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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 41 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 41/ मन्त्र 15
    ऋषिः - अत्रिः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    प॒देप॑दे मे जरि॒मा नि धा॑यि॒ वरू॑त्री वा श॒क्रा या पा॒युभि॑श्च। सिष॑क्तु मा॒ता म॒ही र॒सा नः॒ स्मत्सू॒रिभि॑र्ऋजु॒हस्त॑ ऋजु॒वनिः॑ ॥१५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प॒देऽप॑दे । मे॒ । ज॒रि॒मा । नि । धा॒यि॒ । वरू॑त्री । वा॒ । श॒क्रा । या । पा॒युऽभिः॑ । च॒ । सिस॑क्तु । मा॒ता । म॒ही । र॒सा । नः॒ । स्मत् । सू॒रिऽभिः॑ । ऋ॒जु॒ऽहस्ता॑ । ऋ॒जु॒ऽवनिः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पदेपदे मे जरिमा नि धायि वरूत्री वा शक्रा या पायुभिश्च। सिषक्तु माता मही रसा नः स्मत्सूरिभिर्ऋजुहस्त ऋजुवनिः ॥१५॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पदेऽपदे। मे। जरिमा। नि। धायि। वरूत्री। वा। शक्रा। या। पायुऽभिः। च। सिसक्तु। माता। मही। रसा। नः। स्मत्। सूरिऽभिः। ऋजुऽहस्ता। ऋजुऽवनिः ॥१५॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 41; मन्त्र » 15
    अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 15; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे मनुष्या ! सूरिभिः पायुभिश्च या मे पदेपदे वरूत्री जरिमा वा शक्रा माता रसा मही ऋजुहस्ता ऋजुवनिर्नः सिषक्तु सा स्मन्निधायि ॥१५॥

    पदार्थः

    (पदेपदे) प्राप्तव्ये प्राप्तव्ये वेदितव्ये वेदितव्ये गन्तव्ये गन्तव्ये वा पदार्थे (मे) मम (जरिमा) स्ताविका (नि) नितराम् (धायि) निधीयते (वरूत्री) वरसुखप्रदा (वा) (शक्रा) शक्तिनिमित्ता (या) (पायुभिः) रक्षणैः (च) (सिषक्तु) सम्बध्नातु (माता) जननी (महा) महती वाग्भूमिर्वा (रसा) रसादिगुणयुक्ता (नः) अस्मान् (स्मत्) एव (सूरिभिः) विद्वद्भिः (ऋजुहस्ता) ऋजू सरलौ हस्तौ यस्या यस्यां वा सा (ऋजुवनिः) ऋजूनामकुटिलानां पदार्थानां संविभाजिका ॥१५॥

    भावार्थः

    हे मनुष्या ! यथा माताऽपत्यानि रक्षति तथैव विद्वत्सङ्गेन लब्धा सुशिक्षिता विद्या विदुषः सर्वतो रक्षति ॥१५॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे मनुष्यो ! (सूरिभिः) विद्वानों और (पायुभिः) रक्षकों से (च) और (या) जो (मे) मेरे (पदेपदे) प्राप्त होने प्राप्त होने, जानने जानने वा जाने जाने योग्य पदार्थ में (वरूत्री) श्रेष्ठ सुख की देने (जरिमा) और स्तुति करानेवाली (वा) वा (शक्रा) सामर्थ्य में कारण (माता) माता (रस) रस आदि गुणों से युक्त (मही) बड़ी वाणी वा भूमि (ऋजुहस्ता) ऋजु अर्थात् सरल हस्त जिसके वा जिसमें वह (ऋजुवनिः) ऋजु अर्थात् नहीं जो कुटिल उन पदार्थों के विभक्त करनेवाली (नः) हम लोगों को (सिषक्तु) सम्बन्धित करे वह (स्मत्) ही (नि) निरन्तर (धायि) स्थित की जाती है ॥१५॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो ! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है, वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है ॥१५॥

