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ऋग्वेद मण्डल - 5 के सूक्त 41 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 5/ सूक्त 41/ मन्त्र 17
    ऋषिः - अत्रिः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    इति॑ चि॒न्नु प्र॒जायै॑ पशु॒मत्यै॒ देवा॑सो॒ वन॑ते॒ मर्त्यो॑ व॒ आदे॑वासो वनते॒ मर्त्यो॑ वः। अत्रा॑ शि॒वां त॒न्वो॑ धा॒सिम॒स्या ज॒रां चि॑न्मे॒ निर्ऋ॑तिर्जग्रसीत ॥१७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इति॑ । चि॒त् । नु । प्र॒ऽजायै॑ । प॒शु॒ऽमत्यै॑ । देवा॑सः । वन॑ते । मर्त्यः॑ । वः॒ । आ । दे॒वा॒सः॒ । व॒न॒ते॒ । मर्त्यः॑ । वः॒ । अत्र॑ । शि॒वाम् । त॒न्वः॑ । धा॒सिम् । अ॒स्याः । ज॒राम् । चि॒त् । मे॒ । निःऽऋ॑तिः । ज॒ग्र॒सी॒त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इति चिन्नु प्रजायै पशुमत्यै देवासो वनते मर्त्यो व आदेवासो वनते मर्त्यो वः। अत्रा शिवां तन्वो धासिमस्या जरां चिन्मे निर्ऋतिर्जग्रसीत ॥१७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इति। चित्। नु। प्रऽजायै। पशुऽमत्यै। देवासः। वनते। मर्त्यः। वः। आ। देवासः। वनते। मर्त्यः। वः। अत्र। शिवाम्। तन्वः। धासिम्। अस्याः। जराम्। चित्। मे। निःऽऋतिः। जग्रसीत ॥१७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 5; सूक्त » 41; मन्त्र » 17
    अष्टक » 4; अध्याय » 2; वर्ग » 16; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्विद्वद्विषयमाह ॥

    अन्वयः

    हे देवासो ! यो मर्त्यो वः पशुमत्यै प्रजायै धासिं वनते यश्चिदित्यस्याः प्रजायास्तन्वः शिवां जरामा वनते यो मर्त्यश्चिन्मे तन्वः शिवां जरां वनते निर्ऋतिरिवात्रा वो धासिं जग्रसीतेति, हे देवासो ! यूयमस्मभ्यमेतन्नु साध्नुत ॥१७॥

    पदार्थः

    (इति) अनेन प्रकारेण (चित्) निश्चयेन (नु) सद्यः (प्रजायै) (पशुमत्यै) बहवः पशवो विद्यन्ते यस्यां तस्यै (देवासः) विद्वांसः (वनते) सम्भजसि (मर्त्यः) मनुष्यः (वः) युष्मान् (आ) समन्तात् (देवासः) विद्वांसः (वनते) सम्भजति (मर्त्यः) (वः) युष्माकम् (अत्रा) अस्यां प्रजायाम्। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (शिवाम्) मङ्गलमयीम् (तन्वः) शरीरस्य (धासिम्) अन्नम् (अस्याः) प्रजायाः (जराम्) वृद्धावस्थाम् (चित्) निश्चयेन (मे) मम (निर्ऋतिः) भूमिः। निर्ऋतिरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१।१) (जग्रसीत) ग्रसते ॥१७॥

    भावार्थः

    हे विद्वांसो ! यूयमीदृशं प्रयत्नं कुरुत येन मनुष्याणामायुर्वर्द्धेत यावन्मनुष्या वृद्धा न भवन्ति तावदेते परीक्षका अपि न जायन्ते ॥१७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (देवासः) विद्वान् जनो ! जो (मर्त्यः) मनुष्य (वः) आप लोगों को (पशुमत्यै) बहुत पशु विद्यमान जिसमें उस (प्रजायै) प्रजा के लिये (धासिम्) अन्न की (वनते) सेवा करता है और जो (चित्) निश्चय से (इति) इस प्रकार से (अस्याः) इस प्रजा के (तन्वः) शरीर की (शिवाम्) मङ्गलस्वरूप (जराम्) वृद्धावस्था की (आ, वनते) अच्छे प्रकार सेवा करता है और जो (मर्त्यः) मनुष्य (चित्) निश्चय से (मे) मेरे शरीर की मङ्गलस्वरूप वृद्धावस्था का सेवन करता है और (निर्ऋतिः) भूमि के सदृश (अत्रा) इस प्रजा में (वः) आप लोगों के अन्न को (जग्रसीत) खाता है, इस प्रकार हे (देवासः) विद्वान् ! आप लोग हम लोगों के लिये इसको (नु) शीघ्र सिद्ध कीजिये ॥१७॥

    भावार्थ

    हे विद्वान् जनो ! आप लोग ऐसा प्रयत्न करो जिससे मनुष्यों की अवस्था बढ़े, जब तक मनुष्य वृद्ध नहीं होते, तब तक ये परीक्षक भी नहीं होते हैं ॥१७॥

