानि (जवसा) वेगेन (हतवृष्णीः) हतो वृषा मेघो यासां ताः ॥३॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये सूर्य्यवन्न्यायप्रकाशबलप्रसिद्धा दुष्टविदारकाः सत्पुरुषेभ्य आनन्दप्रदा वर्त्तन्ते त एव प्रकटकीर्त्तयो भूत्वेहाऽमुत्र परजन्मन्यक्षयाऽऽनन्दा जायन्ते ॥३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे राजन् ! जैसे सूर्य (गिरिम्) पर्वत के समान मेघ को (भिनत्) विदीर्ण कर और (वज्रेण) किरण से (वृत्रम्) मेघ का (वधीत्) नाश करता है, उस नाश हुए मेघ से (हतवृष्णीः) नष्ट किया गया मेघ जिनका वह (आपः) जल (जवसा) वेग से (सरन्) जाते हैं, वैसे ही (मन्दसानः) आनन्द वा (सहसानः) सहन करते (ओजः) और पराक्रम को (आविष्कृण्वानः) प्रकट करते वा (वज्रम्) किरण के समान शस्त्र को (इष्णन्) प्राप्त होते हुए (शवसा) बल से शत्रुओं की सेना का नाश करो और सेना से शत्रुओं का नाश करके रुधिरों को बहाओ ॥३॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य के सदृश न्याय से प्रकाश बल से प्रसिद्ध, दुष्टों के नाशकारक और श्रेष्ठ पुरुषों के लिये आनन्ददायक होते हैं, वे ही प्रकट यशवाले होकर इस संसार में और परलोक अर्थात् दूसरे जन्म में अखण्ड आनन्दवाले होते हैं ॥३॥

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    विषय

    ज्ञानप्रवाह

    पदार्थ

    [१] प्रभु का उपासक (वज्रम्) = क्रियाशीलता रूप वज्र को (इष्णन्) = अपने में प्रेरित करता हुआ (शवसा) = शक्ति द्वारा (गिरिम्) = अविद्यापर्वत को (भिनद्) = विदीर्ण करता है और (सहसान:) = शत्रुओं का मर्षण करता हुआ (ओजः) = ओज को (आविष्कृण्वानः) = प्रकट करता है [२] और जब यह (मन्दसान:) = [मन्दते: स्तुतिकर्मण:] प्रभु का स्तवन करता हुआ (वज्रेण) = क्रियाशीलतारूप वज्र से (वृत्रम्) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को (वधीद्) = विनष्ट करता है, तो (हतवृष्णी:) = [हतो वृषा आसां] नष्ट हो गया है वृत्तरूप प्रबल शत्रु जिनका ऐसे (अप:) = ज्ञानजल जवसा वेग से (सरन्) = गतिवाले हो उठते हैं। ज्ञान की आवरणभूत वासना का विनाश हुआ और ज्ञानजलों का प्रवाह चला सरस्वती नदी के जलप्रवाह को इस वृत्र ने ही तो रोका हुआ था । वृत्र के हटते ही वह प्रवाह प्रवाहित हो उठता है।

    भावार्थ

    भावार्थ- क्रियाशीलतारूप वज्र से अविद्यापर्वत का विदारण होकर ज्ञान का प्रवाह प्रवाहित होने लगता है।

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    विषय

    वज्रधर का शत्रु मर्दन ।

    भावार्थ

    जिस प्रकार (वज्रम् इष्णन्) विद्युत् को प्रेरित करता हुआ सूर्य वा प्रबल वायु (गिरिं भिनत्) मेघ को छिन्न भिन्न करता है और (वज्रेण वृत्रं वधीत्) वज्र से सूक्ष्म जल मय मेघ को आघात करता है, और (हतवृष्णीः) ताड़ित हुए वर्षणशील मेघ से युक्त (आपः जवसा सरन्) जलधाराएं वेग से बह निकलती हैं । उसी प्रकार वीर सेनापति वा राजा (सहसानः) शत्रुओं को पराजित करता हुआ, और (ओजः) बल, पराक्रम प्रकट करता हुआ (वज्रम् इष्णन्) शस्त्रास्त्र बल को प्रेरित करता हुआ (गिरिम्) पर्वत तुल्य अचल और मेघ तुल्य शस्त्रास्त्र वर्षी, एवं स्व प्रजा के धनापहारी दुष्ट शत्रु को (शवसा) बल और ज्ञान के द्वारा (भिनत्) भेद नीति से तोड़ फोड़ डाले । (मन्द-सानः) स्वयं खूब प्रसन्न रहकर (वज्रेण) शस्त्रास्त्र बल से (वृत्रं) बाधक, नगररोधी और बढ़ते हुए शत्रु को (वधीत्) विनाश करे, दण्डित कर, और (हतवृष्णीः) मारे गये बलवान् पुरुषों के (आपः) रुधर प्रवाह और जलों के समान भय कातर सैन्य भी (जवसा) वेग से (सरन्) भागें ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    वामदेव ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः- १ पंक्तिः । ७,९ भुरिक पंक्तिः । १४, १६ स्वराट् पंक्तिः। १५ याजुषी पंक्तिः । निचृत्पंक्तिः । २, १२, १३, १७, १८, १९ निचृत् त्रिष्टुप् । ३, ५, ६, ८, १०, ११ त्रिष्टुप् । ४, २० , । विराट् त्रिष्टुप् ॥ एकविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे लोक सूर्यप्रकाशाप्रमाणे न्यायाने बलवान बनून प्रसिद्ध होतात. दुष्टांचे नाशकारक व श्रेष्ठ पुरुषांसाठी आनंददायक असतात तेच प्रकट यश मिळवून इहलोकी व परलोकी अखंड आनंदी असतात. ॥ ३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, hero bold and invincible, happy and joyous, striking thunder and lightning with his mighty force, thereby manifesting his lustrous blaze of power, destroys the cloud of darkness with the thunderbolt, making the floods of water flow with rapidity after the vapours have been unlocked and released.$(The mantra is a metaphor of the energies of life, of nature as well as of humanity, being unlocked and released by the ruling power with a strike of the force of law and justice against the strongholds of darkness, evil and selfishness which lock up those energies and prevent them from flowing into channels of progress and evolution.)

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The attributes of a king are underlined.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O king ! the sun breaks down a cloud and destroys it with its rays. From that shattered cloud, the waters whose obstruction was destroyed rush forth with rapidity. In the same manner, gladdening all good persons, putting up with all difficulties, manifesting your energy, hurl your powerful weapons. It is like the rays of the sun shatters the army of the foes into pieces with your strength and having destroyed the enemies make their blood flow.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those who become illustrious like the sun on account of the light of justice and strength, they destroy the wicked and give joy to good persons in this world and enjoy lasting bliss in future.

    Foot Notes

    (वज्रेण ) किरणेन । वीर्यं: वज्रः ( Stph 1. 3, 5, 7 ) = Weapon which is like the rays of the sun, (सहसान) सहमान: । अत्र वर्णव्यत्ययेन मस्थ स: =Putting up with all difficulties. (गिरिम् ) गिरिवद् वर्त्तंमानं मेघम् गिरिरिति मेघनाम (NG 1, 10) = Mountain like cloud.

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    हिंगलिश (1)

    Word Meaning

    पारदर्शित कार्यशैली के बल से.श्रेष्ठ राजा अखण्ड आनन्द प्राप्त करते हैं

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