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    विषय

    उत्तम विद्वान् के कर्त्तव्य । सेना के कर्त्तव्य | विद्वानों के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    भा०- (मे) मेरे ( पदे-पदे ) प्रत्येक प्राप्त करने योग्य, और जाने योग्य स्थान में ( वरूत्री ) शत्रुओं का वरण करने वाली ( शक्रा ) शक्ति-शालिनी, ( जरिमा ) शत्रुओं का नाश करने वाली सेना (या) जो ( पायुभिः च ) उत्तम रक्षकों और रक्षासाधनों से युक्त हो ( निधायि ) स्थापित हो । और (माता) माता के समान सबको उत्पन्न और पालन करने वाली (मही) भूमि ( रसा ) जल और रसवान् पदार्थों से पूर्ण होकर (नः) हमें (सिषक्तु ) सुख दे | और वह ( सूरिभिः) उत्तम विद्वानों से ही ( ऋजु-हस्ता ) सरल, धार्मिक, सिद्धहस्त हाथों वा कार्यकर्त्ताओं वाली और (ऋजु-वनिः ) सरल, धर्मयुक्त पुरुषों को नाना पदार्थ देने वाली हो । ( २ ) इसी प्रकार हमारी वाणी पद पद पर पवित्र कार्यों से उत्तम शक्तिशालिनी हो, वह माता के समान, ज्ञानप्रद, सरस,धर्म से अधर्म का नाश करने वाली, धर्म का विवेक करने वाली हो । इति पञ्चदशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अत्रिर्ऋषिः ॥ विश्वेदेवा देवता ॥ छन्दः — १, २, ६, १५, १८ त्रिष्टुप् ॥ ४, १३ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ७, ८, १४, १९ पंक्ति: । ५, ९, १०, ११, १२ भुरिक् पंक्तिः । २० याजुषी पंक्ति: । १६ जगती । १७ निचृज्जगती ॥ विशत्यृर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    स्तुति-वेदवाणी-[सरलता]

    पदार्थ

    [१] प्रभु का उपदेश सुनकर जीव निश्चय करता है कि (पदे पदे) = पग-पग पर (मे) = मेरे से (जरिमा) = स्तुति (निधायि) = अपने में स्थापित की जाती है, मैं सतत स्तुति प्रवृत्त होता हूँ। सब कार्यों को प्रभु-स्तवन के साथ करता हूँ। उस स्तुति को करता हूँ जो (वा) = निश्चय से (वरुत्री) = मेरी सब बुराइओं का निवारण करनेवाली है, (च) = और (या) = जो (पायुभिः) = रक्षणों के द्वारा (शक्रा) = सब मुझे सब उत्तम कर्मों के करने की शक्ति प्राप्त कराती है। स्तुति से जीवन पवित्र होता है और शक्तिसम्पन्न बनता है। [२] (नः) = हमें यह (माता) = जीवन का निर्माण करनेवाली वेदमाता (सिषक्तु) = प्राप्त हो जो (मही) = पूज्य है, हमारे जीवनों को महत्त्वपूर्ण बनानेवाली है तथा (रसा) = हमारे जीवनों में रस का सञ्चार करनेवाली है। जो (स्मत्सूरिभिः) = प्रशस्त विद्वानों से हमें प्राप्त होती है [स्मत्=प्रप्रास्तार्थे] तथा (ऋजुहस्ता) = हमारे हाथों को ऋजु बनाती है, अर्थात् जिसको प्राप्त करके हम सरलतायुक्त कर्मों को ही करते हैं, (ऋजुवनिः) = जो हमें आर्जव का सेवन करनेवाला बनाती है, इस वेदवाणी से हमारे हृदय निष्कपट होते हैं। यह आर्जव ही तो ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग है। 'आर्जवं ब्रह्मणः पदम्' ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम सदा प्रभु-स्मरण के साथ कार्यों को करें, यही पवित्रता व शक्ति प्राप्ति का मार्ग है। हम प्रशस्त विद्वानों से वेदमाता का ज्ञान प्राप्त करें, यह ज्ञान हमें सरल वृत्ति व निष्कपट कर्मोंवाला बनायेगा।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे माणसांनो! जशी माता संतानाचे रक्षण करते. तसेच विद्वानांच्या संगतीने उत्तम प्रकारे प्राप्त झालेली विद्या विद्वानांचे सर्व प्रकारे रक्षण करते. ॥ १५ ॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    At every stage of evolution, my growth with divine praise and prayer is evident, replete with power and grace bearing all natural and divine modes and materials of protection and progress. May mother earth and her nectar sweets of energy with sages and scholars bless us with the rich gifts of her simple, natural and liberal hands.

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