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    भा०-हे ( देवासः ) विद्वान् पुरुषो ! हे ( देवासः ) दानशील,सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी पुरुषो ! ( मर्त्यः ) मनुष्य ( चित् नु ) जिस प्रकार ( पशुमत्यै प्रजायै ) पशु आदि से समृद्ध, प्रजा की वृद्धि के लिये भी ( वः ) आप लोगों की ( शिवां ) कल्याणकारिणी ( जरां ) वाणी को ( आ वनते ) आदर से सेवन करे उसी प्रकार ( मर्त्यः ) मनुष्य (वः ) आप लोगों की ( धासिम् ) धारण-पालनकारिणी शक्ति को भी ( आ वनते ) आदर से सेवन करे उसी प्रकार ( मर्त्यः ) मनुष्य ( वः), आप लोगों की ( धासिम् ) धारण पालनकारिणी शक्ति को भी ( आ-वनते) सब प्रकार से प्राप्त करे । (अन) इस राष्ट्र वा लोक में (निर्ऋतिः) रोगादि कष्ट ही प्रायः ( अस्याः तन्वः ) इस देह के ( धासिम् ) पुष्टि और ( जरां चित् ) दीर्घकालिक जरावस्था को भी ( जग्रसीत ) ग्रस लेती है इसलिये हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोग उस रोगादि कष्ट को सदा दूर किया करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अत्रिर्ऋषिः ॥ विश्वेदेवा देवता ॥ छन्दः — १, २, ६, १५, १८ त्रिष्टुप् ॥ ४, १३ विराट् त्रिष्टुप् । ३, ७, ८, १४, १९ पंक्ति: । ५, ९, १०, ११, १२ भुरिक् पंक्तिः । २० याजुषी पंक्ति: । १६ जगती । १७ निचृज्जगती ॥ विशत्यृर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    वानप्रस्थ बनना

    पदार्थ

    [१] हे (देवासः) = देवो! (मर्त्यः) = मनुष्य (नु) = शीघ्र ही (इति चित्) = इस प्रकार (पशुमत्यै) = प्रशस्त गवादि पशुओंवाली (प्रजायै) = उत्तम प्रजा के लिये (वः वनते) = आपका आराधन करता है । (मर्त्यः) = मनुष्य (आ) = समन्तात्, (देवासः) = हे देवो! (वः वनते) = आपका उपासन करता है। सामान्यतः मनुष्य धार्मिक प्रवृत्तिवाला होने पर भी प्रजा व पशुओं में ही उलझा रह जाता है। और प्रभु की उपासना का स्थान उसके जीवन में भिन्न-भिन्न देवों का उपासन ही ले लेता है। चाहिये तो यह कि हम जीवनयात्रा में गृहस्थ में उत्तम प्रजाओं का निर्माण करके अब उससे ऊपर उठने का प्रयत्न करें। हमारी वृद्धावस्था भी इस गृहस्थ में ही न समाप्त हो जाये। [२] (अत्रा) = इन पशुओं व प्रजाओं में (अस्याः) = इस (तन्वः) = शरीर के (शिवां धासिम्) = कल्याणकर धारण को तथा (मे जरां चित्) = मेरी प्रभु स्तुति को भी [जरा-स्तुति नि० १० १८] (निरृतिः) = दुर्गति ने ग्रस लिया है। हम जीवन के अन्त तक पुत्र-पौत्रों में ही उलझे रहेंगे तो यह कल्याण का मार्ग नहीं है। गृहस्थ से ऊपर उठकर हमें वनस्थ होना ही चाहिए और सतत प्रभु स्मरण के आनन्द को लेने का प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रभु-स्मरण हमें सशक्त व स्वस्थ शरीरवाला बनाकर लोकहित के कार्यों को करने के योग्य बनायेगा।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम देवों से प्रजा व पशु ही जन्म भर न माँगते रह जायें । गृहस्थ को भली-भान्ति निभाकर वनस्थ हों। प्रभु-स्मरण से अपने को सशक्त बनाकर लोकहित में प्रवृत्त हों।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे विद्वानांनो! तुम्ही असा प्रयत्न करा, ज्यामुळे माणसाचे आयुष्य वाढेल. जोपर्यंत माणसे वृद्व होत नाहीत तोपर्यंत ती परीक्षकही होत नाहीत. ॥ १७ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Thus does mortal man honour and celebrate you, O divinities of nature and humanity, for progeny and for abundance of wealth and cattle. Thus does mortal man win your favour. Give me here in the world well being of the body and sustenance for health, and may mother earth with her generosity keep off debility and decay of my health and the onset of old age.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    About the enlightened persons (Vishvedevāh) is told further.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O enlightened person! the man who provides food for your off springs along the animals, he who provides for and serves the auspicious grand old men of your progeny, and the one who provides for the happy old age of my body, and one that takes your food like the earth, please accomplish all them for us along with all such good people.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    O learned persons! you should try in such a manner that the span of life of men may increase, till they grow old, and in absence of that, they can not become good admirers or experienced persons of all the events.

    Foot Notes

    (निऋति:) भूमिः। निऋतिरीति पृथिवीनाम। (NG 1, 1)। = Earth. (वनते ) सम्भजति । वन संभक्तौ (भ्वा० ) । = Divides provides. (धासिम् ) अन्नम् । धासिरिति अन्ननाम (NG 2, 7)। = Food.

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